migratory birds
पक्षी विज्ञानी पंकज गुप्ता कहते हैं, ''कई लोग गौरैया को शहरों में ढूंढते हैं, उन्हें गांवों में जाकर देखना चाहिए, वो आज भी वहां मिलती हैं। वो कच्चे घरों में छोटे-छोटे छेद कर घोसले बनाती हैं। खेतों में जाकर खाती हैं, तो शहरों में कैसे मिलेंगी? कुछ देशों में तो गौरैया की इतनी तादाद हो गई है कि उन्हें खाना देने पर बैन लगा दिया गया है।''
असर रहमानी कहते हैं, ''कई पक्षियों के घोसले मोबाइल टावरों के पास होते हैं, वो तो नहीं मरते। कुछ तो टावर पर ही घर बना लेते हैं। कबूतर-कौओं को देखिए, वो तो शहरों में टावरों के बीच खूब फल फूल रहे हैं।'' हालांकि डॉ. रीना देव कहती हैं कि कबूतर शहरी पक्षी हैं, वो हमारे रहन-सहन में ढल चुके हैं इसलिए उन्हें इतनी परेशानी नहीं होती। डॉ. रीना और असद रहमानी दोनों ही ये मानते हैं कि इस विषय पर विस्तृत रिसर्च हो जिससे ठोस जानकारी सामने आए।