फिल्म 'सिर्फ एक बंदा काफी है' का ट्रेलर अगर आपने देखा है तो इसमें ‘आसाराम’ जैसी सूरत और वैसी ही मिलती जुलती आवाज वाले अभिनेता को देखकर जरूर चौंके होंगे। उनके इसी अभिनय ने हमें भी चौंकाया। ये अभिनेता हैं सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ। मशहूर रंगकर्मी और लखनऊ स्थित भारतेंदु नाट्य अकादमी के पूर्व निदेशक सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ को भारत सरकार से संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। आत्मप्रचार से दूर रहने वाले कुलश्रेष्ठ का उनका कहना है कि फिल्म या वेब सीरीज उनका क्षेत्र नहीं है, इसलिए कभी उन्होंने इसके लिए कोशिश नहीं की। सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ से ‘अमर उजाला’ की एक्सक्लूसिव बातचीत।
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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप भारतेंदु नाट्य अकादमी के छात्र रहे और फिर भारतेंदु नाट्य अकादमी के ही निदेशक बने। आपकी यह यात्रा कैसी रही ?
नाटक तो बचपन से ही करते रहे है लेकिन तब नाटकों के बारे में इतना पता नहीं था। इसे बच्चों का खेल समझते थे। जब बड़े हुए तो पता चला कि बड़े लोग ‘नाटक’ नहीं करते हैं। उस समय तो यह भी नहीं पता था कि थियेटर नाम की कोई चीज होती है। साल 1974 से नाटकों के प्रति थोड़ा गंभीर हुआ तो शुरुआती दौर में रंजीत कपूर, भानु भारती, देवेंद्र राजन जैसे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला। जब 1976 में भारतेंदु नाटक अकादमी खुली तो पहले बैच में एडमिशन लिया और निर्देशन में ट्रेनिंग ली। शुरू से ही मेरा ज्यादा फोकस निर्देशन की ही तरफ रहा। कभी कभी बीच में एक्टिंग भी की। साल 2006 में भारतेंदु नाटक अकादमी का निदेशक बनने का मौका मिला तो मैंने एलआईसी की नौकरी छोड़ दी।
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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ
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आपका पूरा जीवन ही रंगमंच के नाम रहा है, ये प्रेरणा कहां से मिली?
हमें तो बचपन में यही लगता था कि नाटकों का आविष्कार हमने ही किया। उससे पहले तो थियेटर कभी देखा ही नहीं था। लखनऊ में जन्माष्टमी मनाई जाती थी तो सभी बच्चे सज-धज के खड़े रहते थे। कोई कृष्ण बनता था तो कोई और। हमें भी सजा दिया जाता था और कृष्ण बनकर उन्हीं बच्चों में खड़े हो जाते थे। एक दिन लगा कि चल फिर कर कुछ किया जाए। हमारे क्लास में नरोत्तम दास की एक कविता 'सीस पगा न झगा तन में, प्रभु जानै को आहि, बसै केहि ग्रामा' पढाई जाती थी। उसे हमने अपने भाई बहन के साथ चल फिर कर किया। यह मेरे लिए एक आविष्कार जैसे था। यहां से नाटकों के प्रति मेरा रुझान हुआ।
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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रंगमंच से जुड़े कलाकारों के लिए फिल्मों के दरवाजे हमेशा ही खुले रहते हैं, लेकिन फिल्मों में आपकी सक्रियता शुरू से ही बहुत कम रही है, इसकी कोई खास वजह ?
मेरा क्षेत्र तो थियेटर ही है, मैंने कभी भी खुद फिल्म या फिर वेब सीरीज के लिए कोशिश नहीं की। हालंकि यह अच्छी चीज है,लेकिन यह मेरा क्षेत्र नहीं है। जब मेरा क्षेत्र फिल्म नहीं, तो उस प्रतिस्पर्धा में क्यों पड़ा जाए? मुझे रंगमंच पर ही खुशी मिलती है। फिल्म अपने आप में एक बहुत अच्छा और सशक्त माध्यम है। लेकिन मुझे लगता है कि थियेटर भी कहीं ज्यादा प्रभावशाली है, भले ही वह कम लोगों तक पहुंचता हो लेकिन दर्शक उससे सीधे तौर पर जुड़ते हैं। थियेटर का अपना एक बहुत बड़ा चैलेंज यह है कि छोटे सी जगह में पूरी दुनिया दिखानी होती है।
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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लेकिन आप इस बात को तो मानते ही होंगे कि रंगमंच से आए कलाकारों के ऊपर फिल्म के निर्देशकों का एक विश्वास होता है?
