सिनेमा बनाने की सबसे पहली सीढ़ी होती है, एक अदद कहानी। फिर उस पर लिखी जाती है पटकथा यानी जो कुछ परदे पर दिखने वाला है, उसकी एक एक इबारत। और, फिर इसके बाद आते हैं संवाद, इन्हें बोलने वाले सितारे। इन्हें इन दृश्यों व संवादों के हिसाब से नचाने वाले निर्देशक। गाने बनाने वाले गीतकार और संगीतकार। लेकिन, हिंदी सिनेमा में आज भी सबसे निरीह प्राणी अगर कोई है तो वह इसका लेखक ही है। किसी कहानी या कार्यक्रम का मूल विचार सुनते ही उस पर बिना ओरीजनल लेखक से बात किए फिल्म या शो बना देना यहां की फितरत है। ये भी सच है कि इस बेईमानी से काम करने वाले फिल्म निर्माताओं या निर्देशकों का आखिरी समय बहुत बुरा गुजरा लेकिन सूरज जब चढ़ रहा होता है तो इनको हर कोई सलाम कर रहा होता है, बस कभी कभी सलीम-जावेद जैसे लोग भी आ जाते हैं जो सिनेमा अपनी शर्तों पर लिखते हैं। पोस्टरों पर अपने खर्चे पर अपने नाम लिखवा लेते हैं और जताते हैं सिनेमा की हर रील पर अपना ‘अधिकार’। जी हां, सलीम-जावेद के नाम का डंका भले हिंदी सिनेमा में फिल्म ‘जंजीर’ से बजा हो, लेकिन दोनों की साथ लिखी पहली फिल्म ‘अधिकार’ है हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म।