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EXCLUSIVE: इसलिए मनीषा कोइराला ने कही दूसरों से उम्मीद न रखने की बात, ऐसी थी भंसाली से पहली मुलाकात

Mon, 30 Mar 2020 01:48 PM IST
प्रतीक्षा राणावत रोहिताश सिंह परमार, मुंबई
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मनीषा कोइराला - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हिंदी सिनेमा की दंत कथाएं बन चुके कलाकारों दिलीप कुमार और राजकुमार के साथ फिल्म 'सौदागर' से अपने सिनेमाई करियर करने वाली मनीषा कोइराला आने वाले अगस्त में 50 साल की हो जाएंगी। जिंदगी के 30 साल सिनेमा को दे चुकीं मनीषा अब भी कुछ न कुछ नया सीखने को बेताब रहती हैं। नेटफ्लिक्स पर उनकी नई पिक्चर आई है, 'मस्का' यानी मक्खन। मनीषा से मिलते ही मन मस्का हो जाता है। एक खास मुलाकात हिंदी सिनेमा की इस इलू इलू गर्ल से।
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अभिनेत्री मनीषा कोइराला
इतना वक्त कैमरे के सामने बिता देने के बाद क्या अब भी किसी किरदार में ढलने के लिए आपको चुनौती महसूस होती है?

पहली बात तो ये कि मैं वह किरदार कभी नहीं करना चाहूंगी जो मैं पहले कर चुकी हूं। मैं हमेशा ऐसा किरदार करना चाहती हूं जो मैंने  पहले कभी किया ना हो। और, जब हमें हर बार नई चीज करनी है, तो उसके लिए तैयारी तो करनी ही पड़ेगी। किसी भी फिल्म में जो मेरा किरदार होगा उस पर मुझे शोध भी करना पड़ेगा। उससे मिलती-जुलती चीजों को सीखना भी पड़ेगा। जब मुझे 'मस्का' की कहानी पहली बार सुनाई गई तो यह मुझे पहली बार में ही पसंद आ गई। लेकिन इसके लिए मुझे पारसी और गुजराती भाषा सीखनी पड़ी जो मैं पहले नहीं जानती थी। इस फिल्म के लिए मुझे अपनी बॉडी लैंग्वेज भी बदलनी पड़ी। तो इस तरह की तैयारियां तो करनी ही पड़ती हैं। कुछ नया करने और कुछ नया सीखने से ही तो अभिनय मजबूत होता है। और मेरे साथ अच्छी बात यह है कि मुझे मेहनत करने में बहुत मजा आता है।
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manisha koirala
नीना गुप्ता ने फिल्म 'बधाई हो' के लिए मुख्य अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता है। पहले माना जाता था कि एक हीरोइन एक उम्र तक ही लीड रोल कर सकती है, आपके हिसाब से 'बधाई हो' जैसी फिल्में बनना कितना जरूरी हैं?

नीना जी की यह फिल्म मैंने थिएटर में जाकर देखी थी और मुझे बहुत पसंद आई थी। इस फिल्म में अच्छी बात यह हो गई कि नीना जी को इसके लिए फिल्मफेयर अवार्ड भी मिल गया। इससे यह पता चलता है कि अब सिनेमा के दर्शकों में बदलाव आया है और वह अब बदल चुके हैं। पहले था कि आप सिर्फ 30 साल तक ही हीरोइन बनी रह सकती हैं। उसके बाद आपका करियर खत्म हो जाएगा। फिर आप सिर्फ मां का या बहन का किरदार निभा सकती हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं है। नीना जी ने उस फिल्म के लिए फिल्मफेयर अवार्ड जीतकर यह साबित कर दिया है कि आपका करियर आपके मरते दम तक हो सकता है। वह कभी खत्म नहीं होता। आप उसे जब तक चाहें, तब तक चला सकती हैं। मुझे लगता है कि यह बदलाव बहुत अच्छा है और ऐसी फिल्में आगे भी बनती रहनी चाहिए। पहले समय में निर्माता फिल्मों के साथ कुछ नया करने से डरते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अगर आप कुछ नया करेंगे तो उसे पसंद भी किया जाता है और उसको सराहा भी जाता है।

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manisha koirala
आपका हर मुश्किल में साथ देने वाले दोस्त कौन रहे हैं और अभी कौन हैं?

