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Exclusive Interview: घर से भागे, फुटपाथ पर सोए और फिर हैदराबाद जाकर यूं स्टार बन गए हर्षवर्धन राणे

Fri, 06 Nov 2020 07:11 PM IST
प्रतीक्षा राणावत मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला
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हर्षवर्धन राणे - फोटो : Twitter: @harsha_actor
फिल्मों में अपना करियर बनाने का सपना देखने वाले अभिनेता हर्षवर्धन राणे जब ग्वालियर से भागे, तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि आगे चलकर उन्हें क्या क्या काम करने पड़ सकते हैं? तेलुगू फिल्मों के वह बड़े सितारे हैं। लेकिन, एक वक्त उनकी जिंदगी में ऐसा भी रहा जहां उनके पास न तो खाने के पैसे थे और न ही सोने के लिए छत। इस खास बातचीत में ‘अमर उजाला’ ने हर्षवर्धन से उनके पूरे संघर्ष पर विस्तार से चर्चा की।
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हर्षवर्धन राणे - फोटो : Twitter: @harsha_actor
आपका बचपन कहां बीता? और क्या वहां पर अभिनय की शुरुआत करने जैसा माहौल था?

16 से 17 साल की उम्र तक मैं ग्वालियर में था लेकिन फिर उसे छोड़कर दिल्ली भाग गया था। मुझे पर्दे पर आना था और ग्वालियर में यह बात किसी को समझ में आ नहीं रही थी। वैसे आनी भी नहीं चाहिए। वह समय ऐसा था जब अभिनय को एक पेशे के रूप में नहीं देखा जाता था। लोग मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि क्या यह अभिनेता बनना भी कोई करियर बनाना है क्या? उस समय ग्वालियर से सिर्फ एक ही अभिनेता निकले जिनका नाम है शरद केलकर। मिसाल के तौर पर उनका नाम दिया जा सकता था लेकिन वह तो पहले से ही एक बड़े अभिनेता बन गए थे। उनका फोन नंबर वगैरह था नहीं। इस वजह से उनसे बातचीत करने का या कुछ पूछने का मौका ही नहीं मिला।
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हर्षवर्धन राणे - फोटो : instagram: harshvardhanrane
अब आप भी एक पहचान रखते हैं तो क्या शरद केलकर से आपकी कभी मुलाकात हुई?

जी हां! एक बार मेरी मुलाकात हुई थी उनसे। और मेरे बात करने के तरीके से वह अचानक आश्चर्य में आ गए। उनका कहना था कि मैं इतना सभ्य कैसे हूं जबकि मैं ग्वालियर से हूं? दरअसल, क्या है कि ग्वालियर के लोगों का जो स्वभाव है, वह थोड़ा कड़क माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भिंड, मुरैना और चंबल का जो क्षेत्र है, वहां पर थोड़े सख्त स्वभाव के लोग रहते हैं। फिर मैंने उन्हें बताया कि मैं थोड़ा जल्दी निकल गया था इस चक्कर में अलग-अलग शहरों का मैंने दौरा किया है। मैंने बताया कि उनका ही नाम लेकर मैं एक अभिनेता बनने की हिम्मत जुटा पाया तो वह बहुत खुश हुए।

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हर्षवर्धन राणे - फोटो : Twitter: @harsha_actor
ग्वालियर से भागने के बाद फिर आगे बढ़ने के लिए आपको किस घटना ने प्रेरित किया?

मैं कुछ इंटरव्यूज पढ़कर अपने आप को दिलासा दे रहा था कि दिल्ली से तो बहुत लोग इस इंडस्ट्री में आए हैं। आयुष्मान खुराना हैं, शाहरुख सर भी दिल्ली से ही आए हैं। वह भी किसी को नहीं जानते थे। अक्षय कुमार सर शेफ थे। इन सबके बारे में इंटरव्यूज पढ़-पढ़कर ही जाना है। इंटरव्यूज की ही ये ताकत होती है जो दूसरों को प्रभावित कर जाती है। फिर मैंने फैसला किया कि दुनिया को मैं अब बोलकर अपनी बात नहीं समझाऊंगा, करके दिखाऊंगा। दिल्ली जाकर मैंने बहुत से काम किए। वेटर बना। एसटीडी बूथ पर नौकरी की। 2002 के आसपास मेरा थोड़ा प्रमोशन हुआ और मुझे 20 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से एक साइबर कैफे में नौकरी मिली। महीने का 500- 600 रुपये कमाना मेरे लिए तब बहुत बड़ी बात थी। फिर मैं एक डिलीवरी ब्वॉय बना।
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हर्षवर्धन राणे - फोटो : Twitter: @harsha_actor
और फिर आपकी जॉन अब्राहम से मुलाकात हुई?

