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हिंदी सिनेमा ने 50 साल में खूब समझाए पर्यावरण से प्रेम के ये सबक, टिड्डियों का ये हमला देखा था क्या!

Thu, 04 Jun 2020 10:03 PM IST
anand anand अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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पर्यावरण दिवस 2020 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दुनिया में बढ़ती दौड़ धूप की वजह से लगातार पर्यावरण को बहुत हानि पहुंच रही है। इसके चलते समय समय पर इंसानों को तरह-तरह की नई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। लोगों को जागरूक करने के लिए भारतीय सिनेमा ने भी कुछ फिल्में बनाई हैं जो संदेश देती हैं कि हमें अपने पर्यावरण के संरक्षण के लिए चल रहे सरकारी और गैर सरकारी अभियानों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। ये फिल्में बताती हैं कि अगर हम अब भी जागरूक नहीं हुए तो भविष्य में हमें किन किन प्राकृतिक मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। पर्यावरण दिवस के खास मौके पर आज हम आपको हिंदी की कुछ ऐसी ही फिल्मों के बारे में बताते हैं।
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हल्का - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हल्का (2018)
नीला माधव पांडा के निर्देशन और निर्माण में बनी यह फिल्म भारत में बड़े पैमाने पर खुले में शौच करने की समस्या पर प्रकाश डालती है। इस फैमिली ड्रामा फिल्म में एक छोटे बच्चे पिचकू की कहानी दिखाई गई है जो दिल्ली के स्लम इलाकों से उठकर अपना खुद का शौचालय बनवाने के लिए मंत्रालय तक पहुंच जाता है। जबकि उसके पिता ऐसा नहीं चाहते। इसी बीच उसे सरकार कार्य तंत्र में फैले भ्रष्टाचार का भी सामना करना पड़ता है। इस छोटे बच्चे के संघर्ष की कहानी को नेटफ्लिक्स पर देखा जा सकता है।
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कड़वी हवा - फोटो : सोशल मीडिया
कड़वी हवा (2017)
हिंदी सिनेमा की यह इकलौती फिल्म है जो क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दे को केंद्र में रखकर बनाई गई है। फिल्म में एक गांव महुआ है जो सूखे का शिकार होता है। पानी न होने की वजह से फसलें नहीं हो पातीं और किसान आत्महत्या करना शुरू कर देते हैं। यह बात वहां के इंसानों के लिए आम ही थी। एक बूढ़ा आदमी अपने किसान बेटे को लेकर बहुत चिंतित होता है। किसानों की आत्महत्या का मुद्दा तो भारत में एक राजनीतिक मुद्दा भी है। यह फिल्म इस समस्या को गहराई से उजागर करती है। इस फिल्म को यूट्यूब पर देखा जा सकता है।

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वारदात - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वारदात (1981)
आजकल भारत के किसानों की फसलों में टिड्डी दल का हमला खूब चर्चा में है। इससे किसान बहुत परेशान हैं और घबराए भी हुए हैं। टिड्डियों का यह झुंड एक ऐसी समस्या है जो जहां से गुजरता है, अपने पीछे तबाही और फसलों का सूपड़ा साफ करता हुआ निकलता है। इस फिल्म में भी टिड्डियां हमला करती हैं लेकिन वह मानव जनित होती हैं। दरअसल एक रासायनिक परीक्षण असफल हो जाने से टिड्डियां पैदा होती हैं और वह फसलों का सर्वनाश करना शुरू कर देती हैं। हालांकि इस फिल्म के हीरो मिथुन चक्रवर्ती गन मास्टर जी बनकर इस घटना का पर्दाफाश करते हैं। इस फिल्म को यूट्यूब पर देखा जा सकता है।
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हाथी मेरे साथी - फोटो : सोशल मीडिया
हाथी मेरे साथी (1971)
हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार दिवंगत अभिनेता राजेश खन्ना की यह सुपरहिट फिल्म लोगों को जानवरों से प्यार करना सिखाती है। आजकल जानवरों के संरक्षण के लिए न जाने कितने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम किए जा रहे हैं। कई ऐसी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं हैं जो जानवरों के संरक्षण पर जोर देती हैं। पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने के लिए जानवरों का होना भी बहुत जरूरी है। फिल्म में राजेश खन्ना चार हाथियों के बीच पलकर बड़े होते हैं और उनके दोस्त बन जाते हैं। बदले में राजेश की बहुत सी परेशानियों को ये हाथी अपने सिर ले लेते हैं। इस फिल्म को यूट्यूब पर देखा जा सकता है।
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उपकार - फोटो : सोशल मीडिया
उपकार (1967)
हिंदी फिल्मों के शानदार अभिनेता, निर्देशक और निर्माता मनोज कुमार को जब भारत कुमार का दर्जा मिलने लगा था, तो उसका कारण कुछ इस तरह की धरती से जुड़ी फिल्में ही थीं। फिल्म में भारत एक धरती से जुड़ा इंसान है जो खेती बाड़ी करता है और अपने भाई को शिक्षित करने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है। लेकिन बाद में वही पढ़ा लिखा भी लालची निकलता है और पैसा कमाने के लिए गलत रास्तों पर निकल पड़ता है। फिल्म में भारत का धरती प्रेम बहुत ऊंचा है। वह धरती को अपनी मां समझता है और उसी के गीत गाता है। यह फिल्म यूट्यूब पर मुफ्त में उपलब्ध है।
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