तेरे मेरे सपने
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और, उस सुबह के बाद किसी भी सुबह विजय आनंद ने कभी भी अपने बड़े भाई देव आनंद को अपने फैसले पर पछताने का मौका नहीं दिया। जो भरोसा देव आनंद ने उनके टैलेंट पर जताया उसे गोल्डी ने आखिर तक बनाए रखने की पूरी कोशिश की। नौ दो ग्यारह के बाद काला बाजार, फिर तेरे घर के सामने, गाइड, ज्वेल थीफ, जॉनी मेरा नाम और फिर तेरे मेरे सपने। तेरे मेरे सपने ही वह फिल्म है जिसने फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी और मराठी का झगड़ा शुरू किया। मुंबई में दादर के कोहिनूर सिनेमा में दादा कोंडके की फिल्म सोनगड्या लगी हुई थी। थिएटर मालिक को लगा कि देव आनंद की फिल्म है तो टिकट भी महंगी बिक सकती है और मुनाफा भी बढ़ सकता है तो उन्होंने दादा कोंडके की फिल्म हटाकर देव आनंद की ये फिल्म लगा दी। बात बाल ठाकरे तक पहुंची। शिव सेना का दफ्तर भी दादर में ही है। बस फिर क्या था, ठाकरे सीधे दफ्तर से निकले और जा धमके कोहिनूर थिएटर। देव आनंद की फिल्म के पोस्टर वहीं खड़े होकर उतरवाए और मराठी फिल्म फिर से वहां चलवाई। तेरे मेरे सपने एक तरह से विजय आनंद का विदा गान भी है। इसके बाद उन्होंने ब्लैकमेल, छुपा रुस्तम, बुलेट, राम बलराम और राजपूत जैसी फिल्में तो बनाईं, लेकिन गाइड या ज्वैल थीफ जैसा आकर्षण इन फिल्मों से कहीं गायब रहा। कहते हैं कि ठाकरे ने तेरे मेरे सपने को कोहिनूर सिनेमा से उतरवाकर मराठियों के बीच अपनी नाक तो ऊंची कर ली, लेकिन विजय आनंद को इससे बहुत बड़ा झटका भी लगा।