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Bioscope S2: सलीम-जावेद को फिल्मों में पूरे हुए 50 साल, इस फिल्म में दोनों को मिला पहला ‘अधिकार’

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अधिकार - फोटो : अमर उजाला
सिनेमा बनाने की सबसे पहली सीढ़ी होती है, एक अदद कहानी। फिर उस पर लिखी जाती है पटकथा यानी जो कुछ परदे पर दिखने वाला है, उसकी एक एक इबारत। और, फिर इसके बाद आते हैं संवाद, इन्हें बोलने वाले सितारे। इन्हें इन दृश्यों व संवादों के हिसाब से नचाने वाले निर्देशक। गाने बनाने वाले गीतकार और संगीतकार। लेकिन, हिंदी सिनेमा में आज भी सबसे निरीह प्राणी अगर कोई है तो वह इसका लेखक ही है। किसी कहानी या कार्यक्रम का मूल विचार सुनते ही उस पर बिना ओरीजनल लेखक से बात किए फिल्म या शो बना देना यहां की फितरत है। ये भी सच है कि इस बेईमानी से काम करने वाले फिल्म निर्माताओं या निर्देशकों का आखिरी समय बहुत बुरा गुजरा लेकिन सूरज जब चढ़ रहा होता है तो इनको हर कोई सलाम कर रहा होता है, बस कभी कभी सलीम-जावेद जैसे लोग भी आ जाते हैं जो सिनेमा अपनी शर्तों पर लिखते हैं। पोस्टरों पर अपने खर्चे पर अपने नाम लिखवा लेते हैं और जताते हैं सिनेमा की हर रील पर अपना ‘अधिकार’। जी हां, सलीम-जावेद के नाम का डंका भले हिंदी सिनेमा में फिल्म ‘जंजीर’ से बजा हो, लेकिन दोनों की साथ लिखी पहली फिल्म ‘अधिकार’ है हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म।
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फिल्म अधिकार का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
जोड़ी जादू और गुल्लू की
बाइस्कोप में आज जिस फिल्म के बारे में हम बात करने जा रहे हैं, उसका सिलसिला हिंदी सिनेमा के दो नौजवानों की पहली बार बनी जोड़ी के किस्से से जुड़ता है। फिल्म है आज ही के दिन यानी 28 अप्रैल को साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म ‘अधिकार’, जिसके सितारे हैं, अशोक कुमार, देब मुखर्जी, नंदा, हेलेन और प्राण। हेलेन से इसी फिल्म के दौरान सलीम खान की पहली मुलाकात हुई। तब सलीम खान को लोग गुल्लू कहकर बुलाते थे। यही उनका प्यार से बुलाए जाने वाला नाम था। और, जावेद अख्तर के बारे में तो आप लोग जानते ही हैं। उनका नाम बचपन में घर वालों ने जादू रखा था। शबाना आजमी अब भी उन्हें प्यार से जादू ही कहकर बुलाती हैं।
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फिल्म अधिकार का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
12 दिन में लिख दी पहली पटकथा
खैर, हम तो बात कर रहे थे साल 1971 में रिलीज हुई अधिकार की। इस फिल्म की पटकथा आर एस वर्मा की लिखी एक छोटी सी कहानी सुनने के बाद इसके लेखकों ने सिर्फ 12 दिन में रच डाली थी। फिल्म में इसके लेखकों का नाम भी नहीं गया लेकिन ये पहली फिल्म है जिसे गुल्लू यानी सलीम खान और जादू यानी जावेद अख्तर ने मिलकर एक साथ लिखा। यानी कि आप कह सकते हैं कि सलीम-जावेद की एक साथ लिखी ये पहली फिल्म रही। फिल्म देखेंगे तो इसमें कहीं आपको सलीम जावेद का नाम नहीं मिलेगा। हिंदी सिनेमा में घोस्ट राइटिंग की परंपरा शुरू से ही चलती रही है, लिखता कोई और है नाम किसी और का होता है। मुंबई के शायर ओबैद आजम आजमी मुशायरों के दौरान दोस्तों से जो कुछ कहते हैं, उस पर यकीन करें तो ये सिलसिला बदस्तूर आज भी जारी है। फिल्म ‘अधिकार’ में जावेद अख्तर और सलीम खान ने घोस्ट राइटिंग से अपना करियर शुरू किया था।

