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Sanjay Mishra EXCLUSIVE: ‘सात साल की उम्र में पहुंच गए मेरा नाम जोकर देखने, मां व बुआ सिनेमाघर में और मैं...’

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संजय मिश्रा, मेरा नाम जोकर पोस्टर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
संजय मिश्रा, एक ऐसा नाम है जिन्हें देखकर ही दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान आ जाती है। लेकिन, वह अपने प्रशंसकों को चौंकाते भी रहते हैं। फिल्म ‘वध’ में संजय ने ऐसा ही कुछ किया है और फिर इसी महीने वह अपने चिर परिचित अंदाज में दिखेंगे फिल्म ‘सर्कस’ में। संजय मिश्रा ने सिनेमा के सबक बचपन में अपने परिवार के साथ सीखे, नाटकों से उन्होंने अभिनय की बारीकियां समझीं और मुंबई आकर उन्होंने इस दुनिया को समझा। संजय मिश्रा हिंदी सिनेमा के उन गिनती के कलाकारों में हैं, जिनके लिए लेखक और निर्देशक खास तरह का सिनेमा अब भी रचने का जतन करते हैं। ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने संजय मिश्रा से खास बातचीत की।
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संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘वध’ में आपने जो किरदार किया है, उसके बारे में सोचा नहीं जा सकता कि संजय मिश्रा को ऐसे चरित्र में भी देखा जा सकता है? इस पर आपकी क्या टिप्पणी है?

एक कलाकार के तौर पर जब मेरे पास कोई लेखक या निर्देशक ‘वध’ जैसी फिल्म लेकर आता है तो अच्छा लगता है। एक कलाकार का हौसला भी बढ़ जाता है कि कम से कम मेरे बारे में ऐसा कुछ सोचा तो जा रहा है। ये एक बहुत सुकून वाली बात है। मुझे अपने अंदर से महसूस होता है कि हां, मैं सही दिशा में जा रहा हूं। एक ही तरह के रोल करना मुझे भी अच्छा नहीं लगता। दिसंबर के महीने में मेरी दो फिल्में हैं, ‘वध’ और ‘सर्कस’ और दोनों बिल्कुल अलग अलग श्रेणियों की फिल्में हैं।

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संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, नया करने की ललक आप में शुरू से रही है। आपके पिता सरकारी नौकरी में थे, तो कभी दबाव नहीं रहा घर में सरकारी नौकरी करने का?

मैं पहले ‘वध’ की बात बताता हूं। इस फिल्म में मेरा नाम शम्भू नाथ मिश्रा है और ये किरदार करना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है क्योंकि ये मेरे पिता का नाम है तो ये फिल्म उनको ही समर्पित है। पिताजी की नौकरी में तबादले होते रहने का हमें बहुत फायदा हुआ। उनके सथ हम इधर उधर घूमते रहते थे। कभी मुझे भोपाल की संस्कृति समझने का मौका मिलता था तो कभी बनारस देखा। पटना आए तो यहां के बारे में बहुत कुछ जानने को मौका मिला। मेरे भीतर के अभिनेता को विकसित करने में इन शहरों का बहुत योगदान रहा। अलग अलग शहरों को घूमते समय हमें भी अपनी आखें खुली रखनी होती हैं कि ये शहर हमसे क्या कहना चाह रहा है। सरकारी नौकरी थी पिताजी की तो बहुत पैसा तो नहीं था लेकिन बस यही था जो करना है कर लो इसी में, सिनेमा भी देखने जाना है, परिवार को भी इसी में पालना है।

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संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अच्छा, तो माता पिता के साथ सिनेमा देखना होता था बचपन में?

अरे बाप रे! सिनेमा वो तो ऐसा देखना होता था कि पूछो मत। एक किस्सा सुनाता हूं आपको। हम पटना में थे और फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ रिलीज हुई थी। उन्हीं दिनों बुआ की शादी होने वाली थी, तो बुआ ने मम्मी से कहा, ‘भाभी, ससुराल में पता नहीं फिर कब फिल्म देखने को मिले, ये पिक्चर दिखा लाओ हमको।’ मम्मी ने दादी से बहाना बनाया कि हम अपने मायके जा रहे हैं और रिक्शे पर मुझे, मेरे भाई औऱ बुआ को लेकर चल पड़ीं सिनेमा देखने। सिनेमाहॉल पहुंचे तो पता चला कि ये तो बच्चों के देखने के लिए है ही नहीं। हम दोनों भाई छह, सात साल के थे। इसके बाद मम्मी ने अपनी और बुआ की डेढ़ डेढ़ रुपये की टिकट खरीदी और दो रुपये रिक्शे वाले को दिए कि जब तक फिल्म खत्म न हो, इन दोनों बच्चों को शहर में घुमाते रहो। तो फिल्म देखना तो हमारे यहां उत्सव जैसा होता रहा है, ऐसा लगता था जैसे मंदिर जा रहे हैं। दो ही तो चीजें हैं इस देश में जो बाकी सबसे ध्यान बटाए रहती हैं, क्रिकेट और सिनेमा।
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संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मतलब शहरों की गलियों का मजा आप बचपन से लेते रहे हैं और सिनेमा का भी असली आनंद तभी आता है जब कहानी जिस माहौल की है, वह माहौल परदे पर ठीक से रचा जा सके..

