साल भर रुकते दिलीप कुमार तो जमाना उनके सौ साल के होने का जश्न धूमधाम से मनाता। लेकिन, उससे पहले पूरे देश और दुनिया में मातम है। दिलीप कुमार नहीं रहे। सांसों की आवाजाही में लगातार रुकावट होती रही। उनके नजदीकी उनके सेहतमंद होने की लगातार दुआ करते रहे। लेकिन, हर दुआ कुबूल ही कहां होती है। करोड़ों दुआओं पर ऊपरवाले की मर्जी भारी पड़ी और 11 दिसंबर 1922 को पेशावर, पाकिस्तान में पैदा होकर घरवालों से युसूफ खान का नाम पाने वाले दिलीप कुमार बुधवार को यहां मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में चल बसे।
दिलीप कुमार ने आधी से ज्यादा जिंदगी हिंदी सिनेमा के नाम कर दी थी। पहली फिल्म ‘ज्वारा भाटा’ (1944) से लेकर ‘किला’ (1998) तक वह करोड़ों दिलों पर राज करते रहे। उनकी मेथड एक्टिंग को हिंदी सिनेमा में पीढ़ी दर पीढ़ी तमाम अभिनेताओं ने आगे बढ़ाया। लेकिन, फिर कोई दूसरा दिलीप कुमार न हुआ, न ही आगे होगा। फिल्म ‘मुगले ए आजम’ के रंगीन संस्करण की रिलीज पर उन्होंने कहा था, ‘सिनेमा का रंग बदल सकता है। लेकिन, इसकी तासीर ऐसी है जो हर मजहब के इंसान को कंधे से कंधा मिलाकर तीन घंटे एक बंद कमरे में साथ रोने और साथ हंसने के लिए मजबूर कर देती है। सिनेमा की तासीर मजहब के सारे मतभेद भुला देती है।’