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नाले के पाइप में रहकर मुंबई में गुंडई करता था ये एक्टर, 'मोना डार्लिंग' ने बनाया था मशहूर

एंटरटेनमेंट डेस्क अमर उजाला Updated Tue, 22 Oct 2019 02:12 PM IST
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Ajit Khan - फोटो : सोशल मीडिया
जब भी विलेन शब्द दिमाग में आता है तो दिमाग में एक भयानक और डरावनी छवि उभरती है...एक ऐसा चेहरा नजरों के सामने आता है जो हाथों में पिस्तौल थामे लोगों को डरा-धमका रहा है....गले में एक छोटा सा रुमाल बांधा हुआ है और लंबे, फैले हुए बाल हैं, लेकिन बॉलीवुड के मशहूर विलेन रहे एक्टर अजीत की छवि इससे बिल्कुल उलट थी। 27 जनवरी 1922 को जन्मे अजीत खान ने 22 अक्टूबर 1998 में हैदराबाद में अंतिम सांस ली। उनकी आज पुण्यतिथि है।
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Ajit Khan - फोटो : सोशल मीडिया
हिंदी सिनेमा को शायद पहली बार एक ऐसा विलेन मिला था जो काफी सौम्य और प्रभावशाली ढंग से अपने विलेन के किरदार को फिल्मी पर्दे पर जीवित कर देता था। अजीत का असली नाम हामिद अली खान था। वो बचपन से ही एक्टर बनना चाहते थे और इसी का सपना लिए वो घर से भागकर मुंबई आ गए थे।
अजीत पर अपने इस सपने को पूरा करने का जुनून इस कदर सवार था कि उन्होंने अपनी किताबें तक बेच डाली थीं। 1940 में अजीत ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ फिल्मों में बतौर हीरो काम किया लेकिन वो फ्लॉप रहे। जितनी भी फिल्मों में अजीत हीरो के तौर पर नजर आए वो सभी कामयाब नहीं हो पाईं। लगातार फ्लॉप से निराश ना होकर अजीत ने फिल्मों में विलेन के रोल करने शुरू दिए।

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अजीत
विलेन बनकर तो अजीत ने ऐसा स्टारडम पाया जो शायद ही किसी हीरो को मिला हो। विलेन के तौर पर ना सिर्फ उनके किरदारों को सराहा गया बल्कि उनके कई डायलॉग और वन लाइनर जबरदस्त हिट हुए। आज भी जब अजीत के नाम का जिक्र होता है तो अनायास ही 'मोना डार्लिंग', 'लिली डोंट भी सिली' और 'लॉयन' जैसे डॉयलॉग जुबां पर आ जाते हैं। अजीत ने विलेन और उसके किरदार की ऐसी परिभाषा और लुक गढ़ा जो हमेशा के लिए हिंदी सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया है।

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अजीत
लेकिन अजीत का फिल्मी सफर आसान नहीं रहा था। घर से भागकर मुंबई आने पर अजीत ने ऐसे दिन देखे जिनका जिक्र कर उनके बेटे भी इमोशनल हो जाते हैं। मुंबई आने के बाद अजीत का कोई ठोस ठिकाना नहीं था। काफी वक्त तक उन्हें सीमेंट की बनी पाइपों में रहना पड़ा जिन्हें नालों में इस्तेमाल किया जाता है। उन दिनों लोकल एरिया के गुंडे उन पाइपों में रहने वाले लोगों से भी हफ्ता वसूली करते थे और जो भी पैसे देता उसे ही उन पाइपों में रहने की इजाजत मिलती।

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अजीत
एक दिन एक लोकल गुंडे ने अजीत से भी पैसे वसूलने चाहे। अजीत ने मना कर दिया और उस लोकल गुंडे की जमकर धुनाई की। उसके अगले दिन से अजीत खुद लोकल गुंडे बन गए। इसका असर ये हुआ कि उन्हें खाना-पीना मुफ्त में मिलने लगा और रहने का भी बंदोबस्त हो गया। डर की वजह से कोई भी उनसे पैसे नहीं लेता था।

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अजीत
अजीत ने 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। नास्तिक, मुगल ए आजम, नया दौर और मिलन जैसी फिल्मों को अजीत ने अपने से सजाया। 22 अक्टूबर 1998 में अजीत ने हैदराबाद में अंतिम सांस ली। बॉलीवुड में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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