पिंक में अमिताभ बच्चन
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भला-बुरा, रूढ़िवादी या क्रांतिकारी
'पिंक' मे आदर्शवादी वकील दीपक सहगल की भूमिका में वे तीन स्वातंत्र्यचेता लड़कियों का कवच बन, उनका सहारा बन खड़े हैं। इस पुरुषसत्तात्मक समाज को स्त्री की 'नहीं' का पूरा अर्थ समझाते. हालांकि आज भी सोसायटी को यह बात समझाने के लिए एक पुरुष, वो भी खुद महानायक की उपस्थिति चाहिए, यह तथ्य अखरता है। पर यह बच्चन के किरदार से ज़्यादा हमारे सिनेमा और वृहत्तर समाज पर प्रतिकूल टिप्पणी है। एक बेहतरीन अभिनेता आपको सदा आदर्श भूमिकाएं नहीं देता। वो सिनेमा का नहीं, नैतिक शिक्षा की किताबों का काम है। रामायण की कथा में राम भी होंगे और रावण भी। और आधुनिक रामायणों में तो कई बार रावण भी राम के भेस में आता है, सीता से अग्निपरीक्षा मांगता। अमिताभ बच्चन के पचास साला सिनेमाई सफर में भारतीय समाज के तमाम काले-उजले पक्ष पढ़े जा सकते हैं। इतिहास को घटता देखा जा सकता है। उनकी निभाई भूमिकाओं में हमारे असंतोष हैं, तो हमारी कुंठाएं भी। हमारी मासूमियत है, तो हमारा छल भी। हमारी लापरवाहियाँ हैं, तो हमारी रूढ़ियाँ भी।