विकास खन्ना
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बड़ी पुरानी कहावत है कि दो जून की रोटी आदमी बड़ी मुश्किल से कमाता है, इस कहावत के मायने आज कितना बदल गए है?
मायने तो वहीं हैं, लेकिन आज डिमांड ज्यादा बढ़ गई है। पहले बड़ी साधारण जिंदगी थी। भले ही पहले आर्थिक रूप से बहुत संघर्ष था, लेकिन एक साथ परिवार के साथ बैठकर खाना खाने में बहुत सुकून था। आज की तारीख में तारीख में कमाना मुश्किल नहीं है, बल्कि खाना खाते वक्त अब सुकून नहीं रहा। पहले एक घर में एक टीवी होता था तो सब साथ में बैठकर टीवी देखते थे। मैं अमृतसर का रहने वाला हूं, मुझे याद है, शाम को साढ़े आठ बजे एक पाकिस्तानी सीरियल आता था उसे देखने के बाद नौ बजे परिवार के सभी लोग एक साथ डायनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। एक साथ घर में रहने के बावजूद सब अलग अलग खाना खा रहे हैं।