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फिल्म के एक दृश्य में तबस्सुम और ब्रह्मचारी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

बंबई में मुसीबत के दिन
अब आपको बताते हैं वो किस्सा कि आखिर फिल्म ‘अधिकार’ के लिए सलीम और जावेद की जोड़ी बनी कैसे। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि जावेद अख्तर के पिता जां निसार अख्तर भी देश के नामचीन शायर रहे हैं। गुरुदत्त के साथ रहकर सिनेमा सीखने का सपना लिए जावेद अख्तर जब बंबई पहुंचे थे, उन दिनों जां निसार अख्तर का कम्युनिस्ट होना उनकी परेशानी बन चुका था। और, उनके खिलाफ दायर तमाम मामलों की वजह से लगातार पुलिस उनके पीछे लगी रहती थी। जावेद अख्तर कुछ दिन रहे अपने वालिद के यहां लेकिन कहते हैं कि अपनी सौतेली मां से उनकी बनी नहीं और एक दिन वह यूं ही बिना बताए घर से निकल लिए।

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सलीम-जावेद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

गोदाम में बीते संघर्ष के दिन
निर्माता निर्देशक कमाल अमरोही के यहां जावेद अख्तर को बंबई में पहली नौकरी मिली। रहने को कोई जगह थी नहीं तो वह वहीं कमालिस्तान स्टूडियो के गोदाम में सो जाया करते थे। गिनती के तीन जोड़ी कपड़े थे और उन्हीं को अदल बदल कर वह पहना करते। कई बार तो वहीं लॉन्ड्री की दुकान पर भी उन्होंने खड़े खड़े अपने कपड़े बदल लिए। कमाल अमरोही की गोदाम में उन्हें फिल्मफेयर की वो ट्रॉफियां भी पड़ी मिलीं जो मीना कुमारी को उनके बेहतरीन अभिनय के लिए दी गईं थी। गुरबत के दिनों में जावेद को उन ट्रॉफियों से बड़ा हौसला मिलता और वह उन्हें सीने से लगाकर फर्श पर सोया करते। कहते हैं कि इन ट्रॉफियों को हाथ में लेकर जावेद तमाम तरह की तकरीरें भी किया करते थे, जाहिर सी बात है कि ये तकरीरें बाद में कई बार जावेद अख्तर को फिल्मफेयर के मंच पर असली तकरीरें देने के काम आईं।

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सलीम-जावेद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हीरो बन चुके थे सलीम खान
जिन दिनों जावेद अख्तर बंबई की सड़कों पर ठोकरें खाते घूम रहे थे, उन्हीं दिनों इंदौर के एक डीआईजी का बेटा बंबई में ‘दिलीप कुमार की दुकान बंद करा देने’ के सपने लिए स्टूडियो स्टूडियो घूम रहा था। नाम, सलीम खान। इंदौर में दोस्तों के लिए लव लेटर की घोस्ट राइटिंग करने वाले सलीम को ये समझ आने लगा था कि हिंदी सिनेमा में कहानी का रुतबा तो होता है लेकिन इन्हें लिखने वाले रुआबदार नहीं होते। अक्सर जब वो बतौर अभिनेता किसी फिल्म शूटिंग पर होते तो फिल्म के राइटर का कोई असिस्टेंट वही सेट पर बैठे सीन लिख रहा होता। ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ।
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सलीम-जावेद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

