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'माऊली' रिलीज से पहले रितेश देशमुख ने खोले दिल के कई राज, बॉबी के साथ कह रहे हैं 'हाउसफुल 4'

Sat, 08 Dec 2018 09:45 AM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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Riteish Deshmukh - फोटो : twitter
डेढ़ दशक से बॉलीवुड में सक्रिय रितेश देशमुख ने बीते कुछ वर्षों में दिशा बदली है। एक्टिंग के साथ फिल्म निर्माण भी शुरू किया मगर मातृभाषा मराठी में। 2019 में वह छत्रपति शिवाजी की बायोपिक के साथ हिंदी में भी बतौर निर्माता आएंगे। अभिनेता-निर्माता की दोहरी भूमिका निभाते हुए कैसे देखते हैं आज के सिनेमा को इस विषय पर रितेश देशमुख से रवि बुले की विशेष बातचीत...
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riteish deshmukh
दो साल से चर्चा है कि आप छत्रपति शिवाजी की बायोपिक बना रहे हैं। फिलहाल क्या स्थिति है?
दो दिन पहले ही मैंने फिल्म का नरेशन लिया। मराठी के विख्यात साहित्यकार विश्वास पाटिल स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। शिवाजी महाराज की कहानी किस रूप में दिखानी है अभी फाइनल नहीं है परंतु बहुत जल्दी अंतिम रूप देंगे। मार्च-अप्रैल में शूटिंग शुरू करेंगे। फिल्म को हम हिंदी-मराठी दोनों भाषाओं में बना रहे हैं।
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#MeToo: साजिद पर लगे आरोपों से परेशान हुए रितेश देशमुख, कहा-महिलाओं के साथ खड़ा हूं - फोटो : File Photo
मराठा इतिहास फिल्मकारों को लुभा रहा है। बाजीराव मस्तानी के बाद अजय देवगन शिवाजी के सेनापति तानाजी मालूसरे पर फिल्म बना रहे हैं। पानीपत के तीसरे युद्ध पर आशुतोष गोवारिकर की फिल्म है।
मराठा इतिहास रोचक है। आज की फिल्में कल की पाठ्यपुस्तकें हैं। ऐतिहासिक कहानियों को सही ढंग से डॉक्युमेंट करना जरूरी है। सामान्य ज्ञान की किताब में पूरी बात नहीं आतीं। शिवाजी ने अफजल खां को मारा किताब में आप डेढ़ पन्ने में पढ़ते हैं। जिनकी इतिहास में दिलचस्पी है और जिसने गहराई से पढ़ा है उसे ही इसके पीछे की कहानी पता होगी। बाकी को नहीं। सिनेमा उस कहानी या इतिहास को आम लोगों तक रोचक ढंग से पहुंचाता है।

