कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी की जिंदगी पर ये शेर एकदम सही बैठता है। आज 42 साल के हो रहे नवाज बॉलीवुड का ऐसा नाम हैं जो किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं। नवाज आज जिस फिल्म में हों उसके एक-दो अवार्ड जीतने की तो गारंटी बन जाती है। उनकी लगन के साथ-साथ एक और वजह है जिसने आज फिल्मी दुनिया को ये सितारा देने में बड़ी भूमिका अदा की। ये वजह थी एक लड़की, जिसने 'सांवले' और साधारण से चेहरे-मोहरे वाले नवाज को शक्ल आइने में देखने की नसीहत दे दी और नवाज ने ठान ली कि वो अब हीरो बन कर दिखाएंगे।
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नवाजुद्दीन सिद्दीकी कैसे एक कस्बे के लड़के से बने बॉलीवुड स्टार
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नवाजुद्दीन सिद्दीकी उत्तर प्रदेश के शहर मुजफ्फरनगर के कस्बे बुढ़ाना में पैदा हुए। शहर (मुजफ्फरनगर) से 15-16 किमी दूर इस कस्बे में नवाज को कोई फिल्मी माहौल नहीं मिला। 80 के दशक के आखिरी दौर का ये वक्त था जब टीवी घर मे होना बड़ी शान माना जाता था। कस्बे और छोटे शहर में कलर टीवी नहीं पहुंचा था। जवान होते लोग छुप-छुप के ब्लैक एंड व्हाइट टीवी देखा करते थे। मुहल्ले भर के बच्चे एक ही घर में टीवी देख रहे होते थे क्योंकि अमूनन मुहल्ले में एक या दो टीवी ही हुआ करते थे। नवाज भी टीवी देखते और दूसरे काम छोड़ देर तक टीवी के सामने रहते, यहीं से एक सपना नवाज के मन में पल गया।
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टीवी की तरफ लोगों की दीवानगी देख नवाज के मन में आया कि वो भी कभी ऐसे ही पर्दे पर दिखें, लोग उनके भी दीवाने हों। इसी दौरान नवाज को पहली बार प्यार हुआ। पड़ोस की इस लड़की को नवाज ने प्रपोज किया तो जवाब मिला अपनी शक्ल आइने में देख लो। लड़की की ये ना नवाज को चुभ गई, दिल में एक बागी ने सिर उठा लिया।
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नवाजुद्दीन ने ग्रेजुएशन के बाद दिल्ली की राह पकड़ ली। दिल्ली की तरफ नवाज को कोई लाया था तो वो था उनके भीतर पल राह एक्टिंग का कीड़ा। उनके लिए ये शहर बिल्कुल नया था, नवाज ने अपनाया।
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दिल्ली आकर नवाज को पहली सफलता तब मिली जब उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला मिल गया। एकटिंग के इतने बड़े इदारे में दाखिले के बाद नवाज को लगा अब भला उनको पर्दे पर दिखने से कौन रोक सकता है? नवाज कुछ और सोच रहे थे जबकि किस्मत ने कुछ और ही बदा था।
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नवाज ने एनएसडी के बाद कई प्ले में काम किया, लेकिन पेट कैसे भरे? दूसरे काम करना था फिल्मों में। नवाज ने मायानगरी का रुख किया। फिल्मों में काम नहीं मिला तो पेट भरने को चौकीदार की नौकरी की। कई और भी छोटे-छोटे काम किए। फिल्म के लिए जब भी काम मांगने जाते रिजेक्ट कर दिए जाते। नवाज घर जाते तो मां के दुपट्टे में मुंह छुपा लेते और अम्मी की गोद मे लेट कर देर तक रोते।
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नवाज जब मां के दुपट्टे से आंसू पोंछते तो पश्चिमी यूपी में बोली जाने वाली एक कहावत वलो नवाज को सुना देतीं। वो कहतीं कि बेटा एक '12 बरस में कूड़ी के दिन बहुर जाते हैं, फिर तू तो इंसान है'। कूड़ी वो जगह होती है जहां गांव में कूड़ा डालते हैं। ऐसे में नवाज को इस बात का दिलासा हो जाता कि अम्मी कह रही हैं, तो कामयाबी उन्हें जरूर मिलेगी। नवाज फिर मुंबई जाकर निर्देशकों के दफ्तरों के चक्कर काटने लगते।
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कहते हैं कि अगर कोई लगातार सच्चे दिल से एडियां रगड़ता रहे तो एक वक्त के बाद धरती हार जाती है और पानी निकल आता है। नवाज का एडियां रगड़ना काम आया उन्हे काम मिला। हालांकि ये कभी एक मिनट तो कभी दो मिनट का होता। हीरो के पीछे खड़ा ये सांवला सा लड़का निर्देशकों की नजर में आया 13 साल के संघर्ष के बाद।
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1999 में आमिर खान के साथ एक छेटा सा रोल करने वाले नवाजुद्दीन को पहचान मिली 2012 में। इस साल उनका कहानी और गैंग्स ऑफ वासेपुर आई। इसके बाद तो कामयाबी नवाज के कदमों को चूमने लगी।
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2012 के बाद नवाज की हर फिल्म को तारीफ मिली है। उनको बॉलीवुड के सबसे बेहतरीन अदाकारों के साथ सामिल किया जाता है। नवाजुद्दीन आज ऐसा चेहरा हैं जो वो रोल करते हैं जो अमूमन किसी आम कलाकार के बस के नहीं होते। आज नवाज की फिल्म कांस और बड़े फिल्मी समारोह की शान बनती हैं।
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नवाजुद्दीन सिद्दीकी के दो बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी। नवाजुद्दीन ने बिना किसी कंट्रोवर्सी के, बगैर अश्लीलता या दूसरे शॉर्टकट अपनाए जिस तरह से सफलता हासिल की है वो एक मिसाल है। वो मिसाल है उनके लिए जे कहते हैं कि फिल्मी सितारों के बेटे-बेटियां ही बॉलीवुड में सफल होते हैं, ये मिसाल उनके लिए जो कहते हैं कि छोटे शहरों के लोगों के लिए मायानगरी नहीं है। नवाजुद्दीन उनको बहुत कुछ सिखाते हैं जो कई बार ये चाहते हैं कि वो फिल्मों में आए लेकिन कोशिश करने से पहले ही हार जाते हैं।