दीवार
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
इसलिए कालजयी फिल्म बनी ‘दीवार’
परवानी बाबी और निरूपा राय के दो किरदार कैसे हिंदी सिनेमा में महिला किरदारों के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुए, इस पर चर्चा करने से पहले थोड़ी सी झलक आपको दे देते हैं, उस दौर के सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तनों की। सिनेमा के छात्रों के लिए ये समझना बहुत जरूरी है कि किसी फिल्म को कालजयी फिल्म का दर्जा मिलने के लिए सबसे जरूरी है उसके कथानक का अपने निर्माण के समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक झलक देना। या कहें कि आने वाले समय में अगर किसी को उस वक्त का समाज, संबंध या संत्रास देखना हो तो संबंधित फिल्म उसके लिए संदर्भ बिंदु का काम कर सके। फिल्म ‘दीवार’ विश्व सिनेमा का भी संदर्भ बिंदु बरास्ते हॉन्गकॉन्ग बनी। दक्षिण की सारी भारतीय भाषाओं में तो इस फिल्म के रीमेक हुए ही, इसे पूर्वी एशिया के देशों ने हाथोंहाथ लपक लिया। एक ही मां के दो बेटों के कानून के दोनों तरफ आ खड़े होने के भारतीय फिल्मों ‘मदर इंडिया’ और ‘गंगा जमना’ के कथानक का जो शहरी विस्तार सलीम जावेद ने फिल्म ‘दीवार’ में दिया, वह इसी के साथ अंतर्राष्ट्रीय हो गया।