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'अय्यारी' के वो 5 सीन, जिसे कोई भी सिनेप्रेमी पचा नहीं पाएगा

Sat, 17 Feb 2018 07:49 AM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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कई बार रिलीजिंग डेट बदले जाने के बाद आखिरकार 'अय्यारी' शुक्रवार को रिलीज हो ही गई। अपेक्षा के मुताबिक फिल्म फैंस की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। शायद यही कारण रहा कि बॉक्सऑफिस पर पहला दिन भी कोई खुशखबरी लेकर नहीं आया। फिल्म में मनोज बाजपेयी हमेशा की तरह शानदार एक्टिंग करते नजर आए। मगर बावजूद इसके फिल्म में ऐसे कई मौके आए जो किसी आम फैंस के आंखों में भी खटक जाएंगे। देखिए अगली स्लाइड
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नीरज पांडे एक सुलझे हुए निर्देशक रहे हैं और उनकी फिल्मों से हमेशा एक एक्स फैक्टर की उम्मीद की जाती है। अभी तक निर्माता-निर्देशक के तौर पर वह अपने काम को लेकर खरे रहे हैं लेकिन, ‘अय्यारी’ को लेकर वह थोड़े से कंफ्यूज नजर आते हैं।
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शुरुआत में कहानी के कई हिस्सों को इस तरह दिखाया गया कि दर्शकों को कहीं न कहीं लगता है कि फिल्म मजेदार हो सकती है। लेकिन जब 'दो महीने बाद' और 'चार महीने पहले' जैसे फ्लैश स्क्रीन पर नजर आते हैं, तो इसे समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि कहानी कहां से शुरू होकर कहां घूम गई। फ्लैशबैक के अंदर फ्लैशबैक दिखाने वाली इस उलझाऊ कहानी में रोमांच जल्दी खत्म हो जाता है और नीरस च्युइंगम की तरह सिर्फ जुगाली चलती रहती है। 

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फिल्म में भ्रष्टाचार, हथियार के सौदे से लेकर सेना में विधवाओं को मिलने वाले धन का दुरुपयोग जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया गया, लेकिन फिल्म क्या समझाना चाहती है ये समझना थोड़ा मुश्किल था। फिल्म में गाली गलौच से भरे डायलॉग्स हैं। इससे फिल्म को झेलना थोड़ा और मुश्किल हो जाता है।
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नीरज पांडे कोई अय्यारी पैदा नहीं कर पाते, जो जादू से चौंका सके। थ्रिलर का फील देने के बावजूद फिल्म लंबी लगती है। मुख्य घटनाक्रम के बीच सिद्धार्थ-रकुल प्रीत की कहानी जबर्दस्ती ठूंसी है। नाटकीयता गायब है।
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नीरज पांडे की ‘अय्यारी’ का सबसे कमजोर पहलू है स्क्रिप्ट। 2 घंटा और 40 मिनट की इस फिल्म में 2 घंटा 25 मिनट तो फौज में हथियारों की दलाली और उसके अंजाम पर ही लगा दिए गए हैं! इस भ्रष्टाचार का फ़ौज पर और देश की जनता पर क्या असर पड़ेगा, इसे दिखाया गया मगर क्लाइमेक्स में। डायरेक्टर ने क्लाइमेक्स एक बिल्डिंग के करप्शन की बात करके खत्म कर दी है!
 
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