मुकेश
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अच्छा, वह क्या बात थी जो फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के गाने ‘जाने कहां गए वो दिन.. ’ को लेकर आप बताने वाले थे?
ये वह पंक्तियां हैं जो पापा ने अपने जीवन में आखिरी बार गाईं। टोरंटो का ये शो था। उस दिन ये तय हुआ कि मैं और पापा ये गाना साथ गाएं। वह गाना शुरू करते थे और मैं दूसरे अंतरे से उनका साथ देता था। तो उनकी लाइन थी,
अपनी नज़र में आज कल, दिन भी अंधेरी रात है
साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है
फिर वो मुखड़ा गाते थे,
जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में
नज़रों को हम बिछाएंगे
चाहे कहीं भी तुम रहो, चाहेंगे तुमको उम्र भर
तुमको ना भूल पाएंगे
जाने कहां गए वो दिन ...
फिर म्यूजिक बजता और फिर मेरी लाइन आती..
इस दिल के आशियाने में बस उनके ख़याल रह गये
तोड़ के दिल वो चल दिए, हम फिर अकेले रह गए
सोचिए कि भगवान ने मेरे मुख से, मेरे कंठ से क्या लाइनें कहलवाईं। विधि में जो लिखा हो वह ईश्वर को ही पता है कि कल का दिन ये इंसान देखेगा कि नहीं। लेकिन किसी से ये कहलवा देना! जब वह नहीं रहे तो मेरा ध्यान सबसे पहले इसी तरफ गया। आखिरी पंक्तिया मैंने पापा के साथ गाईं, तोड़ के दिल वो चल दिए, हम फिर अकेले रह गए...