पिता हरिवंश राय बच्चन के साथ अमिताभ
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ख्वाजा अहमद अब्बास ने इस बातचीत का पूरा विवरण अपनी आत्मकथा, 'आई एम नॉट एन आईलैंड' में लिखा है-
-'बैठिए। आपका नाम?'
'अमिताभ'(बच्चन नहीं)
-'पढाई?'
'दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए'
- 'आपने पहले कभी फिल्मों में काम किया है?'
'अभी तक किसी ने मुझे अपनी फिल्म में नहीं लिया।'
- 'क्या वजह हो सकती है ?'
'उन सबने कहा कि मैं उनकी हीरोइनों के लिए कुछ ज्यादा ही लंबा हूँ।'
-'हमारे साथ ये दिक्कत नहीं है, क्योंकि हमारी फिल्म में कोई हीरोइन है ही नहीं। और अगर होती भी, तब भी मैं तुम्हें अपनी फिल्म में ले लेता।'
'क्या मुझे आप अपनी फिल्म में ले रहे हैं? और वो भी बिना किसी टेस्ट के?'
-'वो कई चीजों पर निर्भर करता है। पहले मैं तुम्हें कहानी सुनाऊंगा। फिर तुम्हारा रोल बताऊंगा। अगर तुम्हें ये पसंद आएगा, तब मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैं तुम्हें कितने पैसे दे सकूंगा।'
इसके बाद अब्बास ने कहा कि पूरी फिल्म के लिए उसे सिर्फ पांच हजार रुपए मिलेंगे। वो थोडा झिझका, इसलिए अब्बास ने उससे पूछा, 'क्या तुम इससे ज्यादा कमा रहे हो?'
अमिताभ ने जवाब दिया, 'जी हाँ। मुझे कलकत्ता की एक फर्म में सोलह सौ रुपए मिल रहे थे। मैं वहाँ से इस्तीफा दे कर यहाँ आया हूँ।'
-अब्बास आश्चर्यचकित रह गए और बोले, 'तुम कहना चाह रहे हो कि इस फिल्म को पाने की उम्मीद में तुम अपनी सोलह सौ रुपए महीने की नौकरी छोड कर यहाँ आए हो? अगर मैं तुम्हें ये रोल ना दूं तो?'
अमिताभ ने कहा, 'जीवन में इस तरह के 'चांस' तो लेने ही पडते हैं।'
-अब्बास ने वो रोल उसको दे दिया और अपने सचिव अब्दुल रहमान को बुला कर कॉन्ट्रैक्ट 'डिक्टेट' करने लगे। उन्होंने उस शख्स से इस बार उसका पूरा नाम और पता पूछा।
'अमिताभ।'
-उसने कुछ रुक कर कहा, 'अमिताभ बच्चन, पुत्र डॉक्टर हरिवंशराय बच्चन।'
-'रुको।' अब्बास चिल्लाए। 'इस कॉन्ट्रैक्ट पर तब तक दस्तख्त नहीं हो सकते, जब तक मुझे तुम्हारे पिता की इजाजत नहीं मिल जाती। वो मेरे जानने वाले हैं और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड कमिटी में मेरे साथी हैं। तुम्हें दो दिनों तक और इंतजार करना होगा।'
इस तरह ख्वाजा अहमद अब्बास ने कॉन्ट्रैक्ट की जगह डॉक्टर बच्चन के लिए एक टेलिग्राम डिक्टेट किया और पूछा, 'क्या आप अपने बेटे को अभिनेता बनाने के लिए राजी हैं?'
दो दिन बाद डॉक्टर हरिवंशराय बच्चन का जवाब आया, 'मुझे कोई आपत्ति नहीं। आप आगे बढ सकते हैं।'