सरहदी लुटेरा के सेट पर मुलाकात
सलीम के जावेद से पहली बार मिलने का वाकया हुआ निर्देशक एस एम सागर की फिल्म ‘सरहदी लुटेरा’ के सेट पर। सलीम खान इस फिल्म में सेकंड लीड रोल कर रहे थे और अब तक अपने सीन और अपने डॉयलॉग खुद लिखना उन्हें अच्छा लगने लगा था। इसी फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर या कहें कि क्लैपर बॉय की नौकरी लगी जावेद अख्तर की। एक दिन फिल्म का राइटर लापता हो गया तो फिल्म के निर्देशक ने अपने इस असिस्टेंट को कहा कि सीन वह ही लिख दे। सीन जो लिखा गया तो वह फिल्म के सेकंड हीरो को बहुत पसंद आया। सलीम खान ने सीन लिखने वाले यानी जावेद अख्तर से मुलाकात की और यहां से जो जोड़ी बनी उसे नाम मिला, सलीम-जावेद। जावेद को उन्हीं दिनों धर्मेंद्र और शर्मिला टैगोर की फिल्म ‘यकीन’ में डॉयलॉग लिखने का भी काम मिल गया था और वह अंधेरी से निकलकर बांद्रा आ गए थे। दोनों दोस्त खूब मिलते, गप्पें मारते, साथ में सिनेमा देखते और मस्ती करते लेकिन गुरबत ने अभी दामन छोड़ा नहीं था।

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फिल्म सरहदी का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
पहली कमाई पांच हजार रुपये
और इसी मुसीबत ने दोनों को साथ आने का बेहतरीन मौका दिया। ‘सरहदी लुटेरा’ के निर्देशक एस एम सागर ने ही दोनों से उनके करियर की पहली पटकथा फिल्म ‘अधिकार’के लिए लिखवाई। बिन ब्याही मां वाले एंगल पर बनने वाली तमाम फिल्मों में ये फिल्म भी शुमार रही। इसे लिखने के लिए सलीम-जावेद को उन दिनों मिले थे पांच हजार रुपये। पैसे ही उन दिनों दोनों की पहली जरूरत थी। फिल्म के क्रेडिट्स में दोनों का नाम कहीं नहीं है। लेकिन एस एम सागर के असिस्टेंट सुधीर वाही को दोनों का काम इतना पसंद आया कि उन्होंने दोनों को सिप्पी फिल्म्स के दफ्तर जाकर जी पी सिप्पी से मिलने को कहा। जी पी सिप्पी की अभिनेता शम्मी कपूर के साथ बनाई फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ उन दिनों हिट हो चुकी थी। राजेश खन्ना को लेकर बनाई गई उनकी फिल्म ‘बंधन’ के चर्चे भी खूब थे। और, जी पी सिप्पी के बेटे रमेश सिप्पी को लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की पढ़ाई बीच में छोड़े तब तक सात साल हो चुके थे। यहीं से रमेश सिप्पी और सलीम-जावेद की तिकड़ी बनी और तीनों ने मिलकर हिंदी सिनेमा का अंदाज बदल देने वाली फिल्में बनाईं।
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फिल्म अधिकार का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
चलते चलते...
फिल्म ‘अधिकार’ की कहानी फिल्म में बैरिस्टर शुक्ला बने अशोक कुमार ने ही पहली बार सुनी थी। कहानी उन्हें इतनी पसंद आई कि उन्होंने एस एम सागर से इसका काम शुरू करने को कह दिया। अशोक कुमार ही फिल्म के निर्माता भी बने। कहानी है श्याम, राधा और मीरा की। तीनों के बीच होने वाले प्रेम, तिरस्कार और गलतफहमियों की। और, कहानी का असल टर्निंग प्वाइंट है बिनब्याही मां का एक बच्चा। देब मुखर्जी, नंदा और नाजिमा की मुख्य भूमिकाओं वाली इस फिल्म में प्राण, शम्मी और तबस्सुम ने भी खास किरदार निभाए। फिल्म का एक गाना उन दिनों बहुत हिट हुआ था जिसके बोल हैं, ‘रेखा ओ रेखा, जबसे तुम्हें देखा... ‘


 

(‘बाइस्कोप’ कॉलम में प्रकाशित यह आलेख बौद्धिक संपदा अधिकारों के तहत संरक्षित हैं।)

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