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80 साल पहले एक मोदी ने समझा था तलाक का दर्द, फिर तीन तलाक पर बनी बीआर चोपड़ा की 'निकाह'

Sun, 04 Aug 2019 01:16 PM IST
अपूर्वा राय बीबीसी हिंदी
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तीन तलाक - फोटो : Twitter
जिस तरह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने तीन तलाक को महिलाओं की आज़ादी का मुद्दा बनाया और संसद में इस पर कानून पास कराया, पूरे देश में इस पर एक बहस खड़ी हो गई है। तलाक के मुद्दे को हमारे फिल्मकार भी अपनी फिल्मों में दिखाते रहे हैं। कुछ फिल्में तो तलाक पर ही पूरी तरह केन्द्रित रहीं लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस फिल्मकार ने इसे सबसे पहले अपनी फिल्म में उठाया वह भी मोदी थे, अपने दौर के जाने-माने फिल्मकार सोहराब मोदी। सोहराब मोदी ने सन 1938 में ही 'तलाक' नाम से फिल्म बना दी थी। सोहराब मोदी ने इस समस्या और इसके परिणामों को उजागर किया। यह फिल्म दर्शकों को काफी पसंद आई और बॉक्स ऑफिस पर भी हिट साबित हुई। हालांकि सोहराब मोदी की यह 'तलाक' तीन तलाक पर यानी मुस्लिम पृष्ठभूमि पर नहीं थी लेकिन फिल्म में तलाक और उस समय इससे जुड़े कानून के दांव पेच को दिखाया था। यह फिल्म तलाक में महिलाओं के अधिकार की आवाज उठाकर महिला सशक्तीकरण के समर्थन में थी।
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तीन तलाक - फोटो : Twitter
इसमें उस समय के मशहूर सितारे नसीम बानू, प्रेम अदीब, गजानन जागीरदार और नवीन याज्ञनिक मुख्य भूमिकाओं में थे। मोदी के विख्यात मिनर्वा मूवीटोन बैनर से बनी इस फिल्म की कहानी को आनंद कुमार और गजानन जागीरदार ने लिखा था।भारत में ब्रिटिश शासन के दौर में बनी इस फिल्म की नायिका रूपा एक राजनेता निरंजन की पत्नी है लेकिन अपने पति की कई बातों से परेशान होकर वो उससे तलाक लेना चाहती है लेकिन निरंजन तलाक नहीं लेना चाहता। तब रूपा एक पत्रिका 'आँधी' के संपादक की मदद लेती है। वह तलाक के क़ानून में कुछ बदलाव दिलवाकर उसके पति से उसे आज़ाद करा देता है। और रूपा एक अन्य व्यक्ति अमरनाथ से शादी कर लेती है लेकिन बाद में अमरनाथ उसी कानून को माध्यम बनाकर रूपा से तलाक ले लेता है, जिस कानून के सहारे रूपा को अपने पहले पति से तलाक मिला था। इस फिल्म के बाद 'तलाक' नाम से एक और फिल्म साल 1958 में भी बनी। निर्माता निर्देशक महेश कौल की इस फिल्म में राजेंद्र कुमार नायक थे और कामिनी कदम, राधाकृष्ण, सज्जन और यशोधरा काटजू के साथ बेबी मलिका अन्य प्रमुख कलाकार थे।
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तीन तलाक - फोटो : Twitter
इस 'तलाक' की कहानी उस समय के सुप्रसिद्द लेखक पंडित मुखराम शर्मा ने लिखी थी। फिल्म में दिखाया गया था कि एक स्कूल अध्यापिका इन्दु जब एक कवि और इंजीनियर रवि शंकर के देश भक्ति के गीत एक समारोह में सुनती है, तो वह उससे प्यार कर बैठती है। दोनों शादी कर लेते हैं। इन्दु शादी के बाद अपनी नौकरी छोड़ अपने बेटे आशू के पालन पोषण में जुट जाती है लेकिन इसी दौरान इन्दु के पिता अपने दामाद रवि से काफी पैसे उधार लेकर जुए में हार जाते हैं। जिसका खामियाजा इन्दु को तलाक का सामना करके भुगतना पड़ता है। साथ ही अपने गुजर-बसर के लिए उसे फिर से अपनी पुरानी नौकरी पर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इस फिल्म की सफलता के बाद तब कई निर्माताओं ने इस विषय पर फिल्म बनाने की योजना बनाई लेकिन कुछ फिल्में पूरी ही नहीं हो पाईं। साथ ही जहां निर्माता जीतेंद्र की फिल्म 'दीदार ए यार' में मुस्लिम समाज में निकाह की शर्तों को अच्छे से दिखाया तो 'जुनून' और 'शमा' जैसी फिल्मों में भी मुस्लिम महिलाओं की टीस को बखूबी दिखाया।

