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EXCLUSIVE: मिलिए उनसे जो 'सोनू सूद' तो नहीं, लेकिन मदद करने के मामले में सोनू सूद से कम भी नहीं

Fri, 29 May 2020 07:48 AM IST
Mishra Mishra अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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कुलदीप रुहिल, जितेंद्र, अमितोष - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
मुंबई से अपने घरों को जा रहे लोगों के लिए सोनू सूद बसें भेज रहे हैं। पुरानी मुंबई में खाने के संकट से जूझ रहे लोगों को अमिताभ बच्चन खाना बांट रहे हैं। लेकिन, आराम नगर और वर्सोवा? वो इलाका जहां हिंदी फिल्म और टीवी इंडस्ट्री के तमाम ऐसे कलाकार रहते हैं जिनका घर दिहाड़ी से चलता है, उनका क्या? उनके बीच कुछ ऐसे लोग काम कर रहे हैं, जिनके पास न तो अपने काम का प्रचार करने का समय है और न ही ऐसी टीम जो उनका भोंपू सोशल मीडिया या अखबारों या टीवी चैनलों पर बजाती रहे। इसलिए अमर उजाला खुद चलकर इनके पास आया है। ये वो लोग हैं जो सोनू सूद तो नहीं हैं, लेकिन सोनू सूद से कम भी नहीं हैं।
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जितेंद्र - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
'कप ऑफ टी' जैसी अवॉर्ड विनिंग शॉर्ट फिल्म बनाने वाले जितेन्द्र लगातार वर्सोवा में घर घर जाकर जरूरतमंद लोगों से संपर्क कर रहे हैं। अपनी इस पहल के बारे में वह बताते हैं, 'मुंबई से प्यार है इसलिए भाग नहीं सकता था। वर्सोवा में मैं शुरू से स्लम में रहने वाले बच्चों को थियेटर सिखाया करता था। कुछ लोग लॉकडाउन शुरू होने से पहले चले गए तो कुछ बाद में पैदल या ट्रकों के माध्यम से वापस गए। लेकिन परिवार वाले अभी रुके हुए हैं। हम जितने लोगों तक पहुंच पाते हैं उन तक दो हफ्तों का राशन पहुंचाते हैं। यह पहल मैंने लॉकडाउन के शुरुआती चरण में ही शुरू कर दी थी।  धीरे-धीरे थियेटर के दूसरे साथी भी जुड़ते चले गए। हम यहां रहने वाले लोगों के घर घर जाते हैं और उनके नाम और नंबर लिखते हैं फिर घर वापस आकर उनमें से कुछ कुछ लोगों को घर के पास बुलाकर उन्हें राशन मुहैया कराते हैं। अब तक हम लोग करीब 300 परिवारों तक पहुंच गए हैं। इनमें से काफी ऐसे लोग भी होते हैं जिनके पास राशन कार्ड भी नहीं है।'
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अमितोष नागपाल - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
फिल्म 'हिंदी मीडियम' के संवाद लिखने वाले अमितोष नागपाल बताते हैं, ' जिस शहर से हम कमा रहे हैं उसके लिए अगर हम कुछ कर सके तो बेहतर है। जैसे ही लॉकडाउन शुरू हुआ तो हमने कुछ दोस्तों के साथ कोशिश शुरू की। धीरे धीरे मांग बढ़ती गई तो हमें लगा कि अब अपनी जेब से नहीं कर पाएंगे। फिर मैंने सोशल मीडिया पर भी पोस्ट डाले और इंडस्ट्री में भी संपर्क किया। इसके चलते फंड रेजिंग भी हुई और दूसरे एनजीओ भी आकर जुड़ गए। सोनू सूद ने एक हजार किलो चावल के जरिए मदद की। अनुभव सिन्हा ने भी सहायता की।  इरफान खान की पत्नी सुतापा लगातार मदद भेज रही हैं। मैं एनएसडी से हूं तो जूनियर से लेकर सीनियर भी मदद के लिए सामने आ रहे हैं। इस दौरान थकान भी होती है लेकिन फिर आस पास देखते हैं तो लगता है कि अभी हमारा आराम जायज नहीं है।'

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कुलदीप रुहिल - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
संवाद लेखक कुलदीप रुहिल लगातार गोरेगांव इलाके में लोगों की मदद कर रहे हैं। वह कहते हैं, 'मैं गोरेगांव में रहता हूं। मैं यहां आस पास रहने वाले जरुरतमंद कलाकारों, मजदूरों, परिवारों और ऑटो रिक्शा चालकों की एक लिस्ट तैयार कर रहा हूं और फिर अपने कुछ साथियों की मदद से उन तक सहायता पहुंचा रहा हूं। कोशिश यह होती है कि जिनके पास राशन कार्ड नहीं है या जिनके पास बीएमसी सहायता नहीं पहुंचा पा रही है उनतक मदद पहुंचाया जाए। अभी तक हम करीब 270 परिवारों तक पहुंचने में कामयाब हुए हैं। हमारे पास इंडस्ट्री के कुछ असिस्टेंट डायरेक्टर से लेकर दिहाड़ी श्रमिकों ने मदद के लिए संपर्क किया। एक बार एक जूनियर आर्टिस्ट ने संपर्क किया। उसने दो दिन से खाना नहीं खाया था। मैंने सुनील ग्रोवर को फोन किया वह गाड़ी लेकर आए तो फिर हम उसकी मदद करने पहुंचे। हमने मुंबई में मुश्किल भरा समय देखा है इसलिए ये मुश्किलें हम समझ सकते हैं।'
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ऐसे पहुंच रही है मदद - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
कास्टिंग डायरेक्टर शुभम तिवारी बड़े पैमाने पर प्रतिदिन हजारों लोगों तक खाना पहुंचा रहे हैं। शुभम बताते हैं, 'लॉकडाउन के दौरान मैंने आराम नगर की तरफ देखा कि कुछ लोग सड़कों पर  खाने की तलाश में घूम रहे थे। मैंने अपने कुछ दोस्तों के साथ खाना बनाकर उन तक पहुंचाने की पहल की। मैंने सोशल मीडिया पर भी पोस्ट किया कि जिन भी साथियों को खाने की जरुरत है वह हमसे संपर्क करें। काफी लोगों ने इसे शेयर किया। इंडस्ट्री से भी काफी सपोर्ट मिला। हमारी कोशिश है कि जब  तक स्थिति सामान्य न हो जाए लंच और डिनर लगातार चालू रहे। राशन के अलावा हम मॉस्क से लेकर सेनेटरी पैड्स भी बांट रहे हैं। वहीं इसी बीच एक कैंसर मरीज की जरूरत भी सामने आई और हमने उनकी भी मदद की, फंड रेज किया और उनका ऑपरेशन हुआ। हमारा मानना है कि सरकार को जो करना है वह करेगी लेकिन हमें अपनी सरकार खुद ही बनना पड़ेगा।  

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