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दो बार मरते-मरते बचा बॉलीवुड का 'टीपू सुल्तान', 6 महीने में 100 फिल्में साइन कर बनाया था रिकॉर्ड

Mon, 29 Oct 2018 02:45 PM IST
रवि बुले
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sanjay khan - फोटो : social media
संजय खान फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में एक साथ कई भूमिकाओं में सक्रिय रहे। अभिनेता, लेखक, निर्देशक और निर्माता। 55 साल लंबा उनका करिअर है। एक दौर में वह सिनेमा के सबसे खूबसूरत चेहरे के रूप में पहचाने गए और टीवी पर दर्शकों ने उन्हें टीपू सुल्तान के बेहतरीन किरदार में देखा। संजय खान फैन्स के लिए अब आत्मकथा ‘द बेस्ट मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ’ लाए हैं। इस किताब को लेकर संजय खान ने रवि बुले को विशेष बातचीत में बताया...
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मेरी जिंदगी परमाणु विस्फोट की मिसाल है। इसमें कई-कई घटनाएं हैं। मैंने न केवल बड़ी और कामयाब फिल्मों में ऊंचाई हासिल की बल्कि कुछ फिल्में 75 हफ्ते तक चली। हैरानी होती है कि एक दौर में हिंदुस्तान के लोगों और मीडिया ने मुझे सबसे खूबसूरत हीरो का खिताब दिया, हालांकि ये बातें मुझे इंप्रेस नहीं करती क्योंकि खूबसूरती और कला कुदरती है। मैं कलाकार हूं लेकिन मेरी जिंदगी की और भी शाखें हैं। 
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संजय खान एक सर्वाइवर भी है। कई बार जानलेवा हमले हुए। मेरा हेलीकॉप्टर क्रैश हुआ, 800 फीट की ऊंचाई से गिरा था। मैसूर फायर ट्रेजडी मेरे साथ हुई, जिसमें 52 लोग मारे गए। एक दिन मेरे पास आत्मकथा को प्रकाशित करने वाली कंपनी की हेड का फोन आया- हम आपकी आत्मकथा प्रकाशित करना चाहते हैं। तब मेरे दिमाग में सन्नाटा था परंतु थोड़ी देर बाद पुरानी यादें जेहन में आने लगीं। जिन्हें लिखने में मुझे एक साल लगा।

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sanjay khan - फोटो : social media
मेरी जिंदगी में बहुत उथल-पुथल रही। वह नॉर्मल एक्टर की जिंदगी नहीं है। दुनिया के तमाम देशों के राजाओं, राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्राध्यक्षों से मेरी दोस्ती रही। एक सामान्य एक्टर की जिंदगी में इतना कुछ नहीं होता। अगर वह दुनिया की किसी बड़ी हस्ती से मिलता है तो हैंडशेक करके वे भूल जाते हैं। मेरा स्वभाव ऐसा है कि अगर मैं किसी से हाथ मिलाता हूं और आदमी अच्छे लगते हैं तो दोस्ती निभाता हूं। 
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‘द बेस्ट मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ’ में यह सब भरपूर लिखा है। मैंने किताब का टाइटल यह क्यों रखा? इसका एक राज है। जिसे मैंने 18वें अध्याय में खोला। इस टाइटल को मेरे इकबालिया बयान की तरह मत लीजिए। किताब लिखते हुए सेल्फ डिस्कवरी भी हुई। मैंने ध्यान रखा कि किताब में तथ्य तो सही आएं ही, जिंदगी के सफर की कहानी भी खूबसूरती से कही जाए।
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जब मैं बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में आया, जुहू में रहता था। पास में रहते थे सत्येन बोस। बड़े डायरेक्टर। उन्होंने मुझे अपनी फिल्म दोस्ती (1964) में मौका दिया। ताराचंद बड़जात्या (राजश्री प्रोडक्शंस) के पास ले गए। वह मुझे देखकर खुश हुए। उन्होंने कहा, आपका नाम है शाह अब्बास खान। एक हैं के.ए. अब्बास (राइटर)। दूसरे हैं एस.एम. अब्बास (डायरेक्टर)। तीसरे अब्बास एक्शन कंपोजर है। आपका नाम अब्बास खान लिखूं तो कंफ्यूजन होगा। आपको ऐतराज है अगर आपका नाम संजय रखूं? मैं राजी हो गया। 
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उसी वक्त एक और एक्टर संजय कुमार के नाम से कदम रख रहा था। उसे पता चला तो उसने फोन किया- आपने मेरा नाम कैसे रख लिया? मैंने कहा कि भाई मुझे नहीं मालूम कि आप कौन हैं। सत्येन बोस ने मेरे नाम का ऐलान कर दिया है। मैं इसका जिम्मेदार नहीं हूं लेकिन मुझे आपसे हमदर्दी है। फिर मैंने कहा कि वैसे संजीव भी बड़ा अच्छा नाम है, आप संजीव क्यों नहीं रख लेते? वह हंसे और हंसकर बोले कि अच्छा मैं यही रख लूंगा। तो मैंने कहा कि हम अब दोस्त रहेंगे। फिर हम ताउम्र दोस्त रहे। मेरे वह दोस्त थे, संजीव कुमार।