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तीन तलाक - फोटो : instagram
पिछले कुछ बरसों में भी तलाक को लेकर दो तीन फिल्में बनीं और कुछ सीरियल भी। सीरियल में जहां ऐसा बड़ा प्रयास कुछ बरस पहले सोनी चैनल पर 'हिना' से हुआ था तो हाल ही में प्रसिद्द सीरियल निर्माता धीरज कुमार ने तीन तलाक को लेकर ही ज़ी टीवी के लिए एक सीरियल 'सुभान अल्लाह' बनाया। हालांकि साल 1984 में शर्मिला टैगोर, गिरीश कर्नाड, विजेंद्र घाटगे और जासमीन को लेकर बनी एनडी कोठारी की फिल्म 'डाईवोर्स' और साल 2005 में बनी 'डाईवोर्स'-नॉट बिट्वीन हसबेंड एंड वाइफ़' को ज़रा भी सफलता नहीं मिली। इस दूसरी फ़िल्म में जैकी श्राफ, सोनू सूद, तनिष्ठा और मंदिरा बेदी जैसे कलाकार थे. लेकिन यह फ़िल्म ठीक से थिएटर तक भी नहीं पहुँच पायी। इस विषय पर तीसरी फिल्म आई 'निकाह'। निर्माता निर्देशक बीआर चोपड़ा की 'निकाह' तीन तलाक को लेकर बनी एक ऐसी फ़िल्म थी, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के दर्द के विभिन्न पहलुओं को बहुत बरीकी से दिखाया गया था। 'निकाह' फिल्म बनाने में चोपड़ा को कई मुश्किलें आईं। शुरू होने से पहले ही कई लोगों ने अदालत का दरवाज़ा तक खटकाया लेकिन किसी तरह ये फिल्म पूरी हुई।
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तीन तलाक - फोटो : Twitter
'निकाह' फिल्म 24 सितम्बर 1982 को रिलीज़ हुई तो इसे देखने के लिए पहले दिन ही मुंबई सहित देश के कई सिनेमा घरों में लंबी लंबी कतारें लग गईं। हालांकि फिल्म प्रदर्शन के दो दिन बाद कुछ मुस्लिम संगठनों ने 'निकाह' को न देखने के लिए मुंबई के कुछ सिनेमा घरों पर पोस्टर भी लगवा दिए थे लेकिन फ़िल्म की कहानी, संवाद और गीतों ने ऐसी धूम मचाई कि अधिकतर थिएटर्स पर 'हाउस फुल' के बोर्ड लग जाते थे। 'निकाह' की कहानी को लिखा था -अचला नागर ने। इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर के 'सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखिका' सहित कई अन्य पुरस्कार भी मिले। साथ ही कई फिल्मकार उनसे अपनी फिल्में लिखवाने के लिए मचलने लगे। इनमें बाद में चोपड़ा की 'बागबान' और 'बाबुल' भी अचला नागर ने लिखी।
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तीन तलाक - फोटो : instagram

