किस्मत और संग्राम
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1989 में रिलीज हुई फिल्म परिंदा और 1998 में रिलीज हुई फिल्म सत्या को कल्ट क्लासिक गैंगस्टा फिल्म कहा जा सकता है। लेकिन ये भी कहना गलत नहीं होगा कि इन दो फिल्मों के बाद दर्शकों को कुछ ऐसा क्लासी देखने को नहीं मिला। हालांकि अनुराग कश्यप ने फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर से काबिल ए तारीफ कोशिश की लेकिन शायद एक गैंगस्टा फिल्म बनाने से थोड़ा चूक गए। वहीं वेब सीरीज में सेक्रेड गेम्स और मिर्जापुर ने दर्शकों को वहीं खून चखाया है, जिसका नशा चढ़ जाए तो उतरना थोड़ा मुश्किल होता है। लेकिन ये सुपरहिट वेब सीरीज एक बड़ा सवाल अपने साथ में लाती हैं कि क्या बड़े पर्दे पर गैंगस्टर्स की मौत हो चुकी है ?
आखिर कैसे हुई गैंग्स की शुरुआत
साल 1947 के आस पास से ही पूरे देश से ही धीरे-धीरे लोगों ने मुंबई की ओर रुख करना शुरू कर दिया था। छोटे शहर में बढ़ती बेरोजगार आबादी ने क्राइम की शुरुआत की। शुरुआत में ये क्राइम छोटे रूप में था, जैसे छोटी-मोटी चोरी करना, पॉकेट मारना या फिर डकैती डालना। 1940-50's में बनी फिल्में भी इस बात की गवाही देती हैं। उन फिल्मों की लिस्ट में किस्मत (1943), संग्राम (1950), पॉकेट मार (1956), हाउस नंबर 44 (1955), आवारा (1951), श्री 420(1955) और बाजी (1951) शामिल हैं। इन सभी फिल्मों में करीबन एक ही चीज दिखाई गई है। लेकिन वक्त करवट लेता है शुरु होता है अवैध शराब का धंधा, वो भी अंटियों द्वारा। इस सीन को सेक्रेड गेम्स की कांता बाई की स्टोरी से भी समझा जा सकता है। जब अलग अलग अपने इलाके और राज्य के हिसाब से छोटे छोटे गैंग बनने लगे, जैसे अलाहबादी गैंग, रामपुरी गैंग या फिर कनपुरिया गैंग।