ये 2004 की बात है। मैं एक दिन एक यामाहा के शोरूम से हेलमेट की डिलीवरी लेकर एक श्रुति नाम की लड़की के यहां देने जाने वाला था। जब मैं हेलमेट लेकर उसके वहां पहुंचा तो उसने मुझसे कहा कि क्या मैं जानता हूं कि यह हेलमेट किसके लिए है? मैंने कहा कि नहीं, मुझे नहीं पता। तो उसने कहा कि यह जॉन अब्राहम के लिए है। यह सुनकर मैं तो पागल हो गया था। उसने मुझे रोका और कहा कि रुको, जॉन मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। यह सुनकर मैं थोड़ा डर गया। मुझे लगा कि कहीं मुझसे कोई गलती हो गई शायद! लेकिन, थोड़ी देर में वह लॉबी में आए और उन्होंने मुझे सिर्फ धन्यवाद कहने के लिए रुकवाया था। मैं इतना खुश हो गया कि मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किस तरह से प्रतिक्रिया दूं और उन्हें क्या बोलूं? उन्होंने एक डिलीवरी ब्वॉय के प्रति इतनी दयालुता दिखाई।
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तैश - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपको अपना पहला ब्रेक फिल्मों में किस तरह मिला?

मुंबई आने के बाद मैंने काफी समय तक डिलीवरी ब्वॉय का ही काम किया। वर्ष 2007 की बात है जब एक बार डिलीवरी देने के लिए मैं एक बिल्डिंग में गया और जाकर गलती से गलत घर में घुस गया। वहां एक दक्षिण भारतीय फिल्म का ऑडिशन चल रहा था। मैंने अचानक से अंदर का माहौल देखा और माफी मांग कर वापस जाने लगा। तभी अचानक उन लोगों ने मुझे रोक लिया और अंदर बुलाया। उन्होंने मुझसे कहा कि क्या मैं ऑडिशन दूंगा? मैंने पूछा उनसे कि किस चीज का ऑडिशन? तो उन्होंने कहा कि एक दक्षिण भारतीय फिल्म बनने वाली है। मैंने उनसे कहा कि मुझे भाषा तो आती नहीं है। मेरी मां आंध्र प्रदेश से थीं और वह भी बचपन में छोड़ गई थीं। मेरे पिताजी ग्वालियर से हैं। मैं 10 साल का ही था जब उनका तलाक हो गया। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली।

हम आपके पहले ब्रेक की बात कर रहे थे...

हां तो मैं उस दिन गलती से सही जगह पहुंचने की बात बता रहा था। मुझसे कहा गया कि मैं ऑडिशन हिंदी में दे दूं। तीन महीने बाद उनका फोन आया। मुझे सिलेक्ट कर लिया गया था। ये मेरी पहली फिल्म थी 'तकिता तकिता'। फिल्म में भूमिका चावला और भरत ठाकुर थे। सिर्फ चार लोगों की कहानी थी ये फिल्म।
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हर्षवर्धन राणे - फोटो : फाइल फोटो
तो क्या पहली फिल्म मिलने के बाद सबकुछ ठीक हो गया था?

पहली फिल्म ठीक-ठाक होने के बाद भी कुछ आसान नहीं था। लोग किसी भी नई चीज को स्वीकार करने में थोड़ा वक्त तो लगाते ही हैं। उस समय दक्षिण भारतीय फिल्मों में उत्तर भारतीय कलाकार जाते थे, वह ज्यादातर विलेन का ही काम करते थे। मैंने दक्षिण भारतीय फिल्मों में हीरो के रूप में बहुत काम किया है। हालांकि, पहली फिल्म से दूसरी फिल्म के बीच तीन साल का लंबा अंतराल रहा और इस दौरान मैंने फिर से बढ़ईगिरी, पेटिंग वगैरह के सारे काम किए। तब जाकर गाड़ी पटरी पर आई।

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हर्षवर्धन राणे - फोटो : फाइल फोटो
पैदाइश आपकी आंध्र प्रदेश की है, बचपन आपने ग्वालियर में गुजारा। जवान दिल्ली में हुए और अब मुंबई में रह रहे हैं। तो, वोट देने का अधिकार कहां है?

