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'अमिताभ का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि उनकी दोस्ती बहुत दिनों तक नहीं चलती'

Fri, 11 Oct 2019 05:07 PM IST
Avinash Pal एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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अमिताभ बच्चन - फोटो : सोशल मीडिया
जब अमिताभ बच्चन फिल्मों में आए तो बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान था, बीटल्स में फूट नहीं पडी थी, हॉकी अभी भी भारत का सबसे लोकप्रिय खेल था, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में अभी तक विभाजन नहीं हुआ था, राजधानी एक्सप्रेस को चलते अभी एक साल भी नहीं बीता था और इंसान ने अभी अभी चांद पर कदम रखा था। उन दिनों ख्वाजा अहमद अब्बास फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' के लिए अभिनेताओं की तलाश में थे। एक दिन ख्वाजा अहमद अब्बास के सामने कोई एक लंबे युवा व्यक्ति की तस्वीर ले कर आया। अब्बास ने कहा, 'मुझे इससे मिलवाइए'। तीसरे दिन शाम के ठीक छह बजे एक शख्स उनके कमरे में दाखिल हुआ। वो कुछ ज्यादा ही लंबा लग रहा था, क्योंकि उसने चूडीदार पायजामा और नेहरू जैकेट पहनी हुई थी। 

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पिता हरिवंश राय बच्चन के साथ अमिताभ - फोटो : सोशल मीडिया
ख्वाजा अहमद अब्बास ने इस बातचीत का पूरा विवरण अपनी आत्मकथा, 'आई एम नॉट एन आईलैंड' में लिखा है-
-'बैठिए। आपका नाम?'
'अमिताभ'(बच्चन नहीं)

-'पढाई?'
'दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए'

- 'आपने पहले कभी फिल्मों में काम किया है?'
'अभी तक किसी ने मुझे अपनी फिल्म में नहीं लिया।'

- 'क्या वजह हो सकती है ?'
'उन सबने कहा कि मैं उनकी हीरोइनों के लिए कुछ ज्यादा ही लंबा हूँ।'

-'हमारे साथ ये दिक्कत नहीं है, क्योंकि हमारी फिल्म में कोई हीरोइन है ही नहीं। और अगर होती भी, तब भी मैं तुम्हें अपनी फिल्म में ले लेता।'
'क्या मुझे आप अपनी फिल्म में ले रहे हैं? और वो भी बिना किसी टेस्ट के?'

-'वो कई चीजों पर निर्भर करता है। पहले मैं तुम्हें कहानी सुनाऊंगा। फिर तुम्हारा रोल बताऊंगा। अगर तुम्हें ये पसंद आएगा, तब मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैं तुम्हें कितने पैसे दे सकूंगा।'

इसके बाद अब्बास ने कहा कि पूरी फिल्म के लिए उसे सिर्फ पांच हजार रुपए मिलेंगे। वो थोडा झिझका, इसलिए अब्बास ने उससे पूछा, 'क्या तुम इससे ज्यादा कमा रहे हो?'
अमिताभ ने जवाब दिया, 'जी हाँ। मुझे कलकत्ता की एक फर्म में सोलह सौ रुपए मिल रहे थे। मैं वहाँ से इस्तीफा दे कर यहाँ आया हूँ।'

-अब्बास आश्चर्यचकित रह गए और बोले, 'तुम कहना चाह रहे हो कि इस फिल्म को पाने की उम्मीद में तुम अपनी सोलह सौ रुपए महीने की नौकरी छोड कर यहाँ आए हो? अगर मैं तुम्हें ये रोल ना दूं तो?'
अमिताभ ने कहा, 'जीवन में इस तरह के 'चांस' तो लेने ही पडते हैं।'

-अब्बास ने वो रोल उसको दे दिया और अपने सचिव अब्दुल रहमान को बुला कर कॉन्ट्रैक्ट 'डिक्टेट' करने लगे। उन्होंने उस शख्स से इस बार उसका पूरा नाम और पता पूछा।
'अमिताभ।'
-उसने कुछ रुक कर कहा, 'अमिताभ बच्चन, पुत्र डॉक्टर हरिवंशराय बच्चन।'
-'रुको।' अब्बास चिल्लाए। 'इस कॉन्ट्रैक्ट पर तब तक दस्तख्त नहीं हो सकते, जब तक मुझे तुम्हारे पिता की इजाजत नहीं मिल जाती। वो मेरे जानने वाले हैं और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड कमिटी में मेरे साथी हैं। तुम्हें दो दिनों तक और इंतजार करना होगा।'

