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Shailesh Kolanu: झुग्गियों में बचपन, गांव में पढ़ाई और फिर ऐसे डायरेक्टर बने ऑस्ट्रेलिया रिटर्न शैलेश कोलानू

Tue, 12 Jul 2022 02:03 PM IST
मोहम्मद फायक अंसारी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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शैलेश कोलानू-राजकुमार राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
'हिट: द फर्स्ट केस' कोरोना संक्रमण काल से ठीक पहले फरवरी 2020 में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म है। इसके निर्देशक शैलेश कोलानू ने अब इसी कहानी को हिंदी में राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा के साथ फिर से बनाया है। सिडनी के न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय (यूएनएसडब्ल्यू) में मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर रहे शैलश कोलानू का फिल्मों से रिश्ता से तो बचपन में ही रहा, क्योंकि उनके पिता पोस्ट प्रोडक्शन की मशहूर कंपनी प्रसाद लैब में नौकरी किया करते थे, लेकिन खुद शैलेश एक दिन फिल्मों में आएंगे और निर्देशक बन जाएंगे, ये उनकी योजनाओं का हिस्सा कभी नहीं रहा। झुग्गी झोपड़ियों में बचपन बिताने वाले शैलेश ने अपने अब तक सफर के बारे में ‘अमर उजाला’ को तसल्ली से बताया इस बातचीत में...
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शैलेश कोलानू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
चेन्नई की झुग्गियों में बचपन 
‘मेरे पिता शेषगिरि राव चेन्नई में निर्देशक कोडी रामकृष्ण के साथ प्रोडक्शन मैनेजर के रूप में काम करते थे। उनकी मां शिशु कुमार चेन्नई में ही तेलुगू पढ़ाती थीं। मेरा जन्म उन दिनों हुआ जब पूरी इंडस्ट्री चेन्नई से हैदराबाद शिफ्ट हो रही थी। हमारा परिवार भी हैदराबाद शिफ्ट हो गया। चेन्नई में मेरा बचपन स्लम (झुग्गी झोपड़ियों) में गुजरा। जब साल 1998 में मेरे पिताजी हैदराबाद शिफ्ट हुए तो उनके पास पूरे परिवार के गुजारे भर को पैसे नहीं थे तो उन्होंने मुझे और मेरी मां को गांव में छोड़ा और खुद हैदराबाद आ गए।’ 
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शैलेश कोलानू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दो साल गांव में बीता बचपन  
‘मैं अपनी मां के साथ दो साल तक गांव में रहा। यहीं सातवीं और आठवीं तक की पढ़ाई की। पिताजी की जब हैदराबाद स्थित प्रसाद लैब्स में नौकरी लग गई तो साल 2000 में मैं अपनी मां के साथ हैदराबाद आया। हैदराबाद से ही मैंने स्नातक किया और उसके बाद एल वी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट में ऑप्टोमेट्री और विजन साइंस में पीएचडी की। पीएचडी के दौरान पांच साल तक छात्रों को पढ़ाया भी। पीएचडी पूरी हुई औऱ उसमें 98 फीसदी अंक मिले तो लोगों ने सलाह दी कि मुझे स्कॉलरशिप के लिए कोशिश करनी चाहिए।’

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शैलेश कोलानू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दो करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप मिली
‘आगे की पढाई के लिए मैंने सिडनी स्थित न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय (यूएनएसडब्ल्यू) से सम्पर्क किया तो वहां से मुझे दो करोड़ रुपये की स्कॉरशिप मिल गई। बाद में इसी विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर की नौकरी भी मिली। काम बहुत ही स्ट्रेसफुल  था। बहुत प्रयोग करना पड़ते थे। बहुत लिखना पड़ता था। इस तनाव को कम करने के लिए मैं छोटी छोटी कहानियां लिखने लगा और अपने मित्रों को सुनाने लगा। मुझे चार भाषाएं हिंदी, अंग्रेजी, तमिल और तेलुगू आती हैं। मैं वहीं हर भाषा की फिल्में देखता रह और फिल्में देखकर स्क्रीनप्ले लिखने की कोशिश करने लगा।'
 
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शैलेश कोलानू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दोस्तों को बिरयानी खिलाकर सुनाई कहानियां
'पहले मैं छोटी छोटी कहानियां लिखता था और अपने दोस्तों को बिरयानी खाने के लिए बुलाता था और उनको कहानियां सुनाता था। सबको एक कहानी बहुत ज्यादा पसंद आई। सब कहते कि इस पर फिल्म बननी चाहिए। जब मैं वह कहानी लिख रहा था तो मेरे दिमाग में जिस एक्टर का ख्याल आया वह नानी थे। मैंने उनका नंबर निकाला और चार दिन के अंदर अपनी कहानी लेकर उनके सामने था। पांच मिनट की मीटिंग तीन घंटे तक चली। उन्होंने इस फिल्म को प्रोड्यूस करने का विचार बनाया और कहा, तुमने इतने अच्छे तरीके से कहानी को नरेट किया है मैं चाहता हूं, तुम खुद इसे डायरेक्ट करो।’ 
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शैलेश कोलानू - फोटो : सोशल मीडिया
बचपन में देखी चीजें याद आने लगी 
'अभिनेता नानी की सलाह पर मैंने 'हिट-द फर्स्ट केस' को निर्देशित करने का फैसला किया और मैंने किताबें पढ़नी शुरू की। बचपन में जब पिताजी के साथ किसी फिल्म की शूटिंग में जाता था और शूटिंग देखता था, वे सारी बातें मुझे याद आने लगी। किताब में जो लिखा था सब मेरे आंखों के सामने था। मुझे याद है जब पिताजी से मिलने प्रसाद लैब जाता था तो वह बोलते हैं थे कि पांच मिनट इंतजार करो, लेकिन मैं इंतजार नहीं करता था बल्कि जहां एडिटिंग, डबिंग होती थी वहां जाकर देखता था कि कैसे सब होता? बचपन की ये जिज्ञासा फिल्ममेकिंग के दौरान काम आई।' 
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शैलेश कोलानू - फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म बनाने के फैसले से पिताजी अचंभित
'मैंने पिताजी को बताया था कि कुछ काम से पांच छह महीने की छुट्टी लेकर आया हूं, लेकिन जब उनको पता चला कि मैं जॉब छोड़कर आया हूं तो वह स्तब्ध हो गए। कहने लगे कि इतनी अच्छी नौकरी छोड़कर ये क्या बना रहे हो। जिंदगी के साथ इतना बड़ा रिस्क नहीं लेना चाहिए। खैर, फिल्म रिलीज हुई तो लोगो ने बहुत पसंद की और जब इसकी हिंदी रीमेक बनाने की बात सामने आई तो उस समय मेरे जेहन में राज कुमार राव ही थे।’
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शैलेश कोलानू - फोटो : सोशल मीडिया
तेलुगू  से काफी अलग है हिंदी रीमेक 
जब मैं तेलुगू वाली ‘हिट द फर्स्ट केस’ दर्शकों के साथ बैठकर देख रहा था तो मुझे खुद इसमें बहुत सारी कमियां नजर आ रही थी। अखिल भारतीय दर्शकों को ध्यान में रखकर इसमें काफी बदलाव करना पड़ा। पुलिस की तहकीकात के तरीके, किरदारों के इरादे सब बदले हैं मैंने। फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि राजस्थान है तो उसके हिसाब से वहां की संस्कृति और आसपास की चीजें भी इसमें शामिल हुई हैं। जो लोग पहले से तेलुगू फिल्म देख चुके हैं, उन्हें भी हिंदी फिल्म में काफी कुछ नया मिलेगा।’
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