हिंदी सिनेमा को सोशल मीडिया पर जितनी गालियां अपने ही भाषा के दर्शकों की मिलती हैं, उतनी शायद ही किसी दूसरी भाषा के सिनेमा को मिलती होंगी। वंशवाद के आरोपों से घिरी रहने वाली हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इसके बावजूद छोटे छोटे शहरों और गांव-देहात से आए तमाम कलाकार अपनी जगह धीरे धीरे बनाने में लगे हुए हैं। लोग उनके काम को देख रहे हैं। उन्हें उनके नाम से पहचान रहे हैं लेकिन उनके बारे में बातें कम ही कर रहे हैं। हमने ऐसे ही उदीयमान कलाकारों तक पहुंचने के लिए मुंबई में हर महीने ‘अपना अड्डा’ का आयोजन शुरू किया है, इसमें कोई भी उदीयमान कलाकार अपने बारे में बातें कर सकता है और अपनी सफलता की कहानी से दूसरों को प्रेरित कर सकता है। ‘अपना अड्डा’ सीरीज के पहले कलाकार हैं आलोक पांडे, जिनके लिए अमेजन प्राइम वीडियो की सीरीज 'बंबई मेरी जान' टर्निंग प्वाइंट साबित हुई है। इस सीरीज में आलोक ने दाऊद इब्राहिम से प्रेरित किरदार दारा कादरी के मामा का रोल किया है। आलोक पांडे से ‘अमर उजाला’ की एक खास बातचीत... Year Ender 2023: दीपिका पादुकोण फिर बनीं बॉलीवुड की हीरोइन नंबर वन, यहां पढ़िए ‘अमर उजाला’ टॉप 10 लिस्ट
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आलोक पांडे
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपको कब लगा कि अभिनय में ही करियर बनाना है?
मैं उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर जिले के गांव ददऊं का रहने वाला हूं। गांव के प्राथमिक विद्यालय से आठवीं तक पढ़ाई की। फिर देवी प्रसाद इंटर कॉलेज, शाहजहांपुर से हाईस्कूल और इंटर द संजय कुमार सरस्वती इंटर कॉलेज विद्या मंदिर से किया।बचपन से कविताएं और कहानियां सुनाने का शौक था। स्वामी सुखदेवानंद विद्यालय से ग्रेजुएशन के दौरान ही थियेटर की तरफ झुकाव हुआ और फिर संस्कृति थियेटर ग्रुप ज्वाइन कर लिया। पहला नाटक मैने 'अग्नि और बरखा' किया। वहां राजपाल यादव का आना जाना लगा रहता था। उनसे मेरी पहली बार मुलाकात 2009 में हुई।
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आलोक पांडे
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लड़का हीरो बनना चाहता है, सुनकर पिताजी की क्या प्रतिक्रिया रही?
हम चार भाई हैं, सबसे छोटा मैं ही हूं। तीनों भाई अब भी गांव में खेती बाड़ी करते हैं। जब मैं थियेटर कर रहा था तो पिताजी कहा करते थे कि नाटक में क्या रखा है? पढाई पर ध्यान दो, लेकिन कभी उन्होंने कोई काम पर पाबंदी नहीं लगाई। वह कहा करते थे कि कुछ करना है करो, लेकिन एक बात ध्यान में रहे कि तुम्हे अपना भविष्य खुद सोचना है। जब मुंबई आया तो मेरे सभी भाइयो ने बहुत सहयोग किया। पिताजी शिवराम पांडे भी किसान रहे। कभी कभार पैसे भेज दिया करते थे। अभी बीते साल वह हमें छोड़कर गोलोक वासी हो गए।
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आलोक पांडे
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
शाहजहांपुर से बाहर निकलना कब हुआ?
मुंबई आने से पहले मैं पूरी तैयारी करके आना चाह रहा था इसीलिए शाहजहांपुर से ग्रेजुएशन करने के बाद लखनऊ में भारतेंदु नाट्य अकादमी ज्वाइन कर लिया। वहां पर 2009 से लेकर 2011 खूब नाटक किए। वहां नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर और रजा मुराद आते थे, उनकी एक घंटे की स्पेशल क्लास होती थी। थियेटर से मुझे इतना फायदा हुआ कि मुझे बोलना आ गया। पहले मैं बहुत ही शर्मीला था। एक तरह से थियेटर में मेरा नया जन्म हुआ।
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आलोक पांडे
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फिर वहां से मुंबई?
नहीं, अभी तो खुद को परखना था। लखनऊ से लौटकर फिर शाहजहांपुर आया और 15 -20 बच्चों को इकट्ठा करके मैंने एक नाटक 'चयनपुर की दास्तान' किया। अपने कॉन्फिडेंस को परखने के लिए मैंने यह नाटक किया। उस नाटक से मैंने कुछ पैसे भी कमाए। उसी समय कोलकाता में एक नया कोर्स 'एक्टिंग फॉर स्क्रीन' शुरू हुआ था। मेरा सौभाग्य रहा की वहां मेरा दाखिला हो गया और कैमरे के प्रति मेरा जो डर था वह दूर हो गया। वहां से गांव आया और फिर दिवाली मनाकर लखनऊ से 29 दिसंबर 2012 को पुष्पक एक्सप्रेस पकड़कर मुंबई पहुंच गया और नया साल मुंबई में ही मनाया।
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आलोक पांडे
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पहला मौका कैसे मिला?
