Riteish Deshmukh
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बॉलीवुड से दूर होते हुए आप मराठी में ध्यान दे रहे हैं?
पांच फिल्मों, बालक पालक, लय भारी, फास्टर फेणे और माऊलीद्ध के बाद लग रहा है कि स्क्रिप्ट निर्माता हूं। रीजनल सिनेमा में बहुत ताकत है। मुंबई तो हिंदी-मराठी दोनों फिल्मों का घर है। इसलिए मैं हिंदी से दूर नहीं हो सकता।
इसीलिए बॉलीवुड का असर आपकी नई मराठी फिल्म 'माऊली' पर है जिसमें आप सिंघम-दबंग की तर्ज पर पुलिसवाले हैं। फिल्मों में पुलिस बनकर हीरो सीटियां लूटता है पर क्या वजह कि लोग असली पुलिस को दोस्त नहीं मान पाते?
फिल्मों में हीरो आम आदमी की लड़ाई लड़ता है। रीयल लाइफ में जो भी जनता की सेवा में हैं। चाहे पुलिस प्रशासन में हों या राजनेता हों ज्यादातर की छवि नेगेटिव होती है। यह लोग जनता के सीधे संपर्क में होते हैं तो कई बार उन्हें लेकर लोगों के अनुभव अच्छे नहीं रहते जिससे नेगेटिव इंप्रेशन बनता है। दुनिया में अच्छे का प्रचार कम नकारात्मक बातों का प्रचार तेज होता है। पुलिस में 80 फीसदी अच्छे हैं मगर बुरों की बातें ज्यादा होती है।