विशाल भारद्वाज के शागिर्द रहे निर्देशक अभिषेक चौबे (Abhishek Chaubey) की हर फिल्म सामाजिक मुद्दों पर गहरी चोट करती है। फिल्म ओंकारा से बतौर सहायक अपना करियर शुरू करने वाले अभिषेक को हिंदी सिनेमा के संवादों में बोलियां और गालियां लाने के लिए भी जाना जाता है। अमर उजाला से इस खास बातचीत में अभिषेक बता रहे हैं अपनी नई फिल्म सोनचिड़िया की उड़ान और इसके किरदारों के मचान के बारे में।
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abhishek chaubey
अभिषेक चौबे को अपराध में जज्बात महकाने का मास्टर माना जाता है, फिल्म सोनचिड़िया इस बारे में क्या नया कहती है?
-मैंने एक एक्शन फिल्म बनाई है क्योंकि आज की पीढ़ी को रोमांच पसंद है। इस फिल्म की अंतर्धारा है जाति व्यवस्था को लेकर बीते 70 साल से चला आ रहा सामाजिक संघर्ष। हम सब पढ़े लिखे लोग चाहते हैं कि जातिप्रथा बंद होनी चाहिए। जाति के आधार पर भेदभाव बंद होना चाहिए। लेकिन, जिस दौर की ये फिल्म है उस दौर के लोगों का सोचना अलग था। ये बागी जाति व्यवस्था में यकीन रखते हैं, उस जाति व्यवस्था में जो हजारों साल से हमारे देश में चली रही है। यही इसके किरदारों का भीतरी संघर्ष है और ये संघर्ष तब और मार्मिक हो जाता है जब इन्हें समझ आता है कि जो कुछ ये अब तक करते आए, क्या वह सही था?
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- फोटो : social media
सोनचिड़िया का टीजर देख लगा कि फिल्म के हीरो तो मनोज बाजपेयी हैं, लेकिन ट्रेलर बताता है कि कहानी जितनी मानसिंह की है, उतनी ही लखना और वकील सिंह की भी है और ये सब चंबल के ठाकुर हैं तो फिर संघर्ष क्या है?
- फिल्म के हीरो को पारंपरिक तौर पर परिभाषित करेंगे तो हीरो तो सुशांत सिंह ही हैं। मनोज बाजपेयी का किरदार मान सिंह फिल्म की आत्मा है। सुशांत का किरदार लखना और रणवीर शौरी का किरदार वकील दोनों का संघर्ष एक दूसरे पर अविश्वास का भी है। सुशांत को जब इस किरदार के लिए मैंने लिया तो वह थोड़ा डरे हुए थे कि उनसे ये किरदार होगा भी कि नहीं। एक तो उनके सामने डकैत बनने की चुनौती थी, दूसरी चुनौती थी वहां की बोली की। हम लोगों ने मिलकर इस पर बहुत ज्यादा काम किया है। रणवीर सिंह का किरदार अगर आपको चौंका रहा है तो यही इस कास्टिंग की जीत है। रणवीर शौरी मुंबई या दिल्ली के मिडिल क्लास फैमिली के शहरी किरदार ही करते आए हैं। उनके भीतर के अभिनेता को मैंने इस फिल्म में पहली बार दूसरे तरीके से पेश किया है। रणवीर की अदाकारी की कूवत को अब तक ज्यादा पहचाना ही नहीं गया। मेरे लिए यह बोली पकड़ना मुश्किल इसलिए नहीं रहा क्योंकि मैं उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ, झारखंड में पला बढ़ा और हैदराबाद तक पढ़ाई करने गया तो मेरे लिए हिंदी का अलग अलग लहजा समझना आसान है।
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और, मुंबई में रहते हुए कितना आसान है ये मान लेना कि फैजाबाद का नाम अब अयोध्या हो गया है?