साथ ही आख़िर क्यों, ईश्वर, नगीना, निगाहें, नजराना, आदमी खिलौना है, सैलाब, सदा सुहागन और मेरा पति सिर्फ़ मेरा है जैसी कई फिल्में भी अचला जी ने ही लिखीं। लेकिन जब उन्होंने 'निकाह' लिखी तब वो नई नई थीं। आकाशवाणी मथुरा में काम करती थीं। इसके अलावा उनकी एक पहचान यह थी कि वह महान साहित्यकार अमृतलाल नागर की बेटी हैं। असल में अचला नागर ने 'निकाह' की कहानी 'माधुरी' पत्रिका के लिए लिखी थी। उनकी यह कहानी कैसे 'निकाह' फ़िल्म के रूप में आई यह भी दिलचस्प है। अचला नागर बताती हैं, "मैं कुछ न कुछ लिखती रहती थी। साल 1980 में अपने मुंबई प्रवास के दौरान मैं 'धर्मयुग' में गई तो वहीं पर 'माधुरी' के संपादक विनोद तिवारी से मुलाकात हुई, उन्होंने कहा कि 'माधुरी' के लिए कोई कहानी लिखिए।"

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जीनत अमान

'माधुरी' यूं तो फिल्म पत्रिका थी लेकिन विनोद तिवारी ने उसमें 'साहित्य मंथन' स्तंभ में ऐसी कहानियाँ देनी शुरू की थीं जिन पर फिल्मकार फिल्म बनाना चाहें तो बना सकें। कुछ समय बाद अचला नागर ने 'तोहफा' नाम से एक कहानी लिख 'माधुरी' में दे दी। यहाँ यह भी बता दें कि अचला नागर को अपनी 'तोहफ़ा' कहानी का तीन तलाक वाला आइडिया अभिनेता संजय ख़ान और अभिनेत्री ज़ीनत अमान की एक ख़बर से मिला था। अचला बताती हैं, "एक दिन एक फ़िल्म पत्रिका में मैंने ख़बर पढ़ी कि संजय ख़ान ने अपनी फिल्म 'अब्दुल्लाह' की शूटिंग के दौरान फिल्म की नायिका ज़ीनत अमान से शादी करने के बाद उन्हें तलाक दे दिया लेकिन अब वह हलाला की रस्म करके फिर से शादी करना चाहते हैं।"

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सलमा आगा
अचला नागर ने बताया, "मुझे यह खबर पल्ले नहीं पड़ी। तब इस खबर को समझने के लिए आकाशवाणी के तबला वादक बाबू खाँ से पूछा तो उन्होंने बताया की हलाला क्या है और दोबारा निकाह करने के लिए किस तरह उस औरत को ज़लालत की ज़िदगी जीने पर मजबूर होना पड़ता है। बस उसी के बाद मेरे दिमाग में इस कहानी का जन्म हुआ। बाद में यह 'निकाह' फ़िल्म बनकर सभी के सामने पहुंची।" 'तोहफ़ा' नाम की उनकी यह कहानी कभी फिल्म बनेगी इसकी कल्पना अचला नागर को दूर दूर तक नहीं थी। 'माधुरी' में यह अक्तूबर 1981 में प्रकाशित हुई लेकिन उससे पहले अचला नागर ने अपनी कहानी को खुद ही नाटक का रूप देकर आकाशवाणी मथुरा से प्रसारित कर दिया। इसी दौरान जब बीआर चोपड़ा 'इंसाफ का तराजू' की शूटिंग में व्यस्त थे, वो एक इंटरव्यू के सिलसिले में उनसे मिलीं। वो उन दिनों वीसीआर आने के कारण टेली फिल्म की योजनाओं पर भी काम कर रहे थे।

