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अमर उजाला से Exclusive बातचीत में बोले कबीर खान, 'आजादी का ये इतिहास जानना भी जरूरी'

Sat, 25 Jan 2020 11:25 AM IST
shrilata biswas रोहिताश सिंह परमार, मुंबई
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Kabir Khan, The Forgotten Army - फोटो : amar ujala mumbai
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कायमगंज, फर्रूखाबाद से ताल्लुक रखने वाले राज्यसभा सांसद रहे रशीउद्दीन खान के बेटे कबीर खान ने हिंदी सिनेमा में काबुल एक्सप्रेस, न्यूयॉर्क, एक था टाइगर, बजरंगी भाईजान, फैंटम और ट्यूबलाइट जैसी फिल्में निर्देशित कर बड़ा नाम कमाया है। फिल्में बनाने से पहले उन्होंने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों पर लंबा शोध किया, इस शोध की तासीर अब वेब सीरीज द फॉरगॉटेन आर्मी की शक्ल में सामने आई है। अमर उजाला के लिए कबीर खान से ये खास मुलाकात की रोहिताश सिंह परमार ने।
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कबीर खान - फोटो : ani
20 साल तक एक कहानी सीने में दबाए कमर्शियल सिनेमा बनाते रहना बहुत मुश्किल रहा होगा, कितना बदल गई ये कहानी तब से अब तक?
20 साल में लोग बदल जाते हैं और किसी चीज को देखने का नजरिया भी बदल जाता है। तब जो मैंने पटकथा लिखी थी वह सिर्फ इस कहानी को ध्यान में रखकर लिखी थी। इसी बीच मैंने कई फिल्में भी बनाईं। इसके बाद इसी कहानी पर मैंने एक निर्माता की तरह सोचना शुरू कर दिया। मैंने सोचा कि जरूरी नहीं कि जो कहानी जैसी बीती उसे वैसा ही दिखाएं बल्कि जरूरी यह है कि कहानी की जो तासीर है वह साफ होनी चाहिए इसलिए मैंने इसे फिर से लिखा। अब जो कहानी वेब सीरीज के तौर पर फॉरगॉटेन आर्मी के नाम से बनी है, उसमें ड्रामा बहुत है। हमारे मुल्क के लिए लड़ते हुए 27 हजार सैनिक शहीद हो गए और हमें इसकी कोई जानकारी ही नहीं है। आजादी का ये इतिहास जानना जरूरी है।
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काबुल एक्सप्रेस - फोटो : फाइल
कहा जा सकता है कि इसी कहानी की वजह से आप निर्देशक बने?
हां, इस कहानी पर मैंने एक वृत्त चित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाई थी तभी से ये कहानी मेरे दिमाग में फंसी रही है। फिल्मों की तरफ मेरे रुझान का श्रेय भी इसी कहानी को जाता है। मैंने अपनी जिंदगी की पहली पटकथा इसी पर लिखी लेकिन मैं जानता था कि इतनी महत्वाकांक्षी परियोजना में मेरा साथ इतनी जल्दी तो कोई नहीं देने वाला इसलिए मैंने 'काबुल एक्सप्रेस' बनाई। हर कहानी के बाद मुझे इस कहानी की याद आती थी। ऐसे ही सिलसिला चलता रहा।

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कबीर खान - फोटो : सोशल मीडिया
क्या फीचर फिल्मों की तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी बंदिशें हैं?
नहीं, फीचर फिल्मों की तरह यहां कोई सेंसर बोर्ड नहीं है इसलिए हमें कोई गाइडलाइंस नहीं दी गई पर हमें खुद जिम्मेदार होना चाहिए। कोई आपको बताए कि आपको क्या करना है, उससे अच्छा है कि आप खुद ही जिम्मेदार बनिए। कला एक स्वतः विकसित होने वाली प्रक्रिया है इसलिए देखने वाले और दिखाने को खुद निर्णय लेना चाहिए कि हमें क्या करना है। सेंसर बोर्ड को भी बस आयु सीमा तय करनी चाहिए कि किस फिल्म को कितनी उम्र के लोग देख सकते हैं। उसका काम ये बताना बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि फिल्म में क्या हो और क्या नहीं।
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सलमान और कबीर खान - फोटो : सोशल मीडिया
निर्देशकों के काम में सुपरसितारों के हस्तक्षेप के बढ़ते चलन पर आप क्या कहेंगे?
कोई भी अभिनेता कहानी सुनने के दौरान या शूटिंग के दौरान अपने निर्देशक को कुछ बता रहा है तो यह निर्देशक के ऊपर है कि वह उसे कैसे लेता है। वह इसे नकारात्मक लेता है तो हस्तक्षेप हो गया और अगर इसे सकारात्मक तरीके से लिया गया तो ये फीडबैक हो गया। निर्देशक को खुद में मजबूत और आत्मविश्वास से भरा हुआ चाहिए। तानाशाही करना तो बेवकूफी ही होगी। आपको हमेशा दूसरों के विचारों के लिए खुला रहना चाहिए। 