- क्या कह सकता हूं, किसी जगह का नाम बदलने से पहले वहां रहने वालों की राय तो ली नहीं जाती। फैजाबाद क्या है, इसकी ताकत क्या है, इसकी विरासत क्या है, कितने लोगों का पता है आज? बेगम अख्तर वहां की थी, कबाब की शुरूआत फैजाबाद से होती है। जब लखनऊ नहीं था तब अवध की राजधानी फैजाबाद ही थी। तो अगर आप किसी स्थान की संस्कृति मिटाना चाहते हैं तो वह ऐसे तो नहीं मिटने वाली। नाम बदल देने से कहीं की संस्कृति या विरासत नहीं बदल जाती।
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आपकी अपनी विरासत जो है फिल्मों की, उसे कभी बदलने का ख्याल आया? पुनरावलोकन करते हैं अपनी पिछली फिल्मों का?
- मेरे लिए ये बहुत दर्दनाक होता है। खाना खाते वक्त टेलीविजन देखने की मेरी आदत है। तो जब भी अपनी बनाई फिल्म दिख जाती है तो देखता हूं, पूरी फिल्म देखना मेरे लिए मुश्किल है। लेकिन, दोबारा अपनी फिल्में देखता हूं तो खामियां खामियां ही नजर आती हैं। कई बार तो देखकर शर्म भी आती है। शर्म इस बात पर आती है कि ये मैंने कैसे कर दिया। अब उस समय क्या हालात रहे होंगे ये तो याद नहीं क्योंकि रात गई बात गई लेकि ज्यादातर यही फीलिंग आती है कि ये मैंने क्या कर दिया। हां, अच्छा सीन दिख जाए तो कभी कभी खुशी भी मिलती है।
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राज कपूर की फिल्मों में देसी बोली का खूब इस्तेमाल होता रहा है, अभिषेक चौबे की देसी बोली अपने साथ गांव देहात की गालियां भी लेकर आई?
- हां, मेरी मेरी चारों फिल्मों में गालिया रहीं हैं। लेकिन ऐसा कोई मैंने गालियों की संस्कृति लाने के लिए नहीं किया। ये फिल्में ऐसे किरदारों के बारे में हैं जो ऐसे ही बोलते हैं। अगर मैं किसी पंडित के बारे में फिल्म बनाऊंगा तो ये भाषा नहीं होगी। लेकिन मैं डाकुओ के बारे में फिल्म बनाऊंगा, स्मगलर के ऊपर फिल्म बनाऊंगा, उठाईगीरों के ऊपर फिल्म बनाऊंगा तो मुमकिन यही हैं कि उनकी ये ही भाषा होगी।
लेकिन राजकपूर ने जिस देश में गंगा बहती है डाकुओं पर बनाई रमेश सिप्पी ने शोले बनाई, ये भी डाकुओं पर बनीं फिल्में हैं, उनमें तो ऐसी गालियां नहीं हैं?
- वही मैं कह रहा हू कि उन्होंने जो गलतियां की उन्हें दोहराना तो नहीं चाहिए। सिनेमा को जितना यथार्थ के करीब ला सकते हैं उसे मनोरंजन के करीब रखते हुए, वही बतौर निर्देशक मेरी कोशिश रहती है। अब कोई ये कहे कि गब्बर सिंह जो गुस्सा आएगा तो वह गालियां नहीं देगा, ये मैं नहीं मान सकता। लेकिन, उस समय के समाज और समय के हिसाब से सिनेमा में गालियां नहीं ला सकते थे। सोनचिड़िया में भी मनोज बाजपेयी का जो किरदार है वो बहुत अदब से बातें करता है, यहां तक कि जहां हम फिल्म शूट कर रहे थे वहां के थानेदार ने हमें टोका कि डकैत इतना शरीफ कैसे हो सकता है? गालियां में अपनी फिल्मों का कारोबार बढ़ाने के लिए नहीं डालता हूं।
और, सोनचिड़िया के बाद?
- एक वेबसीरीज बनाने जा रहा हूं। मेरठ और मुरादाबाद की कहानी है। वहां के अपराध जगत की।