इस तरह ख्वाजा अहमद अब्बास ने कॉन्ट्रैक्ट की जगह डॉक्टर बच्चन के लिए एक टेलिग्राम डिक्टेट किया और पूछा, 'क्या आप अपने बेटे को अभिनेता बनाने के लिए राजी हैं?'
दो दिन बाद डॉक्टर हरिवंशराय बच्चन का जवाब आया, 'मुझे कोई आपत्ति नहीं। आप आगे बढ सकते हैं।'
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फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' - फोटो : सोशल मीडिया
आनंद में अभिनय से मिली पहचान
सात हिंदुस्तानी कुछ खास चली नहीं। उसके बाद ऋषिकेश मुखर्जी ने उन्हें अपनी फिल्म 'आनंद' में एक रोल दिया। इस फिल्म में पहली बार पूरे भारत की नजर अमिताभ के अभिनय पर गई और उन्हें 1972 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। कुछ साल पहले अनुपमा चोपडा की एक किताब आई थी '100 फिल्म्स टू सी बिफोर यू डाई'। इस किताब में 'आनंद' फिल्म को भी जगह मिली थी। इस फिल्म के क्लाइमेक्स में राजेश खन्ना मर जाते हैं और अमिताभ बच्चन उन्हें झिंझोड रहे हैं।

राजेश खन्ना की जीवनी 'अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज फर्स्ट सुपर स्टार' लिखने वाले यासेर उस्मान बताते हैं, 'उस सीन की शूटिंग से पहले अमिताभ बच्चन परेशान थे कि वो इसे कैसे शूट करेंगे। उन्हें अभी अभिनय का इतना अनुभव नहीं था। राजेश खन्ना 'हिस्ट्रियोनिक्स' के बादशाह थे। वो अपने दोस्त महमूद के पास गए। महमूद ने बस एक लाइन कही तुम बस ये सोचो कि राजेश खन्ना वाकई मर गए हैं। इसके अलावा कुछ सोचने की जरूरत नहीं है। वो सीन अपने-आप हो जाएगा।' इसके बाद अमिताभ ने वो डायलॉग बोला था, 'आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं' और इसने अमिताभ को अचानक ही भारत के पहली पंक्ति के अभिनेताओं में शामिल कर दिया था।

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Zanjeer film - फोटो : twitter
16 फिल्मों के बाद पहली हिट
व्यवसायिक सफलता के लिए अमिताभ को 16 और फिल्मों का इंतजार करना पडा। ये सफलता उन्हें जा कर 'जंजीर' फिल्म में मिली। उन्होंने उस जमान में वो फिल्म की जब रोमांटिक फिल्मों का बोलबाला था। हाल में अमिताभ बच्चन की जीवनी 'अमिताभ बच्चन अ केलेडोस्कोप' लिखने वाले प्रदीप चंद्रा बताते हैं, 'अगर आपको 16 फिल्मों तक काम मिलता रहा, इसका मतलब कि आपने अपनी जगह 'ऑलरेडी' बना ली थी। अगर न बनाई होती तो तीन फिल्मों के बाद आपको कोई नहीं पूछता। कभी-कभी क्या होता है कि समय भी आपका साथ देता है। 'जंजीर' को देवानंद ने इस बात पर 'रिजेक्ट' कर दिया था कि उसमें कोई रोमांटिक 'एंगिल' या गाना नहीं था। उसे राज कुमार और यहाँ तक धर्मेंद्र ने भी 'रिजेक्ट' कर दिया था। सिर्फ बच्चन की ही समझ में आया कि वो इस फिल्म के जरिए बाजी पलट देंगे और वो सही साबित हुए।'
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bollywood flashback amitabh bachchan mehmood bombay to goa
महमूद का राजीव गांधी को 5000 रुपए का साइनिंग अमाउंट
जब अमिताभ फिल्मों में जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे तो कॉमेडियन महमूद ने उन्हें अपनी छत्रछाया में ले लिया। महमूद की जीवनी लिखने वाले हनीफ जवेरी ने अपनी किताब 'महमूद अ मैन ऑफ मैनी मूड' में एक दिलचस्प घटना का जिक्र किया। 'बॉम्बे टू गोवा की रिलीज से पहले अमिताभ एक बहुत ही स्मार्ट शख्स को अपने साथ मुंबई लाए। महमूद 'काम्पोज' की गोली खाने के बाद थोडे नशे में थे। उनके भाई अनवर ने उस शख्स का परिचय महमूद से करवाने की कोशिश की लेकिन नशे में होने के कारण महमूद की समझ में कुछ नहीं आया। उन्होंने अपनी जेब से 5000 रुपए निकाले और अमिताभ के साथ गए उस शख्स के हाथ में रख दिए। जब उनसे रुपए देने का कारण पूछा गया तो महमूद ने कहा कि ये शख्स अमिताभ से ज्यादा स्मार्ट दिखता है और एक इंटरनेशनल स्टार बन सकता है। ये पैसे उसे उनकी अगली फिल्म में लेने का साइनिंग अमाउंट है।'

