अनुपम शुक्ला
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
रक्षा बंधन पर सरसों के तेल के एक मशहूर ब्रांड के आपकी कंपनी के बनाए विज्ञापन की चर्चा सोशल मीडिया पर अब तक हो रही है, इसकी वजह आप क्या मानते हैं?
फिल्में हमेशा से समाज का दर्पण रही हैं। विज्ञापन फिल्म भी इससे अछूती नहीं है। मेरा ख्याल है कि फिल्मों से ज्यादा दर्शकों पर विज्ञापन फिल्में असर डालती हैं। इनकी पंचलाइन दशकों तक लोगों को याद रहती हैं। अरसे तक वनस्पति घी को लोग डालडा कहकर ही बुलाते रहे। वाशिंग पाउडर खरीदना हो तो लोग निरमा बोलते थे। अब समय बदला है। तकनीक के विकास ने ऐसी फिल्मों को लोगों तक पहुंचाने के माध्यम बढ़ा दिए हैं। ये फिल्में एक संदेश देती हैं। लोग इन्हें आसानी से देख पाते हैं और अच्छा लगे तो अपने दोस्तों से साझा भी करते हैं। रक्षाबंधन फिल्म (प्यार की बर्नी) ने ये दिखाया कि एक पारिवारिक मूल्य को आज के परिवेश में भी कैसे जीवित रखा जा सकता है। इसी भावना को लोगों ने बहुत पसंद किया। इसे हमारे बड़े भाई और कंपनी के क्रिएटिव डायरेक्टर, एड गुरु प्रभाकर शुक्ला ने बहुत ही खूबसूरती से पर्दे पर उतारा।