मैंने अपनी जिंदगी में देखा है, कि जब आपको किसी चीज की जरूरत पड़ती है तो कोई ना कोई आकर आपकी मदद कर ही देता है। और ऐसा नहीं है कि जिसे आप जानते हैं, सिर्फ वही आपकी मदद करेंगे। कभी-कभी कुछ अनजान लोग होते हैं, जो दिल के अच्छे होते हैं, साफ होते हैं, वह भी कभी-कभी आकर आपकी मदद कर देते हैं। मुझे जब भी जरूरत पड़ी तो किसी न किसी ने आकर मेरी मदद जरूर की है।

आपके हिसाब से जिंदगी में दोस्त होना कितना जरूरी हैं?

यह काफी हद तक आपके ऊपर निर्भर करता है। आपको अगर अकेले रहना पसंद है, तो शायद आपके दोस्त नहीं बनेंगे। लेकिन अगर आप बहुत सामाजिक हैं। लोगों से मिलना जुलना पसंद करते हैं, तो आपके दोस्त बहुत बन जाएंगे। दोस्त होना जरूरी भी है क्योंकि कभी आप खुश रहते हैं, तो वह पल भी दोस्तों के साथ ही अच्छा लगता है। और जब आप दुखी हैं तो भी दोस्त ही काम आते हैं। अब यह आपको तय करना होता है कि आपको दोस्तों की भीड़ चाहिए या फिर एक दो ही काफी हैं। मेरे लिए सिर्फ एक या दो दोस्त ही काफी हैं।
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manisha koirala
फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली ने अपने करियर की शुरुआत आपके साथ फिल्म 'खामोशी' से की। तब से लेकर अब तक आप उनकी फिल्मों में क्या-क्या बदलाव देखती हैं?

मैंने उनकी ज्यादातर फिल्में देखी हैं और मुझे उनकी फिल्में बहुत पसंद आती हैं। आज के समय में वह हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े निर्देशकों में से एक हैं। जब मैंने उनके साथ उनकी पहली फिल्म की थी, तब मुझे उनकी पटकथा बहुत पसंद आई थी। मेरी उनसे मुलाकात विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म '1942- ए लव स्टोरी' से हुई थी। उनकी फिल्मों में फिल्माए गए गाने और कैमरे में कैद किए गए भावुक पल मुझे बहुत पसंद आते हैं। थिएटर में फिल्म देखने का मजा जितना उनकी फिल्मों में आता है, उतना किसी भी फिल्म में नहीं आता। फिल्म निर्देशन की दुनिया में वह जीनियस हैं।

आपने अपने करियर में अब तक सफलता और असफलता दोनों का दौर देखा है। सफलता के समय तो बहुत लोग पास होते हैं, लेकिन जब असफलता मिली तो आपके साथ कौन होता था?

देखिए, यह तो दुनिया की रीत है। आपको भी इसी दुनिया में रहना है, तो इसकी ज्यादा आलोचना करने का कोई फायदा है नहीं। आपको बस इतना सोचना चाहिए कि अभी जो दौर चल रहा है, उसका आनंद लीजिए। मुझे तो इसने यह जता दिया है कि सफलता एक हद तक ही आपके साथ रहती है। उसके बाद आपका दूसरा दौर शुरू हो जाता है। तो मेरे हिसाब से उस समय के लिए आपको पहले से तैयार रहना चाहिए। हमें खुद को बेहतर बनाने की जरूरत है। दूसरे से हम आशाएं ना रखें, तो ही बेहतर होगा। दूसरों से आप जितनी कम आशाएं रखेंगे उतना आपके लिए अच्छा होगा।
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manisha koirala
आपको ऐसा कब लगा कि अब मेरा संघर्ष खत्म हो गया?