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जब दोस्ती हिट हुई तो ताराचंद जी ने बुलाया। मैं उनके दाहिने हाथ की तरफ खड़ा था। एक खाता उन्होंने खोला, एक पेज पर आए और बोले देख बेटा, एक करोड़ 51 लाख रुपये। हमने बिजनेस किया है। संगम (1964) से चार लाख ज्यादा। संगम 60 लाख में बनी ब्लॉकबस्टर थी और हम चार लाख रुपये की ब्लैक एंड व्हाइट पिक्चर थे। नेशनल अवॉर्ड मिला दोस्ती को। फिल्म सुपर-डुपर हिट थी। छठे हफ्ते में थी। 

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मैंने सत्येन बोस से कहा- दादा पिक्चर हिट हुई है और आज तक मेरे दरवाजे पर किसी ने दस्तक नही दीं। मैं बहुत टूटा हुआ हूं। क्या होगा मेरा भविष्य? मैंने मजाक में कहा कि दादा लगता है, खुदकशी कर लूं। वह बोले- तू देख दो-तीन हफ्ते में क्या आदमी बनने वाला है। जैसे ही उन्होंने कहा कि मेरे दरवाजे की घंटी बजी और सिलसिला शुरू हुआ। फिर छह महीने के अंदर मैंने हीरो के रूप में 100 फिल्में साइन कर लीं। जिनमें उस दौर की सारी बेहतरीन अदाकाराएं थीं। नूतन, नंदा, साधना, हेमा मालिनी से लेकर रेखा समेत कई नई लड़कियां थीं। एक दिन में मैंने तब पांच फिल्में साइन कीं। कभी तीन-तीन और कभी दो-दो फिल्में साइन की।

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मैंने 11 साल की उम्र तक फिल्म नहीं देखी थी। पिता मॉडर्न थे परंतु उनका मानना था कि फिल्में बच्चों को लिए नहीं हैं। तब एक फिल्म आई आवारा (1951)। उसके गाने सुन कर मैं पागल हो जाता था। अपने एक नौकर को फुसलाया कर हम दोनों पिक्चर देखने गए। पिक्चर देखी तो लगा कि कौन सी दुनिया में आ गया हूं। राज कपूर को देखकर मेरे दिमाग में चिंगारी जैसी भड़की। मैंने कहा कि यह करिअर मुझे बनाना है। पिक्चर खत्म हुई तो मैंने नौकर से कहा कि चलो पर्दे के पीछे जाकर उनसे मिलते हैं। वह बोला कि नहीं बाबा, वो पुतले हैं। 
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मैंने जिद की तो वह प्रोजेक्शन रूम में ले गया। प्रोजेक्शन वाले ने मुझे फिल्म लगाकर दिखाई। तब मैंने तय किया कि मुझे राज कपूर से मिलना है। मुझे याद है कि जब बच्चा था तो मेरी गैंग के दूसरे बच्चे मुझे कहानी सुनाने को कहते थे। जब मैं सुनाता था तो वे बड़ी गौर से देखते थे। पता नहीं वह मेरी आवाज के कारण था या मेरा अंदाज-ए-बयां। तब नहीं पता था कि मैं फिल्मों में जाऊंगा, इतनी शोहरत पाऊंगा।
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