जिंदगी भर मेरे खाने के लाले रहे हैं। मैंने सोचा कि जहां से खाना मिल रहा है, वहां से खाना खाओ। जहां से तनख्वाह मिल गई, वहां से तनख्वाह लो और आगे बढ़ते रहो। मैं कभी बाकी कुछ कर ही नहीं पाया। कविता या फिर कोई भी कला हुई, वह सब ऊंची सोच की चीजें हैं। यह सब तब हो पाती हैं जब पेट में अन्न हो। रोटी की चिंता से मुक्त हो जाऊंगा तो बाकी कुछ भी देखूंगा। मैं बड़े मुद्दों की बजाय अपने पड़ोस का ध्यान रखता हूं। बिल्डिंग के बाहर चाय बेचने वाली आंटी, मेरी अपनी इमारत के वॉचमैन, ये सब मेरा परिवार हैं। किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ने से बेहतर मुझे आसपास के इन लोगों से घुलमिलकर रहना अच्छा लगता है। एक संस्था है मेरी, जो जरूरतमंदों की मदद करती है। स्वाति नाम की बच्ची को डॉक्टर बनाने का खर्च उठाने का फैसला मैंने इसी संस्था के जरिए किया है।

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तैश - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
एक समय था जब मल्टीस्टारर एक्शन फिल्मों की लाइन लगी रहती थी। क्या 'तैश' उस समय को फिर से वापस लाने की कोशिश हो सकती है?

यह तो पिछले काफी समय से मैं भी देख रहा हूं। उस समय अमित जी, शत्रुघ्न सिन्हा साहब और सनी देओल जैसे सितारे खूब मल्टीस्टारर फिल्में करते थे। वैसा समय मेरे हिसाब से फिर वापस आने वाला है। हो सकता है कि बीच में थोड़ा सा माहौल खराब हुआ था और कलाकारों ने एक दूसरे के साथ फिल्में नहीं कीं। लेकिन, आज का दौर ऐसा है कि मैं देख रहा हूं, सोशल मीडिया पर कलाकार एक दूसरे का समर्थन कर रहे हैं। मुझे लगता है कि ये एक संकेत है जो कहता है कि मल्टीस्टारर फिल्मों का दौर फिर से लौटेगा।
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सनम तेरी कसम - फोटो : फाइल फोटो
डब की गई दक्षिण भारतीय फिल्में आजकल उत्तर भारतीय दर्शकों को भी बहुत पसंद आ रही हैं। क्या ये इशारा है भाषाओं की बंदिशें खत्म होने का?

फिल्म 'बाहुबली' के बाद लोगों की सोच में बहुत बड़ा फर्क आया है। उस फिल्म के बाद यह साबित हो गया है कि अगर किसी फिल्म से आपकी भावनाएं जुड़ रही हैं तो वहां पर भाषाएं मायने नहीं रखती। पहले लोग भाषा पर ध्यान देते थे लेकिन अब कंटेंट और भावनाओं पर ध्यान दे रहे हैं। यही कारण है कि लोग हिंदी में डब की गई फिल्मों को भी खूब देख रहे हैं। अगर आपने नार्कोस सीरीज देखी हो तो उस भाषा का जिन लोगों से कोई लेना-देना भी नहीं है, वे भी सिर्फ सबटाइटल्स के साथ उस सीरीज को देख रहे हैं। मुझे लगता है कि भाषाओं की बंदिशें अब खत्म ही होने वाली हैं क्योंकि लोग अब सामग्री पर ध्यान देने लगे हैं।

'तैश' होने के बाद हिंदी में आगे आपके और कौन से प्रोजेक्ट हैं?

वर्ष 2016 में 'सनम तेरी कसम' से मैंने हिंदी फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की थी। उसके बाद वर्ष 2018 में 'पलटन' आई। इस साल 'तैश' रिलीज हुई है और अगले साल ‘हसीन दिलरूबा’ आएगी। फिल्म में मुख्य भूमिका तापसी पन्नू निभा रही हैं। उनके साथ विक्रांत मैसी हैं और मेरा भी फिल्म में एक अहम किरदार है।

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