हर्षवर्धन राणे
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पैदाइश आपकी आंध्र प्रदेश की है, बचपन आपने ग्वालियर में गुजारा। जवान दिल्ली में हुए और अब मुंबई में रह रहे हैं। तो, वोट देने का अधिकार कहां है?
जिंदगी भर मेरे खाने के लाले रहे हैं। मैंने सोचा कि जहां से खाना मिल रहा है, वहां से खाना खाओ। जहां से तनख्वाह मिल गई, वहां से तनख्वाह लो और आगे बढ़ते रहो। मैं कभी बाकी कुछ कर ही नहीं पाया। कविता या फिर कोई भी कला हुई, वह सब ऊंची सोच की चीजें हैं। यह सब तब हो पाती हैं जब पेट में अन्न हो। रोटी की चिंता से मुक्त हो जाऊंगा तो बाकी कुछ भी देखूंगा। मैं बड़े मुद्दों की बजाय अपने पड़ोस का ध्यान रखता हूं। बिल्डिंग के बाहर चाय बेचने वाली आंटी, मेरी अपनी इमारत के वॉचमैन, ये सब मेरा परिवार हैं। किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ने से बेहतर मुझे आसपास के इन लोगों से घुलमिलकर रहना अच्छा लगता है। एक संस्था है मेरी, जो जरूरतमंदों की मदद करती है। स्वाति नाम की बच्ची को डॉक्टर बनाने का खर्च उठाने का फैसला मैंने इसी संस्था के जरिए किया है।