संजय मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अच्छा, तो माता पिता के साथ सिनेमा देखना होता था बचपन में?
अरे बाप रे! सिनेमा वो तो ऐसा देखना होता था कि पूछो मत। एक किस्सा सुनाता हूं आपको। हम पटना में थे और फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ रिलीज हुई थी। उन्हीं दिनों बुआ की शादी होने वाली थी, तो बुआ ने मम्मी से कहा, ‘भाभी, ससुराल में पता नहीं फिर कब फिल्म देखने को मिले, ये पिक्चर दिखा लाओ हमको।’ मम्मी ने दादी से बहाना बनाया कि हम अपने मायके जा रहे हैं और रिक्शे पर मुझे, मेरे भाई औऱ बुआ को लेकर चल पड़ीं सिनेमा देखने। सिनेमाहॉल पहुंचे तो पता चला कि ये तो बच्चों के देखने के लिए है ही नहीं। हम दोनों भाई छह, सात साल के थे। इसके बाद मम्मी ने अपनी और बुआ की डेढ़ डेढ़ रुपये की टिकट खरीदी और दो रुपये रिक्शे वाले को दिए कि जब तक फिल्म खत्म न हो, इन दोनों बच्चों को शहर में घुमाते रहो। तो फिल्म देखना तो हमारे यहां उत्सव जैसा होता रहा है, ऐसा लगता था जैसे मंदिर जा रहे हैं। दो ही तो चीजें हैं इस देश में जो बाकी सबसे ध्यान बटाए रहती हैं, क्रिकेट और सिनेमा।