रामानंद की रामायण में मूलराज राजदा
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वहीं, उनके लेखन में योगदान की जाए तो मूलराज राजदा (1973) में 'ताजा खबर', 'जय शाकंभरी मां' (1989), 'जय श्री स्वामीनारायण' (2002) को लिखने के लिए पहचाने गए। इसके अलावा उन्हें 'जेसल तोरल' (1971), 'नागिन' और 'सुहागिन' (1979), 'अमन लक्ष्मी' (1980), 'रामायण' (1987), 'दिल ही तो है' (1992), 'ब्योमकेश बख्शी' (1993), 'क्रांतिवीर' (1994), 'विश्वामित्र' (1995), 'लहू के दो रंग' (1997), 'मृत्युदाता' (1997), 'बूंद' (2001) और 'रीत-रिवाज' (2009) के लिए जाने गए।