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100 Years of Mukesh: अगर श्रीराम गाते तो मुकेश ही उनकी आवाज होते, जानिए रामायण के किस संगीतकार ने कही ये बात

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मुकेश, तुलसीदास रामायण - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हिंदी सिनेमा की मशहूर गायकत्रयी मुकेश, रफी और किशोर कुमार में मुकेश ने सबसे कम गीत गाए हैं। लेकिन, दिलचस्प ये भी है कि इसके बावजूद उनके लोकप्रिय गीतों की संख्या सबसे अधिक है। मुकेश आज होते तो सौ साल के हो जाते। उनके सौंवे जन्मदिन पर उनके बेटे नितिन मुकेश से ये एक्सक्लूसिव बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने। इस बातचीत में नितिन ने न सिर्फ अपने पापा से रिश्तों पर लंबी बातचीत की बल्कि उन गानों पर भी खुलकर चर्चा की जो मुकेश के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में शुमार हैं। मुकेश के अंतिम शो के बारे में बताते हुए इस दौरान नितिन मुकेश कई बार भावुक भी हुए।
 
 
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अपने परिवार के साथ मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
नितिन जी, आपके पास आपके पापा की पहली पहली यादें कौन सी हैं?
जब मैं बच्चा तो मुझे तो ख्याल भी नहीं आता था कि मैं इतने बड़े महान पिता का बेटा हूं। और, वह इसलिए कि उन्हें खुद भी महसूस ही नहीं होता था कि मैं इतनी बड़ी हस्ती हूं। वह बहुत ही सादा मिजाज के आदमी थे। जैसे हनुमानजी को उनकी शक्ति के बारे में याद दिलाना पड़ा था, वैसे ही हमें पापा को याद दिलाना पड़ता था कि आप इतने बड़े स्टार या इतने बड़े गायक हो। वह अक्सर बस की लाइन में खड़े हो जाते थे। टैक्सी में ही कहीं भी चले जाते थे। हम कुछ इस बारे में कहते तो वह बस एक उंगली दिखाते कि बेटा आज तो कह दिया अब फिर कभी न कहना। मैं जैसा हूं, वैसा खुश हूं। मुझमें औरों से अलग कोई बात नहीं है।
 
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नितिन मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
गायकी के गुर तो आपने भी उन्हीं से सीखे होंगे?
वह कहते थे कि मुझमें इतना ज्ञान नहीं है कि मैं तुमको कुछ सिखाऊं, बेटा। उनके जो गुरु थे पंडित जगन्नाथ प्रसाद जी, उनसे उन्होंने मुझे तालीम दिलवाई। लेकिन, मेरी आत्मा में मैंने उनको ही गुरु स्वीकारा अपने जीवन में। न ही सिर्फ गाने में, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में उनसे मुझे सब कुछ सीखने को मिला। मैं उनकी शैली में गाता था और गाता हूं और आगे भी गाऊंगा उनकी शैली में। मेरे लिए उनसे आगे कुछ दुनिया दिखती ही नहीं। मेरे लिए सर्वप्रथम वह ही हैं। उनके साथ के और भी गायक हैं जो अच्छे रहे हैं और अच्छा गाते रहे हैं, लेकिन मेरे पसंदीदा गायक तो मेरे पापा ही रहे हैं।, बैठकर उन्होंने कभी मुझे कुछ नहीं सिखाया। लेकिन मैंने उनको देखकर औऱ सुनकर बहुत कुछ सीखा। उन्होंने हमें जो भी सिखाया करके सिखाया। इस लिहाज से मेरे गुरु तो मेरे पापा ही रहे।
 

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मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
फिल्म अनाड़ी का गाना किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, जब पहली बार आपने सुना तो पहली प्रतिक्रिया क्या थी आपकी? क्योंकि परदे पर ये गाना भले राजकपूर पर फिल्माया गया लेकिन ज्यादा नजदीक ये गाना मुकेश की शख्सियत के है..
मैं नौ साल का था जब ‘अनाड़ी’ फिल्म आई थी। ये गीत अगर लिखा गया किसी के लिए तो वह थे पापा, ‘किसी की मुस्कुराहटों में हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार.. ’वो दुनिया जहान का दर्द अपने दिल में समेट लेते थे। और, ‘किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार... ’, तो वो दुनिया जहान को अपना प्यार बांटते थे। इसीलिए लगता है कि ये गीत उनके लिए ही लिखा गया था। इसी फिल्म के गाने ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ के लिए उन्हें पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला था।
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मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
फिल्मफेयर अवार्ड की बात छिड़ी है तो मुझे साल 1972 भी याद आता है जब मुकेश जी के ही तीन गाने सर्वश्रेष्ठ गायक की श्रेणी में एक दूसरे से मुकाबला कर रहे थे..
फिल्म ‘मेरा नाम जोकर का’ का गाना ‘जाने कहां गए वो दिन’, फिल्म ‘आनंद’ का गाना ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ और फिल्म ‘बेईमान’ का गाना ‘जै बोलो बेईमान की’ मुकाबले में थे। पुरस्कार फिल्म ‘बेईमान’ के गाने को मिला। तीनों गाने उनके लिए तो तीन बच्चे ही थे लेकिन ‘मेरा नाम जोकर’ का गीत ‘जाने कहां गए वो दिन’ इन तीनों गीतों में से... (नितिन मुकेश एकदम से रुक जाते हैं), इस गाने के बारे में मैं आखिर में बात करता हूं। याद दिलाइएगा मुझे। अभी आप अपने बाकी सवाल कर लीजिए।
 
