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बाइस्कोप: आज ही के दिन रिलीज हुई थी सलीम-जावेद की पहली फिल्म 'अधिकार', ऐसे बनी जादू और गुल्लू की जोड़ी

Tue, 28 Apr 2020 07:20 PM IST
shrilata biswas पंकज शुक्ल, मुंबई
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अधिकार - फोटो : फाइल
क्या आपने गुल्लू और जादू की जोड़ी के बारे में सुना है? आप कहेंगे कि ये क्या सवाल हुआ भला। सवाल ये इसलिए है कि बाइस्कोप में आज जिस फिल्म के बारे में हम बात करने जा रहे हैं, उसका सिलसिला इन्हीं दो नौजवानों की जोड़ी से जुड़ता है। फिल्म है आज ही के दिन यानी 28 अप्रैल को साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म अधिकार, जिसके सितारे हैं, अशोक कुमार, देब मुखर्जी, नंदा, हेलेन और प्राण। इस नाम से हिंदी सिनेमा में दो फिल्में और भी रिलीज हुई हैं। एक थी इससे पहले 1954 में आई किशोर कुमार और उषा किरण स्टारर मोहन सहगल निर्देशित अधिकार और दूसरी रिलीज हुई 1986 में। विजय सदाना के निर्देशन में बनी इस अधिकार में राजेश खन्ना और टीना मुनीम लीड रोल में थे।
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सलीम, जावेद - फोटो : फाइल
खैर, हम तो बात कर रहे थे साल 1971 में रिलीज हुई अधिकार की। इस फिल्म की पटकथा एक छोटी सी कहानी सुनने के बाद इसके लेखकों ने सिर्फ 12 दिन में रच डाली थी। फिल्म में इसके लेखकों का नाम भी नहीं गया लेकिन ये पहली फिल्म है जिसे गुल्लू यानी सलीम खान और जादू यानी जावेद अख्तर ने मिलकर एक साथ लिखी। यानी कि आप कह सकते हैं कि सलीम-जावेद की एक साथ लिखी ये पहली फिल्म रही। फिल्म देखेंगे तो इसमें कहीं आपको सलीम जावेद का नाम नहीं मिलेगा। हिंदी सिनेमा में भूत लेखन (घोस्ट राइटिंग) की परंपरा शुरू से ही चलती रही है, लिखता कोई और है नाम किसी और का होता है। मुंबई के शायर ओबैद आजम आजमी मुशायरों के दौरान दोस्तों से जो कुछ कहते हैं, उस पर यकीन करें तो ये सिलसिला बदस्तूर आज भी जारी है।
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जावेद अख्तर - फोटो : फाइल
बाइस्कोप में आज हम आपको बताते हैं कि फिल्म अधिकार के लिए सलीम और जावेद की जोड़ी बनी कैसे। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि मशहूर लेखक और शायर जावेद अख्तर के वालिद जां निसार अख्तर देश के नामचीन शायरों में हुआ करते थे। जिन दिनों गुरु दत्त के साथ रहकर सिनेमा सीखने का सपना लिए जावेद अख्तर बंबई पहुंचे थे, तब जां निसार अख्तर अपना ज्यादातर वक्त गुमनामी में बिताया करते थे। वजह थी उनका कम्युनिस्ट होना और उनके खिलाफ दायर तमाम मामलों की वजह से लगातार पुलिस का उनके पीछे लगे रहना। जावेद अख्तर कुछ दिन रहे अपने वालिद के यहां लेकिन कहते हैं कि अपनी सौतेली मां से उनकी बनी नहीं और एक दिन वह यूं ही बिना बताए घर से निकल लिए।