हां, जैसे ‘वध’ की बात करें तो करने को तो हमने इसे बनारस में ही शूट कर लिया होता लेकिन ग्वालियर की जो हमारी लोकेशन है, वहां तक कोई गाड़ी नहीं जाती थी। कोई आधा किलोमीटर पैदल चलकर लोकेशन पर पहुंचने में ही गलियां सब कुछ बता देती थीं। अब ये गलियां कुछ बोलती तो नहीं लेकिन वहां की बोली, वहां का माहौल, ऐसे ही आने जाने से समझ आता है। जैसे कभी हमने नीना गुप्ता जी से कह दिया कि चलिए गोल गप्पे खाकर आते हैं। तो शहर ऐसे ही सिनेमा में आता है, फिल्म ‘मसान’ को ही ले लीजिए, हम लोगों से ज्यादा अभिनय तो उसमें शहर ने किया है।
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संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बिल्कुल और किसी फिल्म की कहानी को कहने में वातावरण की इसीलिए सबसे बडी भूमिका होती है..

क्या है कि इससे परदे पर एक अलग एहसास आ जाता है। स्टूडियो में शूटिंग करने से वह रस आता नहीं है। अभी आप देश के किसी हवाईअड्डे पर चले जाइए। सब एक जैसे होते जा रहे हैं। पता ही नहीं चलेगा कि आप हैदराबाद में हैं, चंडीगढ़ में हैं, गुवाहाटी में हैं या बनारस में। पहले के रेलवे स्टेशन देखिए, कानपुर, लखनऊ, पटना, भोपाल...पहुंचते ही लगेगा कि आ बेटा, देखो आ गया भोपाल। अब तो जब तक शहर में घुसेंगे नहीं, एयरपोर्ट से पता ही नहीं चलेगा कि किस शहर आ गए हैं। तो माहौल का बहुत असर होता है सिनेमा में। अब अगर मैं चंबल के 45 डिग्री सेल्सियस तापमान मे जाकर शूटिंग ही नहीं करूंगा तो फिर ‘आंखों देखी’ के किरदार का एहसास कैसे जी सकूंगा!
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संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अच्छा, इन शहरों की जिनकी हम बात कर रहे हैं, यहां के युवक युवतियां जब मुंबई आते हैं फिल्मों में काम करने तो उन्हें क्या पता होना बहुत जरूरी है?

मेरा तो बस यही कहना रहता है कि भैया, पहले अपने आपको पहचानो। तुम्हें हीरो बनना है या तुम्हें सिनेमा पसंद है। अगर सिनेमा पसंद है तो यहां किसी भी चीज के लिए काम मिल जाएगा। इतने सारे काम हैं सिनेमा के, किसी में भी आ जाओ। तो पहला प्यार सिनेमा को लेकर होना चाहिए। हीरो ही बनूंगा, ये बहुत संकीर्ण सोच है। पहले सिनेमा में आओ, जो मिले वह करो और जब मौका मिले तब मन का भी करो। लेकिन होता क्या है तमाम सारे लोग यहां हीरो बनने की कामना लेकर आते हैं और नहीं बन पाते हैं तो वापस चले जाते हैं और वहां गांव में बैठकर शुरू कर देते हैं बायकॉट बॉलीवुड! ये सोचने वाली बात है कि ये लोग कभी बिजली विभाग का बायकॉट नहीं करते कि बिजली के दाम बढ़ गए तो इसका बायकॉट और किसी भी चीज का भी कभी आपने बायकॉट नहीं सुना होगा। अरे, भैया कुछ बनना है तो पहले उसके बारे में सीखो तो। ऋतिक रोशन ने भी तो पहले असिस्टेंट बनकर सिनेमा सीखा और तब ही न हीरो बना।
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संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, अभिनय में इतनी वरिष्ठता हासिल करने के बाद भी क्या अब भी किसी नई फिल्म को लेकर कोई घबराहट आपको होती है?

बिल्कुल, जब भी कोई नई फिल्म रिलीज होने को होती है या कभी कोई रिलीज से पहले स्पेशल स्क्रीनिंग होती है तो जी धक धक करने लगता है कि पता नहीं क्या होगा, लोगों का कैसा लगेगा? तो ये जो नर्वस एनर्जी है, ये जीवन में हमेशा बनी रहने चाहिए। नहीं तो अगर अति आत्मविश्वास आया कि अरे ये सब तो मेरे बाएं हाथ का खेल है, तो बस वहीं चौपट हुआ। जब मै फिल्म की शूटिंग करता हूं तो फोन नहीं उठाता हूं। लोगों से दूरी बनाकर रखता हूं तो उसके बाद जब लोगों को कोई किरदार पसंद आता है तो अच्छा लगता है कि चलो कोई साधना की, तो उसका फल मिला।

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