rajesh khanna
हम मेकअप करके, ब्यूटी पार्लर जाकर, अच्छे कपड़े पहनकर जाते थे और हमें लगता था कि वो जो पर्दे की तरफ़ से पलकें झपका रहे हैं या सिर झटक रहे हैं या मुस्करा रहे हैं, वो सिर्फ हमारे लिए कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हॉल में बैठी हर लड़की को ऐसा ही महसूस होता था। जिस मास 'हिस्टीरिया' की लोग बात करते हैं, उसके अनगिनत किस्से मुझे सुनने को मिले कि कैसे उनकी सफेद गाड़ी, लड़कियों के लिपस्टिक के रंग से गुलाबी हो जाती थी और कैसे उनकी गाड़ी की धूल से लड़कियां अपनी मांग भरती थीं। ये सुने-सुनाए नहीं, बल्कि रियल किस्से हैं।