बिल्कुल। रंगमंच की ट्रेनिंग भावनाओं और व्यक्तित्व को निखारती है। यह ट्रेनिंग थियेटर में बड़ी अद्भुत होती है क्योंकि थियेटर में रिहर्सल बड़ी लंबी चलती है। रिहर्सल के दौरान उस प्रक्रिया से गुजरना कि एक्टिंग करते समय कैसे उसे पूरे शरीर में महसूस करना है, दैहिक क्रिया, आवाज और भाव से उस चरित्र को कैसे अपने अंदर लेकर आएं। फिल्म की शूटिंग में माइक्रोफोन दर्शकों का कान है और कैमरा दर्शकों की आंख। मेरा फोकस थियेटर में ही ज्यादा रहा। अब तक मैं इंग्लैंड, जर्मनी, नार्वे, सूडान, अमेरिका, और पाकिस्तान जैसे कई देशों में नाटक कर चुका हूं।
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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ
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आपने करीब सौ नाटकों का निर्देशन किया है, पाकिस्तान में नाटक करने का कैसा अनुभव रहा?
पाकिस्तान हम दो बार जा चुके हैं। पहली बार जब नाटक करने गए तो, पूरी टीम के मन में एक संकोच था। लेकिन वहां पहुंचने के बाद लगा ही नहीं कि हम किसी दूसरे देश में आए हैं। दोनों बार वहां ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे अपने घर के लोग आ गए। हमारे यहां परंपरा है कि नाटक शुरू करने से पहले पूजा करते हैं। वहां एक लड़का मिठाई लेने गया और दुकानदार से बोला कि जल्दी मिठाई दीजिए। हमारा शो शुरू होने वाला है। पूजा के लिए मिठाई ले जानी है। दुकानदार ने कहा 'आप इबादत के लिए जा रहे है, आप हमारे मेहमान हैं।' यह कहकर उसने पैसे नहीं लिए। बहुत लोग ऐसे मिले जिनके अंदर यह जानने की इच्छा थी कि कैसा है हिंदुस्तान।
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ये वो मंजिल तो नहीं
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्मों से किस तरह जुड़ना हुआ?
पहली फिल्म मैंने 1986 में सुधीर मिश्रा की 'ये वो मंजिल तो नहीं' की। सुधीर मिश्रा की भी यह पहली फिल्म थी। उस फिल्म का मैं प्रोडक्शन कंट्रोलर (निर्माण नियंत्रक) था और सुधीर मिश्रा का निर्देशन में सहायक भी बना। इसी तरह रंजीत कपूर के टीवी सीरियल 'अमीर खुसरो' में भी मैंने काम किया। उसमें मैंने लेखन भी किया और रंजीत कपूर का निर्देशन सहायक भी बना। अभिनय भी किया। मेरा भांजा अमित कुमार मुंबई में फिल्म निर्देशक है,। उसने जब 'मानसून शूटआउट' और शार्ट फिल्म 'बाईपास' बनाई तो उसमें काम किया।
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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ
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फिल्म 'सिर्फ एक बंदा काफी है' से कैसे जुड़ना हुआ, इस फिल्म के लिए आपको किसने अप्रोच किया?
कास्टिंग डायरेक्टर शिवम गुप्ता ने इसके लिए मुझसे संपर्क किया। मैंने कह दिया था कि ऑडिशन हम नहीं देते हैं। उन्होंने कहा कि आपको ऑडिशन की जरूरत नहीं है, आपके बारे में हमें सब मालूम है। शायद वह पहले से ही मन बना चुके थे कि इस रोल के लिए मुझे ही लेना है। फिर मुझे लुक टेस्ट (किरदार जैसी वेशभूषा में कलाकार को देखना) के लिए मुंबई बुलाया गया और यह फिल्म फाइनल हो गई।
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सिर्फ एक बंदा काफी है
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फिल्म 'सिर्फ एक बंदा काफी है' के ट्रेलर में आप हूबहू आसाराम ही लग रहे हैं, संवाद भी आप उसकी तरह ही बोलते दिख रहे हैं, इसके लिए आपको किस तरह की तैयारी करनी पड़ी?
