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बॉलीवुड फिल्मों की कहानियों में जान डालता है यह शख्स, हिंदी सिनेमा के बारे में किए कई बड़े खुलासे

Tue, 15 Jan 2019 01:56 PM IST
साइस्ता सैफी एंटरटेनमेंट डेस्क/ अमर उजाला डॉट कॉम
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bollywood - फोटो : self
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अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, इम्तियाज़ अली और दिबाकर बनर्जी, ये चारों हिंदी सिनेमा के दिग्गज नाम हैं। सिनेमा इनसे रिसता है, कभी सीले से रिश्ते सा तो कभी दहकता है किसी कहानी के सीने में छिपे अंगारे से। इन निर्देशकों की पहली पहल कहानियों को 35 एमएम की चौहद्दी में बांधने का काम जिस शख्स ने किया, वह आज की तारीख का मोस्ट वांटेड प्रोड्यूसर है, संजय राउतरे। अमर उजाला ने की संजय से एक खास मुलाकात।
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20 साल हो गए आपको हिंदी सिनेमा में निर्देशकों की पूरी एक जमात जमाते जमाते, कितना कुछ बदस गया अंधाधुन तक आते आते?
सबसे बड़ा बदलाव तो यही आया है कि पहले फाइनेंसर फोन करके पूछते थे कि अगली फिल्म में किस स्टार को साइन कर रहे हो, अब पूछते हैं कि कहानी कोई मिली क्या दमदार? अब सितारे कहानी के बाद आते हैं। पहले सितारे आते थे। कहानी तो अक्सर सेट पर ही लिख जाती थी।

इंडस्ट्री में कहा जाता है कि संजय के पास कहानियां पकड़ने वाली दृष्टि है, ऐसा क्यों?
देखिए, अब तक इतने सारे डायरेक्टर्स को अपनी पहली फिल्म से शोहरत की बुलंदी तक पहुंचते और फिर वहां से लुढ़कर फिर नीचे आते देख लिया है तो ये तो समझ आता ही है कि किसी डायरेक्टर या एक्टर को बनाती –बिगाड़ती इनकी फिल्मों की कहानी है। आज की तारीख में कोई डायरेक्टर, कोई एक्टर बॉक्स ऑफिस की ओपनिंग की गारंटी नहीं ले सकता, हां, कहानी दमदार तो ट्रेलर ही बता देता है कि फिल्म चलेगी कि नहीं चलेगी।
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अंधाधुन की कहानी में दांव लगाने वाला क्या था?
श्रीराम और मैं पहले भी साथ काम कर चुके हैं। मुझे पता है कि किसी डायरेक्टर का किसी कहानी को लेकर पागलपन क्या होता है। डायरेक्टर को जब कहानी पर इतना भरोसा हो तो फिर अच्छे एक्टर खुद डायरेक्टर के पास ऐसी कहानियां करने आते हैं।

लेकिन, अच्छी कहानियों तक तो चलकर कोई नहीं जाता?
हम जा रहे हैं ना। हमने अपनी कंपनी का नाम मैचबॉक्स पिक्चर्स इसीलिए तो रखा। सिर्फ तीली हो तो नहीं जलती और सिर्फ माचिस का खोखा हो तो भी नहीं जलता। बारूद को जलाने के लिए रगड़ की जरूरत होती है। हमारा दफ्तर हर नए-पुराने लेखकों के लिए खुला है। मैं खुद कहानियां सुनता हूं। हर राइटर को आधा घंटा मिलता है अपना मजमा जमाने को।

इतनी सारी विज्ञापन फिल्में करने का क्या तजुर्बा रहा?
टीवीसी बहुत कमाल की चीज़ है। 60 सेकेंड में पूरी दुनिया की कहानी समेटनी होती है। और, दर्शकों को वह चीज़ बेच भी देनी होती है। यही काम जब आपको 120 मिनट या उससे ज्यादा में करना होता है तो चुनौती उतनी बड़ी नहीं रह जाती। लेकिन, हां फिल्म का रिस्क टीवीसी से कहीं बड़ा है
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