अपनी संजीदा अदाकारी से हिंदी सिनेमा जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले दिग्गज अभिनेता संजीव कुमार का पूरा करियर सभी के लिये एक मिसाल है। गुजराती परिवार में जन्मे संजीव ने रंगमंच से अपनी एक्टिंग करियर की शुरुआत की। फिल्म जगत में उन्हें पहला मौका मशहूर फिल्मकार एस. मुखर्जी ने दिया था। 1960 में फिल्मालय स्टूडियो के बैनर तले रिलीज हुई फिल्म हम हिंदुस्तानी में संजीव एक पुलिस अफसर के किरदार में नजर आये।
विज्ञापन
2 of 8
filmalaya studio
- फोटो : amar ujala
फिल्म में अभिनेता का किरदार तो मात्र दो मिनट का था हालांकि इसके बाद संजीव ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। संजीव कुमार अपने काम को लेकर जितने संजीदा थे, निजी जिंदगी में वह उतने ही जिंदादिल भी रहे। दिग्गज कलाकार के व्यक्तित्व को जानने के लिये अमर उजाला, संजीव कुमार को पहला मौका देने वाले फिल्मालय स्टूडियो पहुंचा जहां अभिनेता के काम के गवाह रहे 80 वर्षीय आबिद ने संजीव कुमार से जुड़ी दिलचस्प बाते बताईं।
विज्ञापन
3 of 8
amitabh bachchan and sanjeev kumar
- फोटो : file photo
फिल्मालय में सीखी एक्टिंग की बारीकियां
गुजरे जमाने में एस. मुखर्जी के सेकेट्ररी और मौजूदा फिल्मालय स्टूडियो के कानूनी सलाहकार 80 वर्षीय आबिद के पास वैसे तो फिल्मालय स्टूडियो से जुड़े दर्जनों कलाकार के ढेरों किस्से हैं लेकिन संजीव कुमार को लेकर उन्होंने अमर उजाला को कुछ खास बातें बताईं। आबिद ने बताया, 'संजीव कुमार एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे। वह एक्टिंग की दुनिया में किसी मजबूरी या पैसों की किल्लत के कारण नहीं बल्कि अपने रुझान के कारण आए।'
4 of 8
sanjeev kumar
'उन्होंने पहले इप्टा और इंडियन नेशनल थियेटर में रंगमंच सीखा जिसके बाद वह फिल्मालय एक्टिंग स्कूल का हिस्सा बन गये। यहां उन्होंने करीब दो साल तक नि:शुल्क, अदाकारी की बारीकियां सीखी। साल 1960 में उन्हें फिल्मालय के ही बैनर तले बनी फिल्म हम हिंदुस्तानी से पहली बार हिंदी फिल्म जगत में कदम रखने का मौका मिला।'
विज्ञापन
5 of 8
filmalaya
- फोटो : amar ujala
मुखर्जी परिवार के करीबी थे संजीव
आबिद ने आगे बताया, 'संजीव कुमार, एस. मुखर्जी साहब की काफी इज्जत करते थे। मुखर्जी परिवार के लिए वह घर के बच्चे की तरह थे। फिल्मालय में प्रशिक्षण और पहली फिल्म के बाद उन्होंने जिंदगी में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह अपने एक्टिंग से उस जमाने के सुपरस्टार्स को भी टक्कर देते थे।' आबिद ने संजीव कुमार के व्यवहार को लेकर बताया, 'वह एक शानदार इंसान थे। हर किसी से खुशी से मिलते थे। उन्होंने कभी लोगों में भेदभाव भी नहीं किया। शूट के दौरान भी जब वह स्टूडियो आते तो वह सेट पर मौजूद स्टार्स से लेकर स्पॉटबॉय तक से खुलकर मिलते।'
विज्ञापन
6 of 8
sanjeev kumar
'मुझसे भी उनकी खास घनिष्ठता रही। कई बार तो वह बातचीत के दौरान मुझसे भी कई दिलचस्प बातों को साझा कर दिया करते थे। उनके पास हर कोई अपनी परेशानी लेकर आता था। भले ही संजीव कुमार किसी को न पहचानते हों लेकिन वह किसी की भी परेशानी सुनने से पीछे नहीं हटते थे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि काम से लेकर निजी जिंदगी में वह एक जिंदादिल इंसान रहे। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि लोग उनके पास खींचे चले आते थे।'
विज्ञापन
7 of 8
filmalaya
- फोटो : amar ujala
सुनसान पड़ा फिल्मालय स्टूडियो
फिल्मालय स्टूडियो की बात करें तो कुछ साल पहले इस परिसर का पुराना ढांचा गिरा कर नई इमारत खड़ी की गई है। हालांकि अभी परिसर पूरी तरह से खाली पड़ा हुआ है। रोजाना आने वाले कर्मचारियों के अलावा स्टूडियो में किसी भी तरह की फिल्मी हलचल दिखाई नहीं देती है। परिसर की दिवारों पर मुखर्जी परिवार की तस्वीरों के अलावा देवी-देवताओं की तस्वीरें लगी दिखाई देती हैं।
47 वर्ष की उम्र में मृत्यु
गौरतलब है कि साल 1970 में रिलीज हुई फिल्म खिलौना की जबरदस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार ने नायक के रूप में अपनी अलग पहचान बना ली। जिसके बाद उन्होंने दस्तक(1970) और कोशिश (1972) के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया। इसके अलावा उन्होंने फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता व सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार भी हासिल किया। संजीव कुमार आजीवन कुंवारे रहे और मात्र 47 वर्ष की आयु में 6 नवंबर 1984 को दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गयी। हिंदी फिल्म जगत में उनके महान और अभूतपूर्व कार्य की छाप हमेशा अमिट रहेगी।