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सलमा आगा
चोपड़ा से मुलाकात के दौरान अचला ने तब 'तोहफ़ा' नाटक की पटकथा भी उन्हें दे दी। चोपड़ा को ये कहानी इतनी पसंद आई कि उन्होंने इस पर टेली फिल्म की जगह फ़ीचर फ़िल्म बनाने का फैसला ले लिया। चोपड़ा ने इस कहानी पर अपनी लेखकीय टीम के राही मासूम रजा और पंडित नरेंद्र शर्मा से कई पहलुओं पर बात की। फिल्म का नाम उन्होंने 'तलाक, तलाक तलाक' रखने का फैसला किया। लेकिन बाद में इसका नाम 'निकाह' रख दिया गया। पाकिस्तान मूल की सलमा आगा को फिल्म की नायिका नीलोफर का रोल दिया गया। राज बब्बर को उनके प्रेमी हैदर और दीपक पाराशर को नीलोफर के शौहर नवाब वसीम का किरदार मिला। हैदराबाद की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में दिखाया गया कि ओसमानिया यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए शायर मिजाज के हैदर अपने साथ पढ़ रही नीलोफर को दिल दे बैठता है जबकि नीलोफ़र की सगाई नवाब ख़ानदान के वसीम से हो चुकी है। वसीम और नीलोफ़र जल्द निकाह कर लेते हैं। हनीमून भी मनाते हैं लेकिन कुछ दिन बाद हालात बदलने लगते हैं।

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सलमा आगा, निकाह

अपनी बिज़नेस की ज़िम्मेदारियों में वसीम के दिन रात व्यस्त रहने से नीलोफ़र ख़ुद को अकेला महसूस करती है। यहाँ तक जब अपनी शादी की पहली सालगिरह की पार्टी पर भी वसीम नहीं पहुँचता तो नीलोफ़र बिफर उठती है। रात को दोनों के बीच इतना झगड़ा होता है कि वसीम गुस्से में नीलोफर को तलाक़ तलाक़ तलाक़ बोल देता है। नीलोफ़र, वसीम का घर छोड़ देती है और इसी दौरान उसकी मुलाक़ात हैदर से होती है जो एक पत्रिका का संपादक है। दोनों जल्द ही करीब आ जाते हैं। उधर वसीम भी फिर से नीलोफ़र से शादी करना चाहता है। वह नीलोफर को खत लिखकर कहता है कि वह हैदर से तलाक लेकर उससे फिर से शादी कर ले। हैदर उस खत को पढ़ता है तो समझता है कि नीलोफर अब भी अपने पहले पति वसीम से प्यार करती है। यह सोच हैदर, नीलोफर के जन्म दिन पर वसीम को अपने यहाँ बुलाकर, उसे जन्मदिन के तोहफे के रूप में नीलोफ़र के सामने पेश करता है। यह देख नीलोफर ग़ुस्से आगबबूला हो जाती है और कहती है, "मैं कोई जायदाद नहीं। मैं जीती जागती औरत हूँ, ज़िंदा लाश नहीं। जिसकी मर्दाना समाज अपनी मर्जी से कब्रें बदलता रहे।"

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डेनमार्क में बुर्का पहने महिलाएं
फिल्म के कितने ही संवाद औरत के तलाक के दर्द और भय को दिखाने के साथ मर्दों के जुल्म ओ सितम को दर्शाते हैं। फिल्म का अंत तो ऐसा था जिसे देख महिलाएं रो पड़ती थीं। फिल्म की लेखिका अचला नागर कहती हैं, "आज भी मेरे कानों में दर्शकों की वे तालियाँ गूँजती हैं, जो वे मेरे संवादों पर बजाते थे लेकिन यह सच है कि इस फिल्म को इतना अच्छा और यादगार बनाने का श्रेय सिर्फ बीआर चोपड़ा को जाता है। मेरी कहानी को उन्होंने जो शिखर दिया वो शायद कोई और फ़िल्मकार नहीं दे पाता। जितना मैं अपनी फ़िल्म की सफलता से खुश थी उससे ज़्यादा अब खुश हूँ, जब देश की महिलाओं को तीन तलाक से आज़ादी मिलकर उन्हें अपनी ज़िंदगी इज्जत और अपने ढंग से जीने का क़ानूनी हक़ मिला है।
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