आपने सलमान खान के साथ दो बड़ी फिल्में एक था टाइगर और बजरंगी भाईजान कीं। तो ट्यूबलाइट के साथ क्या गलती हुई?
गलती कुछ नहीं थी बस दर्शकों को पसंद नहीं आई। हर फिल्म को हर फिल्मकार अपने नजरिए से बनाता है। न्याय तो दर्शक ही करते हैं कि फिल्म अच्छी है या बुरी। हम तो पूरी शिद्दत के साथ अपना काम करते रहेंगे। उसका फैसला जनता ही करेगी। ये हमारी यात्रा का हिस्सा है। 
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रणवीर सिंह, बोमन ईरानी और कबीर खान - फोटो : सोशल मीडिया
एक था टाइगर की सीक्वल टाइगर जिंदा है को अली अब्बास जफर ने निर्देशित किया, आपने देखी ये फिल्म?
हां, मैंने ये फिल्म टुकड़ों में देखी है। कभी एक साथ बैठकर देखने का टाइम ही नहीं मिला। 

फिल्म जगत में बड़ी चर्चा है कि हाल ही में आपने एक पटकथा सलमान खान को सुनाई है। कितना सच है इसमें?
मैंने सलमान को कोई कहानी नहीं सुनाई है। मैं सिर्फ उनसे मिलने गया था। मैंने अभी उनके साथ किसी भी प्रोजेक्ट पर काम शुरू नहीं किया है, लेकिन हां कोशिश जारी है। क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत की पहली जीत पर बनी फिल्म '83' के बाद मेरे पास कोई काम नहीं है।
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'द फॉरगॉटन आर्मी-आजादी के लिए' - फोटो : सोशल मीडिया
आपके करियर में एक अखबार की क्या भूमिका रही है?
जीवन में अपना नजरिया बनाने के लिए अखबार ही मेरा सबसे अहम सहायक रहा। उस समय का मीडिया भी बहुत सटीक था। आजकल समझ नहीं आता कि लोग क्या कर रहे हैं। पहले अखबारों में रुचिकर आलेख आते थे, बुद्धिजीवियों के नजरिये आते थे, इसके चलते अखबार पढ़ने में आनंद आता था। इसके बावजूद मैं आज भी अखबार पढ़ता हूं, इंटरनेट से खबरें मैं आज भी नहीं पढ़ पाता। 

आपकी वेब सीरीज द फॉरगॉटन आर्मी किस बारे में है?
यह आजाद हिंद फौज की कहानी है। हम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बारे में जानते हैं लेकिन उनकी फौज के बारे में बिल्कुल नहीं जानते। हमने इसी फौज को केंद्र में रखकर यह सीरीज बनाई है। यह हमारा ऐसा इतिहास है जिससे हम एकदम अनभिज्ञ हैं। अंग्रेजों ने इनका इतिहास लिखकर इन्हें गद्दारों की फौज बता दिया। असलियत मुझे तब पता चली जब मुझे कैप्टन लक्ष्मी सहगल और कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लन के साथ इस मुद्दे पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का मौका मिला। मैं इनके साथ सिंगापुर से बर्मा होता हुआ तीन महीने में भारत वापस आया। ये वही रास्ते था जिससे आजाद हिंद फौज गुजरी। तब जाकर मुझे इस कहानी का और इसके नायकों का असली संघर्ष पता चला।

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