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सोनल सहगल ने खास बातचीत में खोले अपने लेस्बियन किरदार के राज, इसलिए बनीं फिल्म लिहाफ की बेगम

Sat, 12 Oct 2019 04:00 PM IST
anand anand मुंबई डेस्क, अमर उजाला
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Sonal Sehgal - फोटो : amar ujala mumbai
मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की चर्चित कहानी लिहाफ में बेगम का किरदार करने वाली अभिनेत्री सोनल सहगल की खुशियां इन दिनों एक के बाद एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों की तालियां गिनने में व्यस्त हैं। बर्लिन, स्टटगार्ट, स्वीडन, बॉस्टन, मोंटोगोमरी और सिंगापुर के फिल्म समारोहों में फिल्म लिहाफ को जबर्दस्त तारीफें मिली हैं और अब जल्द ही ये फिल्म कोरिया, हैमबर्ग और मेक्सिको के फिल्म समारोहों में प्रदर्शित होने वाली है।
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Sonal Sehgal - फोटो : amar ujala mumbai
अभिनेत्री सोनल सहगल इस फिल्म की सह-लेखिका भी हैं और फिल्म समारोहों में फिल्म को मिल रही इस तवज्जो से गदगद हैं। अमर उजाला ने सोनल से जब इस फिल्म की चर्चा की तो वह कहती हैं, “मैंने ये कहानी पहली बार तब पढ़ी थी जब मैं 19 साल की थी। ये कहानी तब से मेरे ख्यालों का हिस्सा रही है। जब फिल्म के निर्देशक राहत काजमी ने इस कहानी का जिक्र मुझसे किया औऱ कहा कि वह इस पर मेरे साथ फिल्म बनाना चाहते हैं तो मेरी तो जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई।”
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Sonal Sehgal - फोटो : amar ujala mumbai
सोनल आगे बताती हैं, “इसके बाद मैंने इस कहानी की गहराई को करीब से महसूस करना शुरू किया और ये भी समझे की कोशिश की कि जिस दौर में ये कहानी लिखी गई उस वक्त इस्मत पर क्या बीती होगी। फिल्म लिहाफ की पटकथा इस्मत चुगताई की कहानी के साथ साथ कहानी के प्रकाशन के समय इस्मत पर आई मुसीबतों, दोनों की बात करती है।”

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Sonal Sehgal - फोटो : social media
इस्मत चुगताई की कहानी लिहाफ पहली बार साल 1942 में प्रकाशित हुई और इस कहानी के लिए उन्हें बहुत कुछ सुनना पड़ा। यहां तक कि उनके खिलाफ अश्लील साहित्य लिखने का मुकदमा भी दर्ज हुआ, लेकिन इस्मत ने हार नहीं मानी।
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Sonal Sehgal - फोटो : social media
सोनल इस बात का जिक्र चलने पर कहती हैं, “फिल्म में बेगम का जो किरदार मैंने किया है, वह मेरे दिलोदिमाग पर अरसे तक तारी रहा। कल्पना कीजिए एक ऐसी महिला की जो 1920 के माहौल में एक पारंपरिक परिवार में रह रही है। उसकी शादी में उसे प्यार नहीं मिला और वह अपनी मालिश करने वाली के साथ संबंध बना लेती है। ये किरदार रोने धोने वाली महिला का किरदार नहीं है। ये किरदार अपनी समस्याओं का हल खुद तलाशता है। फिल्म अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की भी बात करती है और आज के समय के हिसाब से विषय फिर एक बार बहुत सामयिक हो गया है।”

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