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जावेद अख्तर - फोटो : फाइल
कमाल अमरोही के यहां जावेद अख्तर को पहली नौकरी मिली। रहने को कोई जगह थी नहीं तो वह वहीं कमालिस्तान स्टूडियो के गोदाम में सो जाया करते थे। गिनती के तीन जोड़ी कपड़े थे और उन्हीं को अदल बदल कर वह पहना करते। कई बार तो वहीं लॉन्ड्री की दुकान पर भी उन्होंने खड़े खड़े अपने कपड़े बदल लिए। कमाल अमरोही की गोदाम में उन्हें फिल्मफेयर की वो ट्रॉफियां भी पड़ी मिलीं जो मीना कुमारी को उनके बेहतरीन अभिनय के लिए दी गई थीं। गुरबत के दिनों में जावेद को उन ट्रॉफियों से बड़ा हौसला मिलता और वह उन्हें सीने से लगाकर फर्श पर सोया करते। कहते हैं कि इन ट्रॉफियों को हाथ में लेकर जावेद तमाम तरह की तकरीरें भी किया करते थे, जाहिर सी बात है कि ये तकरीरें बाद में कई बार जावेद अख्तर को फिल्मफेयर के मंच पर असली तकरीरें देने के काम आईं।
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Salman Khan and Salim Khan - फोटो : Instagram
जिन दिनों जावेद अख्तर बंबई की सड़कों पर ठोकरें खाते घूम रहे थे, उन्हीं दिनों इंदौर के एक डीआईजी का बेटा बंबई में ‘दिलीप कुमार की दुकान बंद करा देने’ के सपने लिए स्टूडियो स्टूडियो घूम रहा था। प्यार से लोग घर पर इन्हें गुल्लू कहकर बुलाते थे और असल नाम था इनका सलीम खान। इंदौर के अपने कॉलेज में दोस्तों के लिए प्रेम पत्र लिखने वाले के तौर पर मशहूर रहे सलीम को ये समझ आने लगा था कि हिंदी सिनेमा में कहानी का रुतबा तो होता है लेकिन इन्हें लिखने वाले रुआबदार नहीं होते। अक्सर जब वो शूटिंग पर होते तो फिल्म के राइटर का कोई असिस्टेंट वही सेट पर बैठे सीन लिख रहा होता। ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ।
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सलीम खान - फोटो : फाइल
ये वाक्या है निर्देशक एसएम सागर की फिल्म सरहदी लुटेरा का। सलीम खान इस फिल्म में सेकेंड लीड रोल कर रहे थे और अब तक अपने सीन और अपने डॉयलॉग खुद लिखना उन्हें अच्छा लगने लगा था। इसी फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर या कहें कि क्लैपर बॉय की नौकरी लगी जावेद अख्तर की। एक दिन फिल्म का राइटर लापता हो गया तो फिल्म के निर्देशक ने अपने इस असिस्टेंट को कहा कि सीन वह ही लिख दे। सीन जो लिखा गया तो वह फिल्म के सेकेंड हीरो को बहुत पसंद आया। सलीम खान ने सीन लिखने वाले यानी जावेद अख्तर से मुलाकात की और यहां से जो जोड़ी बनी उसे नाम मिला, सलीम-जावेद। जावेद को उन्हीं दिनों धर्मेंद्र और शर्मिला टैगोर की फिल्म यकीन में डायलॉग लिखने का भी काम मिल गया था और वह अंधेरी से निकलकर बांद्रा आ गए थे। दोनों दोस्त खूब मिलते, गप्पे मारते, साथ में सिनेमा देखते और मस्ती करते लेकिन गुरबत ने अभी दामन छोड़ा नहीं था।
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सलीम, जावेद - फोटो : फाइल
इसी मुसीबत ने दोनों को साथ आने का बेहतरीन मौका दिया। सरहदी लुटेरा के निर्देशक एसएम सागर ने दोनों को बिठाकर एक दिन एक कहानी सुनाई और इस पर एक स्क्रिप्ट लिखने को कहा। दोनों दोस्त खाली ही थे। कुल जमा 12 दिन में दोनों ने मिलकर फिल्म की स्क्रिप्ट लिख डाली। उस दशक में बिन ब्याही मां वाले एंगल पर बनने वाली तमाम फिल्मों में ये फिल्म भी शुमार रही। इसे लिखने के लिए सलीम-जावेद को उन दिनों मिले थे पांच हजार रुपये। पैसे ही उन दिनों दोनों की पहली जरूरत थी।

फिल्म के क्रेडिट्स में दोनों का नाम कहीं नहीं है लेकिन एसएम सागर के असिस्टेंट सुधीर वाही को दोनों का काम इतना पसंद आया कि उन्होंने दोनों को सिप्पी फिल्म्स के दफ्तर जाकर जीपी सिप्पी से मिलने को कहा। जीपी सिप्पी की उन दिनों दसों अंगुलियां घी में थीं। शम्मी कपूर के साथ बनाई फिल्म ब्रह्मचारी हिट हो चुकी थी। राजेश खन्ना को लेकर बनाई गई उनकी फिल्म बंधन के चर्चे भी खूब थे। और, जीपी सिप्पी के बेटे रमेश सिप्पी को लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की पढ़ाई बीच में छोड़े सात साल हो चुके थे। रमेश सिप्पी और सलीम-जावेद की तिकड़ी कैसे बनी और कैसे बनी इस तिकड़ी की पहली फिल्म अंदाज, इसका किस्सा फिर कभी।
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अधिकार - फोटो : फाइल
फिल्म अधिकार का एक गाना बहुत हिट हुआ था जिसके बोल हैं, रेखा ओ रेखा, जबसे तुम्हें देखा... तो चलते चलते सुनते हैं, मेरा मतलब है देखते जाइए फिल्म अधिकार का ये गाना..
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