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नितिन मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
आपको जब मंच पर गाने का पहला मौका मिला तो वो कौन सा गाना था जो आपने गाया था..
पहले जिस पब्लिक शो में पापा मुझे गाना गवाने ले गए। पृथ्वीराज कपूर उसमें मुख्य अतिथि थे। मैंने फिल्म ‘बरखा’ का गाना गाया, ‘एक रात में दो दो चांद खिले, एक घूंघट में एक बदली में..’, लताजी की भी लाइनें मैंने गाईं और पापा की भी लाइनें गाईं। वह गीत उन दिनों बहुत ही लोकप्रिय था। मैं आंखें बंदकर गाता था तो मुझे कहते थे कि बेटा, आंखे खोलकर गाओ। खुद तो कभी आंखें खोलकर नहीं गाते थे, खोलते भी थे तो बहुत मुश्किल से लेकिन मुझसे कहते थे कि श्रोताओं से संवाद बनाने के लिए मंच पर आंखें खोलकर ही गाना चाहिए। आंखें मिलेंगी तो दिल भी जुड़ेगा।
 
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राज कपूर, मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
मुकेश जी ने राज कपूर के लिए करीब 110 और दिलीप कुमार के लिए सिर्फ 20 गाने गाए। लेकिन, जितनी सहजता से वह राज कपूर की आवाज बने, उतनी ही सरलता से वह दिलीप कुमार पर फिल्माए गाने भी गा देते थे...
‘सुहाना सफर’ या फिर ‘ये मेरा दीवानापन है’ ये गाने देखिए तो आपको लगेगा ही नहीं कि दिलीप साहब नहीं गा रहे हैं। दिलीप साहब ने एक बार मुझसे कहा था कि उनका बिल्कुल ही मन नहीं था महबूब खान की फिल्म ‘मेला’ फिल्म करने का। दिलीप कुमार के मुताबिक, ‘फिल्म ‘मेला’ मैंने सिर्फ इसलिए की क्योंकि मैंने इसके दो गाने ‘धरती को आकाश पुकारे’ और ‘गाए जा गीत मिलन के’ सुन लिए थे और ये गाने मुझे अपने ऊपर चाहिए थे। मेरा मन नहीं था ये फिल्म करने का लेकिन जब मैंने ये दोनों गीत सुने तब मैंने फैसला किया कि ये फिल्म मुझे करनी ही है।’

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मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और, राजेश खन्ना पर फिल्माया गया, कहीं दूर जब दिन ढल जाए...
ये बात कम ही लोगों को मालूम है कि ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’, ‘नैन हमारे’ और एक और गीत, तीन गीत सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में किसी अन्य फिल्म के लिए मुकेश जी ने गाए थे। लेकिन, ये गीत हिस्से में आए अलग अलग फिल्मों के। ‘नैन हमारे’ और ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ राजेश खन्ना को पसंद आए थे और उनके कहने पर ही निर्देशक ऋषि मुखर्जी ने इन्हें फिल्म ‘आनंद’ के लिए लिया था। राजेश खन्ना की इतनी जिद थी इन गानों के लिए कि ये गाने मुझे हर हाल में चाहिए। लेकिन असित (सेन) दा ने कहा कि ‘नैन हमारे’ गीत मैं नहीं दे सकता। सलिल दा ने कहा भी कि इन तीनों गानों की वजह से मुझे तीन अलग अलग फिल्में मिलीं।

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मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और जब लोगों ने तौबा ये मतवाली चाल झुक जाए फूलों की डाल सुना तो चौंक गए कि ये गाना मुकेश गा रहे हैं..
हां, लोग मुकेश जी से रूमानी गीत ही गवाने को प्राथमिकता देते थे या फिर दर्द भरे गीत। है तो ये भी गीत बहुत ही रोमांटिक लेकिन इसकी लय के साथ थोड़ा अलबेला प्रयोग है। मनोज जी पर ये गीत फिल्माया गया है और कहीं से लगेगा नहीं कि मनोज जी नहीं गा रहे हैं, वह जिसके लिए भी गाते थे, वह उसी पर फब जाता था। अमिताभ बच्चन के लिए उन्होंने फिल्म ‘कभी कभी’ में ‘मैं पल दो पल का शायर हूं’ गाया। क्या लगता है कि ये गाना अमिताभ बच्चन नहीं गा रहे हैं?

