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Balraj Sahni Birth Anniversary: बॉलीवुड से निकला पहला बागी नेता, पढ़िए बलराज साहनी के पॉलिटिकल किस्से

Sun, 01 May 2022 10:01 AM IST
मेघा चौधरी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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बलराज साहनी - फोटो : सोशल मीडिया
बलराज साहनी हिंदी सिनेमा के वह अभिनेता थे, जिनकी गिनती बेहद प्रतिभाशाली और प्रभावशाली अभिनेताओं में होती हैं। वह एक अभिनेता ही नहीं बल्कि बहुत ही जहीन इंसान भी थे। उन्होंने आम आदमी की पीड़ा को कई दफा फिल्मी पर्दे पर दर्शाया है। आज उन्हें न सिर्फ उनकी फिल्मों में निभाए किरदारों के लिए बल्कि उनके द्वारा किए गए सामाजिक सरोकारों के लिए भी याद किया जाता है। 1 मई 1913 में ब्रिटिश इंडिया के रावलपिंडी में जन्मे बलराज साहनी का असली नाम युधिष्ठिर था। आज उनके जन्मदिवस के मौके पर पढ़िए उनके पॉलिटिकल किस्सों के बारे में...
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बलराज साहनी - फोटो : सोशल मीडिया
महात्मा गांधी के साथ किया काम
अपने जीवन में महात्मा गांधी ने बस एक अभिनेता से मुलाकात की थी और वो थे बलराज साहनी। फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बनने से पहले बलराज साहनी 1938 में महात्मा गांधी के साथ सेवाग्राम आश्रम में काम करते थे। इसके बाद वह अपनी पत्नी से साथ 1939 में बीबीसी लंदन हिंदी में काम करने चले गए। वहीं, इससे पहले वह रविंद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में अपनी पत्नी के साथ अध्यापक के तौर पर रहे। वह छह साल बाद भारत वापस आए, तो वहीं से मार्क्सवाद की शुरुआती तालीम हासिल करके आए। 
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बलराज साहनी - फोटो : सोशल मीडिया
कम्युनिस्ट पार्टी में हुए शामिल
लंदन से लौटने के बाद वह कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। इसके बाद वह इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर एसोसियेशन' (इप्टा) में शामिल हो गए। इसके जरिए वह लोगों की मदद करना चाहते थे। हालांकि इप्टा से जुड़े रहने के कारण उनहें को कई कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा और जेल तक गए। 

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जेएनयू में बलराज साहनी - फोटो : सोशल मीडिया
जुलूस का हिस्सा बनने पर हुई जेल
बलराज साहनी फिल्मों में अपने किरदारों को जीवंत बनाने के लिए उन्हें जीते थे। दिलीप कुमार के कहने पर उन्हें फिल्म ‘हलचल’ मिली थी। के. आसिफ की इस फिल्म में उन्हें जेलर का किरदार निभाना था और इसके लिए वह आर्थर जेल पहुंचे और वहां का रहन सहन समझा। एक दिन खबर आई की रेल से कम्युनिस्ट पार्टी का जुलूस निकलने वाला है। ऐसे में वामपंथी विचारधारा के बलराज साहनी अपनी पत्नी के साथ जुलूस में पहुंच गए। लेकिन इस बीच शुरू हुई हिंसा के बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और वह तीन महीने तक जेल में रहे। ऐसे में वह फिल्म की शूटिंग के लिए जेल से आते थे।
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बलराज साहनी - फोटो : सोशल मीडिया
जेएनयू में दिया था भाषण
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में 1976 में पहला दीक्षांत समारोह हुआ था। उस दौरान बलराज साहनी के भाषण ने सरकार को हिला कर रख दिया था। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि अभी हमारी हालात उस पक्षी की तरह है, जो लंबे समय से बाद पिंजरे से तो आजाद हो गया, लेकिन यह नहीं जानता कि इसका करना क्या है। पंख होने के बाद भी वह उसी सीमा तक रहना चाहता है, जो उसके लिए निर्धारित की गई है।
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बलराज साहनी - फोटो : सोशल मीडिया
हिंदी फल्मों को बताया तमाशा
अपने भाषण के दौरान उन्होंने हिंदी फिल्मों को पढ़े लिखे लोगों के लिए तमाशा बताया। उन्होंने कहा कि हमारी कहानियां उन्हें बचकानी, तर्कहीन और असलियत से दूर लगती हैं। वहीं, उन्होंने यह भी कहा कि एक आजाद आदमी के पास कुछ सोचने, फैसले लेने और अपने फैसलों पर अमल करने की हिम्मत होती है,लेकिन गुलाम आदमी ये दिलेरी खो चुका होता है। उनका जेएनयू में दिया गया ये भाषण आज भी याद किया जाता है। 
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बलराज साहनी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सीपीआई को छोड़ने के बाद भी रहे मार्क्सवादी
जब वह जेल में गए तो कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पीसी जोशी की जगह किसी और को लाया गया, जिसके बाद पॉलिसी बदल गई। कहा गया कि अब आंख मुंद कर रूस और चीन का सपोर्ट करो और जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी के खिलाफ बगावत करो, लेकिन बलराज साहनी ने उसका विरोध किया। उनका कहना था कि देश नया बना है तो फिर नेहरू और गांधी का विरोध क्यों? पीसी जोशी के पार्टी से हटने के बाद साहनी ने भी इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वह सीपीआई के मेंबर नहीं बने, लेकिन आखिरी दम तक मार्क्सवादी रहे।
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बलराज साहनी - फोटो : सोशल मीडिया
मार्क्सवादी विचारधारा का करते थे पालन
बलराज साहनी मार्क्सवादी थे और वह इस विचारधारा का इतना पालन करते थे कि अपने अंतिम समय में उन्होंने कहा कि जब मेरी मौत होगी तब कोई पंडित न बुलाया जाए और किसी मंत्र का भी उच्चारण नहीं किया जाए। जब मेरी अंतिम यात्रा निकले तो मेरे शरीर पर लाल रंग का झंडा होना चाहिए।
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