जवेरी आगे लिखते हैं, 'अनवर को उस शख्स का महमूद से दोबारा परिचय करवाना पडा, यह कह कर कि वो इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गाँधी हैं। ये सुनते ही महमूद ने राजीव गाँधी को दिए वो पैसे वापिस ले लिए और अमिताभ और राजीव ने जोर का ठहाका लगाया। बाद में अमिताभ बच्चन ने मशहूर पत्रकार राशिद किदवई से बात करते हुए स्वीकार किया कि महमूद की भविष्यवाणी सही निकली। राजीव सही में इंटरनेशनल स्टार बने, लेकिन राजनीति में, अभिनय में नहीं।'

जब महमूद ने दी अमिताभ को अपनी आधी आस्तीन की स्वेटर
बाद में 'फिल्मफेयर' पत्रिका में फरहाना फारूक को दिए एक इंटरव्यू में अमिताभ ने महमूद को याद करते हुए कहा था, ''उस समय जब मुझे हर जगह नकारा जा रहा था तो महमूद ही वाहिद शख्स थे जो हमेश मेरे लिए बड़े सपने देखते थे। वो मुझे हमेशा डेंजर डायबोलिक कह कर पुकारते थे। उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया कि इसका मतलब क्या था। एक बार महमूद ने राज कपूर के साथ काम करने के बाद उनसे फरमाइश की कि वो उन्हें अपनी कोई निजी इस्तेमाल की चीज दे दें। राज कपूर ने उन्हें हरे रंग का अपना आधी आस्तीन का स्वेटर दे दिया। वो महमूद के लिए उनकी सबसे प्रिय चीज हो गई। एक बार एक फिल्म में मेरे अभिनय से खुश होकर वो मेरे घर आए और राज कपूर का दिया वो स्वेटर मुझे भेंट कर दिया। वो स्वेटर आज भी मेरे पास है।'
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Sonia Gandhi And Amitabh - फोटो : Social Media
अमिताभ ने सोनिया को कराया दिल्ली दर्शन
जब 13 जनवरी, 1968 को सोनिया गाँधी। राजीव गाँधी से विवाह करने दिल्ली आईं तो इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने घर या होटल में न ठहरा कर हरिवंशराय बच्चन के घर ठहराया।

सोनिया की जीवनी लिखने वाले राशिद किदवई बताते हैं, ''इंदिरा गाँधी को भारतीय संस्कृति का बहुत ख्याल था। जब सोनिया गाँधी यहाँ आईं तो उनके पिता उनके साथ नहीं आए, क्योंकि वो उस रिश्ते से खुश नहीं थे। शादी से पहले लडकी का लडके के घर में रहना मुनासिब नहीं समझा जाता, इसलिए उन्होंने उन्हें अपने पुराने मित्र हरिवंशराय बच्चन के यहाँ ठहरवाया।''

बाद में इस पूरे प्रकरण का जिक्र करते हुए अमिताभ बच्चन ने एक इंटरव्यू में कहा, ''जैसे ही हमें इस बारे में पता चला डैड ने सारे घर की रंगाई पुताई कराई। एक अतिरिक्त गीजर मंगवाया गया। सोनिया की फ्लाइट सुबह साढे तीन बजे आने वाली थी। राजीव ने मुझसे कहा कि तुम रात में मेरे घर ही आ कर सो जाना।''