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मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और, आपने अपना पहला गाना बतौर पार्श्वगायक जब रिकॉर्ड किया होगा, तो माहौल कैसा था?
माहौल तो ऐसा था कि पापा के आंसू नहीं रुक रहे थे। सबसे पहले कुछ लाइनें तो मैंने फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए अंग्रेजी में गाई थीं लेकिन जो पहला हिंदी गाना मैंने रिकॉर्ड किया वो था ‘तेरी झील सी गहरी आंखों में कुछ देखा हमने क्या देखा’। ये किशोर साहू साहब की फिल्म थी ‘धुएं की लकीर’। संगीतकार श्यामजी घनश्यामजी ने मुझसे ये गाना गवाया और उस रिकॉर्डिंग में पापा आए थे। उनके चेहरे पर इतनी बेचैनी थी कि मुझे कहना पड़ा कि पापा, आप साउंड सेक्शन वाला पर्दा खींच लो। रिकॉर्डिंग के बाद उन्होंने मुझे बहुत प्यार किया। उनके आंसू रोके नहीं रुक रहे थए। फिर उस दिन उन्होंने मां के कहने पर मुझे एक सोने की चेन दिलवाई। पतली सी चेन थी लेकिन उसे जब भी मैं पहनता हूं तो मैं समझता हूं कि उसमें किसी तरह की शक्ति है। उस चेन को मैं बड़ा संभालकर रखता हूं।

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धर्मेंद्र, इंदिरा गांधी, मुकेश, राज कपूर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
उनकी गाई रामचरित मानस भी बहुत लोकप्रिय रही..
वह खुद बहुत ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। कॉलेज की शिक्षा वह पूरी नहीं कर पाए थे। लेकिन जो ज्ञान उन्होंने हासिल किया था वह बेमिसाल था। रोज सुबह उठते थे। सैर पर जाते थे। फिर लौटकर नहा धोकर रियाज करते थे और उसके बाद घर में बने छोटे से मंदिर के सामने बैठकर रामायण पढ़ते थे। रामायण पढ़ते समय वह अक्सर भावुक हो जाते थे और रोने लगते थे। तब, मां कहतीं कि इनके सामने से रामायण हटा लो नहीं तो ये रोते ही जाएंगे।

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मुकेश, लता मंगेशकर, रफी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अभी अनुराधा पौडवाल के घर पर था मैं, तो उन्होंने कहा कि मुकेश जी जो गाते थे वह सच लगता था..
कितना अच्छा कहा उन्होंने। लताजी ने भी कहा कि जब मुकेश भैया गा रहे होते तो यूं लगता था कि कोई भला मानुस, कोई संत या देव मानुस गा रहा है। मुरली मनोहर स्वरूप जिन्होंने पापा की गाई रामायण को संगीतबद्ध किया वह कहा करते थे, अगर प्रभु श्रीराम गाते तो मुकेश की आवाज में ही गाते। पापा की आवाज, व्यक्तित्व और जीवन में कोई बनावटीपन नहीं था। कोई छल कपट नहीं था।
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मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

अच्छा, वह क्या बात थी जो फिल्म मेरा नाम जोकर के गाने जाने कहां गए वो दिन.. ’ को लेकर आप बताने वाले थे?
ये वह पंक्तियां हैं जो पापा ने अपने जीवन में आखिरी बार गाईं। टोरंटो का ये शो था। उस दिन ये तय हुआ कि मैं और पापा ये गाना साथ गाएं। वह गाना शुरू करते थे और मैं दूसरे अंतरे से उनका साथ देता था। तो उनकी लाइन थी,
अपनी नज़र में आज कल, दिन भी अंधेरी रात है

साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है

फिर वो मुखड़ा गाते थे,
जाने कहां गए वो दिनकहते थे तेरी राह में

नज़रों को हम बिछाएंगे

चाहे कहीं भी तुम रहोचाहेंगे तुमको उम्र भर

तुमको ना भूल पाएंगे

जाने कहां गए वो दिन ...

फिर म्यूजिक बजता और फिर मेरी लाइन आती..

इस दिल के आशियाने में बस उनके ख़याल रह गये

तोड़ के दिल वो चल दिहम फिर अकेले रह ग

सोचिए कि भगवान ने मेरे मुख से, मेरे कंठ से क्या लाइनें कहलवाईं। विधि में जो लिखा हो वह ईश्वर को ही पता है कि कल का दिन ये इंसान देखेगा कि नहीं। लेकिन किसी से ये कहलवा देना! जब वह नहीं रहे तो मेरा ध्यान सबसे पहले इसी तरफ गया। आखिरी पंक्तिया मैंने पापा के साथ गाईं, तोड़ के दिल वो चल दिए, हम फिर अकेले रह गए...

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