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जब अपनी सगाई तोड़ कैफी आजमी से शादी के लिए अड़ गई थी वो लड़की

Thu, 09 May 2019 04:38 PM IST
anand anand एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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शबान और कैफी आजमी - फोटो : file photo
मशहूर शायर और फिल्मी दुनिया के गीतकार कैफी आजमी की पुण्यतिथि 10 मई की होती है। कैफी के चाहने वाले उन्हें रूमानियत का शायर कहते थे। उनके अनेक किस्से हैं जब उन्हें सुनने वाले पहली बार में ही उन्हें अपना दिल दे बैठते थे। ऐसा ही एक किस्सा उनके बारे में उनके समकालीन शायर निदा फाजली ने साझा किया था।

बकौल निदा फाजली, ''कैफी आज़मी सिर्फ शायर ही नहीं थे। वह शायर के साथ स्टेज के अच्छे ‘परफार्मर’ भी थे। इस ‘परफार्मेंस’ की ताकत उनकी आवाज और आवाज के उतार चढ़ाव के साथ मर्दाना कदोकामत और फिल्मी अदाकारों जैसी सूरत भी थी।
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कैफी आजमी - फोटो : self
शायरी और इसकी अदायगी। ये दोनों विशेषताएं किसी एक शायर में मुश्किल से ही मिलती है। और जब ये मिलती है तो शायर अपने जीवन काल में ही लोकप्रियता के शिखर को छूने लगता है। कैफी आजमी इसी परंपरा से जुड़े शायर थे, यह परंपरा उन्हें बचपन में मोहर्रम की उन मजलिसों से मिली थी, जिनमें मर्सिए (शोक-गीत) सुनाए जाते थे।

सुनाने वाले आंखों और हाथों के हाव-भाव और आवाज़ के उतार-चढ़ाव से सुनने वालों को जब चाहे हंसाते थे, जब चाहे रुलाते थे और कभी उनसे मातम करवाते थे। कैफी आजमी का पढ़ने का अंदाज़ अपने-अपने समकालीनों में सबसे अनोखा था। मैंने हिंदी के सुमन और भवानी भाई को भी सुना है और उर्दू के फ़िराक़ और जोश को भी।
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कैफी आजमी - फोटो : file photo
ये सारे अपने अपने अंदाज़ में महफिलों में छा जाते थे लेकिन कैफी आजमी जब कलाम पढ़ने के लिए बुलाए जाते तो पढ़ने के बाद पूरे मुशायरे को अपने साथ ले जाते थे। हैदराबाद में एक मुशायरे में उनकी इसी कलात्मक प्रस्तुति ने कैफी के जवानी के दिनों की एक लड़की को किसी और के साथ अपनी मंगनी तोड़ने पर मजबूर कर दिया था। कैफी अपनी मशहूर नज्म औरत सुना रहे थे...

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे
क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं बस अश्क फिशानी ही नहीं
तू हक़ीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान...

 

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कैफी आजमी - फोटो : file photo
और वह लड़की अपनी सहेलियों में बैठी कह रही थी, “कैसा बदतमीज़ शायर है, वह ‘उठ’ कह रहा है। उठिए नहीं कहता और इसे तो अदब-आदाब की अलिफ़-बे ही नहीं आती। इसके साथ कौन उठकर जाने को तैयार होगा?” मुंह बनाते हुए वह व्यंग्य से पंक्ति दोहराती है, ‘उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे..’ ।
 
मगर जब श्रोताओं की तालियों के शोर के साथ नज़्म ख़त्म होती है तो वह लड़की अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फ़ैसला ले चुकी थी। मां बाप ने लाख समझाया वह नहीं मानी। सहेलियों ने इस रिश्ते की ऊँच-नीच के बारे में भी बताया। वह शायर है, शादी के लिए सिर्फ़ शायरी काफ़ी नहीं होती। शायरी के अलावा घर की ज़रूरत होती है।
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kaifi azmi - फोटो : social media
वह खु़द बेघर है, खाने-पीने और कपड़ों की भी ज़रूरत होती है। कम्युनिस्ट पार्टी उसे केवल 40 रुपए महीना देती है। लेकिन वह लड़की अपने फैसले पर अटल रही। और कुछ ही दिनों में अपने पिता को मजबूर करके बंबई ले आई। सज्जाद ज़हीर के घर में कहानीकार इस्मत चुग़ताई, फ़िल्म निर्देशक शाहिद लतीफ़, शायर अली सरदार जाफ़री, अंग्रेज़ी के लेखक मुल्कराज आनंद की मौजूदगी में वह रिश्ता जो हैदराबाद में मुशायरे में शुरू हुआ था, पति-पत्नी के रिश्ते में बदल गया।

सरदार जाफ़री ने दुल्हन को कैफी का पहला संग्रह ‘आख़िरी शब’ तोहफ़े में दिया। इसके पहले पेज पर कैफ़ी के शब्द थे, शीन (उर्दू लिपि का अक्षर) के नाम। मैं तन्हा अपने फ़न को आखिरी शब तक ला चुका हूं तुम आ जाओ तो सहर हो जाए। यह ‘शीन’ अब कैफी आजमी की विधवा हैं। वह शौकत ख़ान से शौकत आज़मी बनीं थीं, उनके नाम का पहला अक्षर है ‘शीन’। शौकत आज़मी जो जवानकैफी की खूबसूरत प्रेमिका थी, आज भारत की बड़ी अभिनेत्री शबाना आज़मी की मां हैं।
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कैफ़ी आज़मी - फोटो : file photo
कैफी आजमी ने शायरी 11 साल की उम्र में शुरू की, उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल जब गांव की एक महफिल में सुनाई तो उनकी उम्र को देखते हुए किसी को यकीन नहीं आया कि यह उन्हीं की लिखी हुई है।
कैफी को इस बेयकीनी पर काफी दुख हुआ। लेकिन इस दुख ने कम उम्र कैफ़ी को तोड़ा नहीं, इसे उन्होंने अपनी ताक़त बनाया और अपनी मेहनत और रियाज़त से वह बन कर दिखाया, जिसे आज लोग कैफ़ी आज़मी के नाम से जानते हैं। कैफी की उस पहली गजल का मतला है-

इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े
हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े


11 साल की उम्र में कही गइ यह गजल बेगम अख्तर की आवाज़ में पूरे देश में मशहूर हो चुकी है। 40 रुपए मासिक पगार से शुरु करके पृथ्वी थिएटर के सामने एक आलीशान बंगले तक की यात्रा में मुशायरों के स्टेज के साथ फ़िल्मों में उनकी गीतकारी ने भी बड़ी भूमिका निभाई है।
 
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