संघर्ष कभी खत्म नहीं होता। जिंदगी संघर्ष से भरी हुई है, और उसी पर चलती है। जिंदगी के हर मोड़ पर आपको एक नया संघर्ष करना पड़ता है। उसके लिए आपको हमेशा तैयार रहना चाहिए। शारीरिक तौर पर भी और मानसिक तौर पर भी। आपके दिल में कभी डर नहीं होना चाहिए। आपके दिल में हमेशा यह रहना चाहिए कि जो भी मेरे सामने आएगा, मैं उसका सामना कर सकता हूं। तो ही आप पार हो सकते हो।

मीडिया से आपका कैसा नाता रहा है?

मीडिया के लोगों से तो मेरा मेल-जोल काफी अच्छा रहा है। शुरुआत में मैं जब आई थी, तो मैं मीडिया से इतना परिचित नहीं थी। जब धीरे-धीरे मुझे चीजें पता चली, तो मैंने लोगों से मिलना शुरू किया। मैंने बहुत से दोस्त मीडिया में बनाए। आज भी जब पुराने लोग मुझे मिलते हैं तो हम बहुत अच्छे से मिलते हैं। मैं भी बहुत से लोगों को जानती हूं, और मुझे भी काफी लोग जानते हैं। हम काफी साल बाद भी मिलते हैं, तो भी एक दूसरे के गले लगकर मिलते हैं। जब हम किसी दूसरे के काम की इज्जत करते हैं, तो वह भी हमारे काम की इज्जत करेगा। यही फार्मूला मैं यहां पर भी लागू करती हूं।
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मनीषा कोईराला
शुरुआत में तो रहा ही होगा, लेकिन इस समय आपके माता-पिता का आपको कितना सहयोग रहता है?

मेरे माता-पिता का मुझे अब भी बहुत सहयोग रहता है। मेरी तो भावनाओं का आधार भी वही हैं। भगवान की कृपा से उनका स्वास्थ्य बहुत ही अच्छा है। और जब तक उनका हाथ मेरे सिर पर रहता है, तब तक मैं अपने आप को बहुत सुरक्षित महसूस करती हूं।

अब आपके माता-पिता बुजुर्ग हैं तो अपने साथ उनकी भी देखभाल करना आपकी ही जिम्मेदारी है… 

मुझे जिम्मेदारियां निभाना बहुत पसंद है। मैं अपने आप को भाग्यशाली समझती हूं कि जिन्होंने मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया, खाना सिखाया, चलना सिखाया, बोलना सिखाया। आज उनकी देखभाल करने का सौभाग्य मुझे मिल रहा है। मैं तो बहुत ही भाग्यशाली हूं। नहीं तो बहुत से लोगों को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं होता।
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maska - फोटो : amar ujala mumbai
आपकी नई फिल्म 'मस्का' की कहानी क्या है? और इसमें आपका क्या किरदार है?

'मस्का' एक परिवार की कहानी है। इस परिवार में एक जवान लड़का है जो हीरो बनना चाहता है, और फिल्मों में काम करना चाहता है। मैं उनकी मां का किरदार निभा रही हूं। उसके दादा-परदादा ने रानी कैफे का निर्माण किया था। उस लड़के की मां चाहती है कि वह अपने बाप-दादा की विरासत को आगे बढ़ाए। बचपन में उसकी मां ने यह महसूस किया कि लड़के के हाथों में जादू है क्योंकि वह खाने की कुछ चीजें बहुत ही स्वादिष्ट बनाता था। लेकिन उसके बेटे की इच्छाएं कुछ और ही हैं।
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