''हम लोग काफी पहले आधी रात को ही हवाई अड्डे पहुंच गए। भोर फूटने से पहले ही सोनिया का विमान नीचे उतरा। राजीव बोले, घर चलने से पहले चलो उन्हें दिल्ली घुमाते हैं और हम लोग तीन चार घंटों तक दिल्ली की सडकों पर गाडी घुमाते रहे और करीब 9 बजे घर पहुंचे। बाद में पता चला कि राजीव ने ऐसा इसलिए किया था कि घर पर माँ और डैड को जल्दी उठने का कष्ट न दिया जाए। वहीं 13 विलिंग्टन क्रेसेंट के हमारे घर में ही राजीव और सोनिया की मेंहदी की रस्म हुई। ऊपर से नीचे तक फूलों के गहनों से सजी, घाघरा पहने सोनिया बहुत सुंदर लग रही थीं। फिर फरवरी में एक सादे समारोह में एक सफदरजंग रोड पर सोनिया और राजीव की शादी हुई और सोनिया हमारे घर से ही विदा हो कर गईं।''
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amitabh bachchan, jaya bachchan - फोटो : social media
अमिताभ और जया की शादी
चार साल बाद तीन जून, 1973 को अमिताभ बच्चन और जया भादुडी की भी शादी मुंबई में हुई। एक ओर अमिताभ को फिल्मों में पहले पहले लाने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास बैठे थे, दूसरी तरफ गुलाबी पगडी पहने मशहूर साहित्यकार भगवती चरण वर्मा और नरेंद्र शर्मा बैठे हुए थे।

उस शादी में मौजूद धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती की पत्नी पुष्पा भारती याद करती हैं, ''सच पूछिए तो साफा सबसे ज्यादा सज रहा था दाढी बढाए इंदिरा गाँधी के छोटे बेटे संजय गाँधी के सफेद खादी के कुर्ते पायजामे पर। अमिताभ जरीदार काम की रुपहली शेरवानी और सफेद सिल्क का पायजामा पहने, लाल पगडी बाँधे सेहरा बंधाने आए।''

'जया के पिता मशहूर पत्रकार तरुण कुमार भादुडी ने वर पक्ष का स्वागत किया। जया के फिल्म इंस्टिट्यूट के साथी और मशहूर हास्य कलाकार असरानी फूल मालाएं ले कर हम बारातियों का स्वागत कर रहे थे। उसी दौरान मौसम की पहली बारिश हुई। किसी ने हंस कर कहा लगता है जया ने बचपन में कभी कढाई की खुरचन चाटी है, तभी तो ब्याह में पानी बरस रहा है।' शादी के अगले ही दिन अमिताभ और जया अपने हनीमून के लिए लंदन रवाना हो गए थे।'

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amitabh bachchan, jaya bachchan - फोटो : social media
इलाहाबाद का चुनाव
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव के ही अनुरोध पर बच्चन ने राजनीति में प्रवेश किया और इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लडने का फैसला किया। उनका मुकाबला था उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा से। उस चुनाव को कवर करने वाली वरिष्ठ पत्रकार कुमकुम चड्ढा बताती हैं, ''उस चुनाव में बच्चन अपना रोल नहीं बदल पाए। वो आखिर तक यही समझते रहे कि वो फिल्म स्टार हैं। उन्होंने सर्किट हाउस में बंद कमरे से चुनाव लडा। उनके चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई अजिताभ के हाथों में थी। उनका रोल होता था लोगों को भगाना।''

कुमकुम कहती हैं, ''सर्किट हाउस का गेट बंद रहता था। अमिताभ के कमरे का दरवाजा भी बंद रहता था। अजिताभ हर सुबह आ कर ड्राइव वे पर जमा हुए पत्रकारों और लोगों को भगाने का काम करते थे। इसके विपरीत जब आप बहुगुणा के घर जाएं तो आपको हाथों-हाथ लिया जाता था। चुनाव प्रचार में हर जगह अमिताभ रटे-रटाए पाँच या छह वाक्य बोलते थे।''
''उनको चुनाव की बारीकियों और गहमागहमी की बिल्कुल भी समझ नहीं थी। शुरू में वो शर्तिया चुनाव हार रहे थे। उनके पक्ष में हवा तब बदली जब जया चुनाव प्रचार में कूदीं। उन्होंने 'भाभी', 'देवर' और 'मुंहदिखाई' वाले जुमले बोल कर फिजा अमिताभ के पक्ष में कर दी। मेरा तब भी मानना था और अब भी मानना है कि अगर जया चुनाव प्रचार में नहीं कूदीं होती तो अमिताभ के लिए चुनाव जीतना तेढी खीर होता।'

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अमिताभ
राजीव से मनमुटाव
लेकिन अमिताभ और राजीव की ये दोस्ती बहुत दिनों तक नहीं चल पाई और 1987 में अमिताभ ने इलाहाबाद की अपनी लोकसभा सीट से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। मैंने कुमकुम चड्ढा से पूछा कि अमिताभ के इस फैसले के पीछे वजह क्या थी?