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riteish deshmukh - फोटो : File Photo
लेकिन ऐतिहासिक फिल्मों में विवाद का खतरा हमेशा तैयार रहता है?
इतिहास में कुछ ऐसे तथ्य होते हैं जिन्हें किसी तरह बदला नहीं जा सकता। उनसे छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।
बैंजो 2016, बैंक चोर 2017 के बाद इस साल आपकी फिल्म नहीं आई। अगले साल क्या होगा?
तीन फिल्में रहेंगी। इंद्रकुमार की 'टोटल धमाल', फरहाद समजी की 'हाउसफुल 4' और मिलाप कोठारी की 'मरजावां'।
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Riteish Deshmukh - फोटो : twitter
बॉलीवुड से दूर होते हुए आप मराठी में ध्यान दे रहे हैं?
पांच फिल्मों, बालक पालक, लय भारी, फास्टर फेणे और माऊलीद्ध के बाद लग रहा है कि स्क्रिप्ट निर्माता हूं। रीजनल सिनेमा में बहुत ताकत है। मुंबई तो हिंदी-मराठी दोनों फिल्मों का घर है। इसलिए मैं हिंदी से दूर नहीं हो सकता।
इसीलिए बॉलीवुड का असर आपकी नई मराठी फिल्म 'माऊली' पर है जिसमें आप सिंघम-दबंग की तर्ज पर पुलिसवाले हैं। फिल्मों में पुलिस बनकर हीरो सीटियां लूटता है पर क्या वजह कि लोग असली पुलिस को दोस्त नहीं मान पाते?
फिल्मों में हीरो आम आदमी की लड़ाई लड़ता है। रीयल लाइफ में जो भी जनता की सेवा में हैं। चाहे पुलिस प्रशासन में हों या राजनेता हों ज्यादातर की छवि नेगेटिव होती है। यह लोग जनता के सीधे संपर्क में होते हैं तो कई बार उन्हें लेकर लोगों के अनुभव अच्छे नहीं रहते जिससे नेगेटिव इंप्रेशन बनता है। दुनिया में अच्छे का प्रचार कम नकारात्मक बातों का प्रचार तेज होता है। पुलिस में 80 फीसदी अच्छे हैं मगर बुरों की बातें ज्यादा होती है।
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Riteish Deshmukh and Genelia Dsouza - फोटो : file photo
फिल्मों में हीरो के किरदार जनता की सेवा करने वाले नेता या ब्यूरोक्रेट्स से ज्यादा पुलिस के क्यों होते हैं?
पुलिस के किरदार में एक्शन ज्यादा है। कमर्शियली देखें तो उन्हें हिंसा का इस्तेमाल करने का कानूनी अधिकार है। अत: वे पर्दे पर ऐक्शन कर सकते हैं। विलेन को पीट सकते हैं। नेता को यह करते देखने में मजा नहीं आता। नेता या ब्यूरोक्रेट्स से तो आप डांस भी नहीं करा सकते।
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riteish deshmukh - फोटो : File Photo
सिनेमा में कंटेंट सुधरा है परंतु मोबाइल अब हर हाथ में है। लोग उस पर फिल्में देख रहे हैं। इससे कैसे निपटा जाए?
अच्छा कंटेंट देना और मोबाइल दोनों सिनेमा के लिए चुनौती हैं। यही है कि अच्छे कंटेंट के साथ भव्य फिल्में बनाएं तभी लोग सिनेमाघरों में जाएंगे। 100-200 करोड़ की फिल्में बन रही हैं परंतु मोबाइल की वजह से लोगों को थियेटर में लाना मुश्किल हो गया है। नेटफ्लिक्स-अमेजन पर फिल्म से बढ़िया मनोरंजन मिल रहा है तो वह क्यों सिनेमाघर में आएंगे। फिल्म बनाना अब बड़ा सवाल नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या आपकी फिल्म में क्षमता है कि लोगों को थियेटर तक ला सकेगी? 

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Riteish Deshmukh - फोटो : twitter
आपने किशोरों को यौन शिक्षा के मुद्दे पर बालक पालक 2013, मराठी में बनाई। चार साल से हिंदी रीमेक की सिर्फ बातें हो रही हैं। क्या रुकावट है?
बालक पालक की कहानी अच्छी है परंतु हिंदी में समस्याएं हैं। एक तो बजट बढ़ेगा। फिर पता चलेगा कि उसके सामने बड़ी फिल्म आ रही है। यह चार बच्चों की कहानी है। सोचिए हिंदी में चाइल्ड एक्टर वाली आखिरी कमर्शियली हिट फिल्म कौन सी थी तारे जमीन पर जिसमें आमिर खान थे। उसके बाद बच्चों पर बनी कई फिल्में नाकाम रही। हिंदी के दर्शकों की पसंद अलग है।
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Riteish Deshmukh - फोटो : twitter
कहा जाता है कि मराठी और बांग्ला फिल्मों के दर्शक की संवेदना अधिक परिपक्व है?
ऐसा नहीं है। सवाल पसंद का है। हो सकता है कि मेरी संवेदना परिपक्व हो परंतु मैं ऐक्शन फिल्में देखना पसंद करता हूं। हांए मैं यह जरूर देख सकता हूं कि गैर-हिंदी भाषी दर्शक विभिन्न विषयों को ज्यादा खुलेपन से स्वीकार करते हैं।
'माऊली' और शाहरुख की 'जीरो' 21 दिसंबर को बॉक्स ऑफिस पर टकरानी थीं परंतु आपने तारीख बदल कर उन्हें खुला रास्ता दे दिया। माना जाए कि मुंबई-महाराष्ट्र में मराठी फिल्में बॉलीवुड को चुनौती दे रही हैं?
शाहरुख प्रिय दोस्त हैं। पहले हम अपनी फिल्म क्रिसमस पर लाना चाहते थे क्योंकि 7 दिसंबर को मेरी 'टोटल धमाल' आनी थी। ऐसा होने पर दोनों में गैप रहता। मगर वह 22 फरवरी को चली गई तो मुझे लगा कि 'माऊली' को पीछे ले सकते हैं। तभी मैंने शाहरुख से बात की। उनसे पहले अपनी फिल्म रिलीज करने का फैसला किया। हमें पता है कि हमारे दर्शक अलग हैं।
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