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निर्देशक की ऐसी इमेज से डर गईं थीं सांड की आंख की हीरोइनें, इंटरव्यू में तुषार ने खोला राज

Tue, 15 Oct 2019 12:13 PM IST
Mishra Mishra मुंबई डेस्क, अमर उजाला
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Tushar Hiranandani - फोटो : Social Media
हिंदी सिनेमा में हर लेखक का सपना होता है एक दिन निर्देशक बनना। एकता कपूर के साथ लंबे समय तक काम कर चुके तुषार हीरानंदानी को सिनेमा घुट्टी में मिली है। पिता और बाबा दोनों बड़े फिल्म वितरक रहे हैं। वह खुद भी तमाम फिल्मों की कहानियां लिख चुके हैं, निर्देशक वह फिल्म सांड़ की आंख से बने हैं।

आपको फिल्म इंडस्ट्री में 20 साल से भी ज्यादा हो गए हैं। निर्देशक बनने में इतना समय क्यों लग गया?
मेरे पास पहले भी कई कहानियां थीं जिन्हें मैं ही निर्देशित करना चाहता था। लेकिन, जब तक मैं शुरूआत करता मेरी कहानी में मेरी ही दिलचस्पी खत्म हो जाती थी। कहानियां लिखने का काम भी ज्यादा अच्छा चल रहा था इसलिए भी निर्देशन की तरफ मेरा ज्यादा ध्यान नहीं गया। लेकिन सत्यमेव जयते के सेट पर जब मेरे पास ये कहानी आई तो मैंने उसी वक्त निर्णय लिया कि इसी कहानी से निर्देशक बनूंगा। मेरी पत्नी ने नौकरी छोड़ी और अनुराग कश्यप ने भी मेरा साथ दिया। इस सबके बाद भी पांच साल लगे मुझे ये फिल्म पूरी करने में।
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Tushar Hiranandani - फोटो : Social Media
आप खुद लेखक हैं तो आपने सांड की आंख की कहानी क्यों नहीं लिखी?
मैंने उत्तर प्रदेश की इन दो दादियां की कहानी पर पांच साल पहले काम शुरू किया था,। फिर मैं जाने माने लेखक संजय मासूम से मिला जिन्होंने मुझे बल्ली से मिलवाया और दादियों से भी। फिर हम जौहरी गांव आए। सही बताऊं तो मुझे खुदपर यकीन नहीं था कि यह कहानी मैं लिख पाऊंगा या नहीं। फिर मेरी मुलाकात जगदीप से हुई जिन्होंने फिल्म के संवाद लिखे हैं। आज सभी इन संवाद की तारीफ कर रहे हैं।
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Tushar Hiranandani - फोटो : Social Media
तापसी और भूमि को निर्देशित करना कैसा रहा?
नखरे तो मेरे ही थे पर मेरी टीम बहुत ही अच्छी है। दोनों ने मुझ पर विश्वास किया और मेरी सोच का बहुत साथ भी दिया। शुरूआत में वह भी थोड़ा डरे हुए थे क्यों सभी मुझे फिल्म मस्ती फिल्म और कई वैसी ही फिल्मों के लेखक के नाम से जानते हैं। उसकी वजह से मैने इस छवि को काफी वक्त तक झेला है। अनुराग कश्यप और मेरी पत्नी सभी घबराए हुए थे। पर फिल्म के सेट पर दो तीन दिन बाद सभी ने मुझमें विश्वास करना शुरू कर दिया।
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Tushar Hiranandani - फोटो : Social Media
फिल्म की कहानी में कहां तक सच्चाई दिखाई गई है?
हमने ज्यादा से ज्यादा सच्चाई दिखाने की कोशिश की है। जो तथ्य हैं उन्हें नहीं बदला है। हां कहानी को थोड़ा अच्छा जताने के लिए थोड़ा ड्रामा तो डाला ही है। बहुत ही छोटे स्तर पर कहानी में बदलाव किए गए हैं। लेकिन इन दो दादियों के सफर को 70 से 80 प्रतिशत तक वैसे ही बताया है। हिन्दी फिल्म है तो थोड़ा बहुत ड्रामा तो डालना ही पड़ता है। कुछ नए किरदारों को भी डाला है। पांच साल की तपस्या का फल है मेरी ये फिल्म। बहुत कुछ सिखाया पढ़ाया है इस फिल्म ने मुझे। 
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