नुसरत भरूचा
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कोई ऐसी फिल्म करने का मन तो होता होगा, जिसमें कहानी सिर्फ आपके आसपास चक्कर लगाए?
जी बिल्कुल, अब समय बदल गया है। एक हीरोइन की परिभाषा भी फिल्मों में बदल गई है। इसीलिए अब पिंक, पीकू, राजी और गली बॉय जैसी फिल्में देखने को मिलती हैं। इस तरह की कहानियां लिखना लेखकों के हाथ में होता है। पर अब भी ऐसी फिल्में बहुत ही कम लिखी जा रही हैं। अभी तक जितनी भी फिल्में मैने की हैं वह सभी मर्दों की कहानियां हैं। मुझे लगता है महिला किरदार केंद्रित फिल्म मुझ तक आने में अभी और वक्त लगेगा।