कुमकुम ने बताया, ''मेरे पास इस बात का कोई सुबूत तो नहीं हैं लेकिन लोगों का कहना है कि अमिताभ को ये बात बुरी लगी जब बोफोर्स घोटाले में नाम आने पर राजीव ने उनसे इस्तीफा देने के लिए कहा। मेरा मानना है कि राजीव निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं थे लेकिन उनके करीबी लोगों के बारे में ये बात नहीं कही जा सकती।''

''वैसे भी अमिताभ का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि उनकी दोस्ती बहुत दिनों तक नहीं चलती। एक जमाने में उनके भाई अजिताभ उनके सबसे करीब थे। लेकिन एक समय आया कि उनसे उनकी बातचीत तक बंद हो गई। सोनिया उनको राखी बाँधती थीं लेकिन उनसे भी उनकी बोलचाल बंद हो गई। अमर सिंह भी उनके खासमखास होते थे। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन्होंने उन्हें मुसीबतों से बाहर निकाला था लेकिन आज उनके बीच दुश्मनी है।'
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Amitabh - फोटो : Amitabh
सेट पर समय से पहले पहुंचने की आदत ने बनाया लोकप्रिय
कहा जाता है कि 70 के दशक के मध्य और पूरे 80 के दशक में अमिताभ की लोकप्रियता अपने चरम पर थी। मई, 1980 में वीर सांघवी ने इंडिया टुडे में लिखा था, ''दिन के किसी समय कम से कम एक लाख लोग सिनेमा के पर्दे पर इस शख्स को गाते, नाचते और लडते हुए देखते हैं। इस चुप्पे स्टार की माँग इस कदर है कि प्रोड्यूसरों को ये बता देने के बावजूद कि उन्हें 1983 से पहले कोई डेट नहीं मिल सकती, वो उनको साइन करने के लिए आतुर हैं। उनके लिए अमिताभ एक स्टार नहीं बल्कि एक उद्योग हैं।''

1979 में फिल्मफेयर ने लिखा था कि अकेले मुंबई में 96 हेयर कटिंग सैलून हैं जिन पर बच्चन की तस्वीर पेंट की गई है। 70 की दहाई पार कर जाने के बावजूद बच्चन अभी भी हिंदी सिनेमा के स्तंभ हैं। जैसे-जैसे वो और परिपक्व हुए हैं, उनके अभिनय में और निखार आया है। ये संयोग नहीं हैं कि उन्हें अभिनय के लिए मिले चार राष्ट्रीय पुरस्कारों में से तीन, साठ साल की उम्र पार करने के बाद आए हैं।

कहा जाता था कि बच्चन की फ्लॉप फिल्में भी दूसरी हिट फिल्मों से अधिक व्यवसाय करती थीं। ये भी कहा जाता था कि उनका पारिश्रमिक उनके सबसे बडे प्रतिद्वंदी से कम से कम दोगुना होता था। 1991 में टाइम्स पत्रिका ने बच्चन के लिए एक वाक्य लिखा था कि 'बॉलीवुड फिल्म उद्योग में एक से ले कर 10 स्थानों पर सिर्फ बच्चन ही काबिज हैं।'

प्रदीप चंद्र बताते हैं, ''बच्चन में एक बडी बात है कि उनका पूरा लुक बहुत शिष्ट है। उनका कपडे पहनने का और बात करने का तरीका और उनकी भाषा दूसरे फिल्म वालों से काफी फर्क है। कुछ दिनों पहले जावेद अख्तर से मेरी बात हो रही थी। उनका सेट पर वक्त से आना और दूसरे कलाकारों के साथ उनके बेहतरीन बर्ताव ने उन्हें बहुत फायदा पहुंचाया।''

''उनके पहले अभिनेता 12 बजे की जगह पर चार बजे आते थे। कोई नशे में आता था तो कोई चमचों की भीड लेकर आता था। अगर 7 बजे की शिफ्ट हो तो अमिताभ अपनी वैन में साढे छह बजे बैठ जाते थे। केतन देसाई ने भी मुझे बताया था कि एक बार जब वो सुबह 7 बजे शिफ्ट पर पहुँचे तो बच्चन अपनी वैन में पहले से ही बैठे हुए थे। हमें ये देख कर बहुत शर्मिंदगी हुई कि सुपर-स्टार हमसे पहले सेट पर पहुंचा हुआ था।'


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