तमिल और तेलुगू जैसी सफलता आमतौर पर कन्नड़ फिल्मों को केजीएफ के पहले नहीं मिल पाई, इसकी वजह आपके हिसाब से क्या हो सकती है?
केजीएफ हमारी फिल्म नहीं है, केजीएफ कन्नड़ का प्राइड है। हां, केजीएफ से पहले कन्नड़ फिल्मों को तमिल और तेलुगू में इतनी सफलता नहीं मिली है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि कन्नड़ की फिल्मों का कंटेंट अच्छा नहीं होता है। हमारी इंडस्ट्री में भी बहुत अच्छे-अच्छे कलाकार, निर्देशक और निर्माता रहे हैं। लेकिन केजीएफ से पहले किसी भी कन्नड़ फिल्म ने इस भाषा की सीमा को तोड़ने की कोशिश नहीं की थी। तो तमिल और तेलुगू में केजीएफ को जो सफलता मिली है, वो प्रशांत नील की वजह से मिली है। भाषा की सीमा को तोड़ अन्य सिनेमा इंडस्ट्री में फिल्म को रिलीज करने का दृष्टिकोण उनका था। बतौर अभिनेता हमारा काम कन्नड़ के कल्चर का प्रतिनिधित्व करते हुए उनके दृष्टिकोण को पर्दे पर उतारना था। मैं हमेशा कहता हूं कि हमारी टीम 'लगान' की तरह थी, हमारे पास केजीएफ बनाने के लिए इक्विपमेंट्स नहीं थे, लेकिन वो जज्बा और जुनून जरूर था।