मुझे लगता है कि जब एक किरदार का मनोविज्ञान हम पकड़ते हैं तो संवाद बोलने का अंदाज ही बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस चरित्र को निभाने के लिए मैने आसाराम बापू का भी अध्ययन किया था। उसके साथ- साथ आचार्य रजनीश, जग्गी वासुदेव को भी सुना। इन सबकी आवाजों को सुनकर मैंने ये कोशिश की संवाद बोलने का अंदाज ऐसा हो जैसे ये लोग अपने भक्तों और दर्शकों को अपने बोलने के अंदाज से चमत्कृत करते हैं। मैने हूबहू वैसी आवाज नहीं बल्कि अपनी एक अलग आवाज इस फिल्म में रची है।
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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ अपनी पत्नी के साथ
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फिल्म में मनोज बाजपेयी भी एक खास किरदार निभा रहे हैं, इस फिल्म की शूटिंग से पहले भी आपकी की उनसे मुलाकात हुई कभी?
इस फिल्म की शूटिंग से बहुत पहले मनोज बाजपेयी से शायद 1990 के आसपास मुलाकात हुई थी। उस समय वह एक नाटक 'उलझन' करने लखनऊ आए थे जिसे अवतार साहनी ने निर्देशित किया था। उस वक्त मनोज बाजपेयी ने एक कलाकार के तौर पर मुझे काफी प्रभावित किया। उस वक्त ही मुझे लग गया था कि यह तो बड़ा कलाकार है। अभी जब फिल्म की शूटिंग के दौरान मनोज बाजपेयी से उस नाटक के बारे में चर्चा हुई तो वह काफी उत्साहित दिखे। और, तब उन्हे याद आया कि उस समय हमारी मुलाकात हुई थी। वैसे भी मेरा मुंबई आना जाना तो बहुत कम ही होता है।
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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ ग्रुप फोटो अनुपम खेर के साथ
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अनुपम खेर भी भारतेंदु नाटक अकादमी से जुड़े रहे हैं, उनसे तो मुलाकात होती ही होगी?
अनुपम खेर से मेरी मुलाकात लखनऊ में ही एक नाटक के वर्कशाप के दौरान हुई थी। यह 1980 की बात है, जब अनुपम खेर एनएसडी से पास होने के बाद भारतेंदु नाटक अकादमी में एक टीचर के रूप में आए थे। उस दौरान उनके साथ काफी दोस्ती रही। अभी तो काफी समय से उनसे मिलना नहीं हुआ। लेकिन जब भी वह लखनऊ आते हैं तो मुलाकात होती है।
सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ परिवार के साथ
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घर परिवार के बारे में कुछ बताना चाहें?
मेरा जन्म आगरा में हुआ लेकिन पैदा होने के एक साल बाद ही लखनऊ आ गए। पिताजी कामेश्वरनाथ स्वतंत्रता सेनानी थे और सिंचाई विभाग में काम करते थे। उससे पहले उनका मेडिकल में जब चुनाव हुआ तो उन्होंने आयुर्वेद लिया था। लेकिन उन्होंने इसकी प्रैक्टिस नहीं की। स्वतंत्रता आंदोलन की वजह से जेल भी गए। फिर हमारे पैदा होने के काफी बाद सिंचाई विभाग में नौकरी मिली। हम तीन भाई और दो बहने हैं। लखनऊ में तो हम पति -पत्नी ही रहते हैं। बड़ा बेटा तुहिन एक फाइनेंस कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट है और छोटा बेटा नितिन मुंबई में ही एक मार्केटिंग कंपनी में मार्केटिंग हेड है। शुरू से ही मेरे दोनों बच्चों को एक्टिंग का शौक रहा है। दोनों की इच्छा है कि कभी न कभी अपनी फिल्म हम बनाएंगे।