बलराज साहनी
- फोटो : सोशल मीडिया
हिंदी फल्मों को बताया तमाशा
अपने भाषण के दौरान उन्होंने हिंदी फिल्मों को पढ़े लिखे लोगों के लिए तमाशा बताया। उन्होंने कहा कि हमारी कहानियां उन्हें बचकानी, तर्कहीन और असलियत से दूर लगती हैं। वहीं, उन्होंने यह भी कहा कि एक आजाद आदमी के पास कुछ सोचने, फैसले लेने और अपने फैसलों पर अमल करने की हिम्मत होती है,लेकिन गुलाम आदमी ये दिलेरी खो चुका होता है। उनका जेएनयू में दिया गया ये भाषण आज भी याद किया जाता है।