कुणाल खेमू के पिता रवि खेमू ने भारतेंदु नाट्य अकादमी में एक नाटक किया था। मुंबई आने के बाद उनसे बराबर संपर्क में था। वह डीडी उर्दू के लिए एक शो 'हमारे गांव कोई आएगा' बना रहे थे। एक दिन उनका फोन आया और झे उसमें मुख्य भूमिका दे दी। इस शो में काम करने के मुझे 16 हजार रुपए मिले थे। मुंबई की यह मेरी पहली कमाई थी। इस शो को घरवालों ने देखा बहुत खुश हुए।
फिल्मों में सबसे पहला मौका राजश्री प्रोडक्शन्स की फिल्म 'प्रेम रतन धन पायो' में मिला। भारतेंदु नाट्य अकादमी का ही एक परिचित राजश्री में कास्टिंग डिपार्टमेंट में था। पहली बार जब कॉल आया तो मना कर दिया था। क्योंकि, उन्होंने बताया कि रामलीला में एक सीन है। लेकिन जब मुझे पता चला कि वह सीन सलमान खान के साथ है, तो मैं सलमान खान के साथ काम करने का मौका नहीं गंवाना चाह रहा। 'प्रेम रतन धन पायो' के लिए सबसे मेरा ऑडिशन मंथरा के रोल के लिए हुआ था। यह ऑडिशन जब सूरज बड़जात्या जी ने देखा तो उनको बहुत पसंद आया और दोबारा ऑडिशन के लिए मुझे बुलाया गया। सूरज जी ने एक सिचुएशन दी और बोले कि अपने गांव की भाषा में इंप्रोवाइज करके कुछ बोल दो।
यही कि दो मनचले गांव में रामलीला देख रहे है। मुझे गांव की एक घटना आई, जब पहली बार धर्मेंद्र की फिल्म 'पुलिसवाला गुंडा' देखने गया था और पिताजी ने मेरी खूब पिटाई की थी। वही, मैंने फील किया और ऑडिशन दे दिया। सूरज जी को वह ऑडिशन बहुत पसंद आया और उन्होंने मंथरा के बजाय दो मनचले में से एक मनचले मोंटू का रोल दे दिया। दूसरे मनचले का किरदार बिजेंद्र काला ने निभाया था। कास्टिंग डायरेक्टर विकी सिदाना को जब सूरज जी से मिली तारीफ के बारे में पता चला तो उन्होंने 'एमएस धोनी- द अनटोल्ड लव स्टोरी' में चिट्टू और फरहान अख्तर की फिल्म 'लखनऊ सेंट्रल' में फरहान अख्तर के दोस्त बंटी की भूमिका दी।
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आलोक पांडे
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कब लगा कि एक एक्टर के तौर पर आपकी पहचान बन गई है?
जॉन अब्राहम की फिल्म 'बाटला हाउस' में मैंने तुफैल का किरदार निभाया था। इस किरदार से मुझे अच्छी पहचान मिली। इस किरदार के बारे में जॉन अब्राहम ने कई बार अपने इंटरव्यू के दौरान जिक्र भी किया था। अमेजन प्राइम वीडियो की सीरीज 'बंबई मेरी जान' मेरे करियर का टर्निंग पॉइंट किरदार रहा हैं। इस सीरीज मैंने दाऊद इब्राहिम से प्रेरित किरदार दारा कादरी के मामा रहीम की भूमिका निभाई है। इस किरदार को लोगों ने खूब पसंद किया।
'बंबई मेरी जान' में कैसे मौका मिला और नए साल में कौन सी फिल्म आने वाली है आपकी?
'बंबई मेरी जान' में तो फरहान अख्तर ने मुझे मौका दिया। जब मैंने उनके साथ फिल्म ''लखनऊ सेंट्रल' में काम किया था तो उनको मेरा काम बहुत पसंद आया था। तभी से उनके संपर्क में था। नए साल में लोग मुझे तापसी पन्नू की फिल्म 'हसीन दिलरूबा 2' में देख सकेंगे। इसमें मैंने कांस्टेबल की भूमिका निभाई है। इसके अलावा अपर्णा सेन की फिल्म 'द रेपिस्ट' और अमेजन प्राइम वीडियो पर मेरी एक और सीरीज 'छोटे यादव' आने वाली है। Nayanthara: नयनतारा-विग्नेश ने बच्चों संग मनाया क्रिसमस, खूबसूरत तस्वीरें साझा कर दी फैंस को बधाई शुभकामनाएं