जॉनी वॉकर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी से जॉनी वॉकर बनने के तो कई किस्से सुनने को मिलते हैं, आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?
फिल्म 'बाजी' हिट हुई तो गुरु दत्त साहब ने सोचा कि और फिल्में बनाते है। गुरु दत्त साहब ने अपनी प्रोडक्शन कम्पनी खोल दी। नवकेतन ने और फिल्में बनानी शुरू कर दी। देव आनंद साहब, चेतन आनंद साहब बहुत बड़े नाम थे। तब तक डैडी का नाम बदरुद्दीन था और देव साहब उन्हें बदरू कहकर बुलाते थे। 'आर पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55, 'टैक्सी ड्राइवर' जैसी फिल्में शुरू होने लगी। सब फिल्मों में डैडी का अच्छा रोल था। लेकिन डैडी का नाम सबको खटक रहा था। क्योंकि वह फिल्मी नाम नहीं लग रहा था। फिर तय हुआ कि सब शराबी -शराबी पूछ रहे हैं तो अपना नाम जॉनी वॉकर रख लो। गुरु दत्त और चेतन आनंद साहब ने कहा कि हम और फिल्में बना रहे हैं, उसमें तुम्हारा अच्छा काम है, 'बाजी' के टाइटल में तो नाम आया नहीं, लेकिन अब नाम आएगा। सब शराबी के बारे में पूछ रहे हैं तो तुम जॉनी वॉकर नाम रख लो। डैडी ने सोचा की जॉनी तो बच्चा भी बोल सकता है, बहुत सहज नाम है। और, वॉकर मतलब चलने वाला। तो हो सकता है, मैं चल पड़ूं। वहां से डैडी का नाम जॉनी वॉकर पड़ गया। 'बाजी' से पहले भी डैडी ने कुछ फिल्में जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर की थी। दिलीप कुमार अंकल की फिल्म 'हलचल' में भी डैडी थे। फिर डैडी की 'आर पार', 'टैक्सी ड्राइवर' आई। फिल्में हिट रहीं और करियर चलने लगा ।