अमिताभ बच्चन
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यह सब तो हो गया लेकिन अमिताभ की बीमारी किसी को पूरी तरह समझ नहीं आ रही थी। उधर अगले दिन तक तो अमिताभ बच्चन की दुर्घटना का यह समाचार इतना फैला कि उनके प्रशंसक बेचैन हो गए। कोई अमिताभ की इस दुर्घटना को सुनकर सहमा हुआ था तो कोई रो रहा था, बिलख रहा था। जुलाई 1982 तक अमिताभ बच्चन अपनी जंजीर, अभिमान, चुपके चुपके, हेराफेरी, दीवार, शोले, दो अनजाने, कभी-कभी, अमर अकबर एंथनी, परवरिश, डॉन, त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर, लावारिस, नसीब, सत्ते पे सत्ता और नमक हलाल जैसी कई सुपर हिट, जुबली फिल्म देने के कारण देश के सबसे बड़े सुपर स्टार बन चुके थे। इधर फिलोमिना अस्पताल में अमिताभ की बिगड़ती हालत देख सभी परेशान थे। अस्पताल के कमरा नंबर 7 में अमिताभ बेहोशी वाली हालत में लगातार दर्द से तड़प रहे थे। उन्हें सांस लेने में भी काफी तकलीफ हो रही थी। हालात कुछ ऐसे लग रहे थे कि वह कभी भी कोमा में भी जा सकते थे। जबकि उनके कमरे के बाहर बैठे जया, अजिताभ और अमिताभ के एक दोस्त हबीब नाडियाडवाला यह सोचकर परेशान थे कि अब क्या किया जाए। अमिताभ की इस मुश्किल घड़ी में उनके पास उनके पारिवारिक मित्र और फिल्मकार यश जौहर भी पहुंच गए थे। तब सभी ने यह फैसला लिया कि अमिताभ को शाम की फ्लाईट से मुंबई ले जाया जाए। तभी पता लगा कि अस्पताल में सर्जरी के लिए विख्यात यूरोलोजिस्ट डॉ हट्टंगडी शशिधर भट्ट आये हुए हैं। वो इतने मशहूर और सम्मानित थे कि उन्हें 'फादर ऑफ यूरोलोजी इन इंडिया' भी कहा जाता था। डॉ भट्ट किसी अन्य रोगी के लिए ऑपरेशन थिएटर में जाते उससे पहले ही जया बच्चन ने उनके पास पहुंच, उनसे गुजारिश की कि वह अमिताभ को भी जरा देख लें। वो इसके लिए सहमत हो गए। उन्होंने अमिताभ की चोट वाली जगह की सूजन और उनकी हालत देखने के बाद उनका एक्सरे देखा तो उनकी आंखें खुली रह गईं। अमिताभ बच्चन ने इस घटना का भी एक बार जिक्र करते हुए कहा था, "डॉ भट्ट मेरे रूम के दरवाजे पर खड़े होकर जोर से बोले -"इनको इसी वक्त ऑपरेटिंग टेबल पर लेकर आओ। नहीं तो शाम की फ्लाईट से आप इनकी डेड बॉडी लेकर जाएंगे।" दरअसल, अमिताभ की इसी सर्जरी के बाद पहली बार पता लगा कि उनकी आंत फट गई है। जहर पूरे पेट में फैल चुका है और अब वह शरीर के दूसरे अंगों पर हमला कर रहा है।"