दादी के साथ सलोनी गौड़
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
लेकिन, आज देश में लाखों सलोनियां ऐसी हैं जिन्हें घर में या अपने बड़े भाई का इस तरह का साथ नहीं मिलता, उन्हें अपनी पसंद का काम करने के लिए क्या करना चाहिए?
पहले तो मैं ये एक बात स्पष्ट कर दूं कि मुझे मेरे भाई का कोई सहयोग नहीं मिला। पहले तो मुझे वह सोशल मीडिया पर फॉलो भी नहीं करते थे। कहते थे कि किसी दिन कोई वीडियो वायरल हो गया तो मैं फॉलो करूंगा। मैंने जो किया खुद से किया। हां, उनका इस बात में साथ मिला कि वह मम्मी पापा को बोलते रहे कि ये जो कर रही है करने दो। मेरी मम्मी (कविता शर्मा) आज भी कहती रहती हैं कि बैंक में जगह निकलें तो फॉर्म जरूर भर देना। हर माता पिता अपनी संतान को ऐसे पेशे में देखना चाहता है कि जहां उसकी नियमित आमदनी हो। मेरा इस बारे में ये कहना है कि पहले अपनी पढ़ाई स्नातक तक पूरी करना जरूरी है, फिर खुद को आंकना जरूरी है। आप क्या करना चाहते हैं, उसके लिए ये जांचना जरूरी है कि आपके भीतर उस क्षेत्र में कुछ अलग कर सकने की काबिलियत है कि नहीं।
इतनी कम उम्र में इतनी समझदारी आई कहां से?
मेरे पापा भूपेंद्र शर्मा मुझसे हमेशा दो ही बातें कहते थे। एक, स्कूल जाओ तो अच्छे से नाश्ता करके जाओ। उन दिनों बच्चे धूप में खड़े होकर जब प्रार्थना करते थे तो आधे बच्चे तो चक्कर खाकर गिर ही जाते थे। मेरे पापा कहते थे कि कभी ऐसे गिरना नहीं है। दूसरा ये है कि हमेशा घर से अखबार पढ़कर जाओ। हमारे घर शुरू से अमर उजाला ही आता है। पापा तब दुकान से रात 10 बजे भी आते तो हम साथ में समाचार सुनते थे। पहले तो हम बस पापा को सुनते थे फिर हम बड़े हुए तो हमने भी पापा के साथ चर्चा करनी शुरू कर दी। अमर उजाला में जब मेरी पहली खबर छपी तो दादी को बहुत अच्छा लगा, उनको पहले तो यकीन नहीं हुआ तो उन्होंने पापा से पूछा। मेरे तमाम इंटरव्यू और खबरें अंग्रेजी के अखबारों में छप चुके हैं लेकिन घर के अखबार में छपने की बात ही कुछ और है।