शांताराम राजाराम वनकुद्रे यानी वी शांताराम यानी भारतीय सिनेमा के एक ऐसे फिल्मकार रहे जिन्होंने सिनेमा अपने साथ सिनेमा को भी आगे बढ़ाया। शांताराम वह फिल्मकार हैं जिन्होंने सिनेमा में अपना काम तब शुरू किया जब देश में मूक फिल्में बनती थीं। पहली बोलती फिल्म तो शांताराम ने नहीं बनाई लेकिन फिल्मों में तकनीक का इस्तेमाल सबसे पहले शुरू करने का श्रेय जरूर शांताराम को जाता है। उन्होंने अपने करियर में 90 से ज्यादा फिल्में बनाईं। 55 फिल्मों के वह निर्देशक रहे। भारत सरकार की तरफ से दिए जाने वाले सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से वी शांताराम को 1985 में सम्मानित किया गया। आज उनके जन्मदिन के मौके पर हम आपको उनकी कुछ बेहतरीन फिल्मों के बारे में बताते हैं।
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दुनिया ना माने
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दुनिया ना माने (1937)
वी शांताराम ने अपने करियर की शुरुआत से ही चुनौतीपूर्ण फिल्में बनाना शुरू किया था। 'नेताजी पालकर', 'गोपाल कृष्ण', 'उदयकाल' जैसी साइलेंट फिल्में बनाने के बाद शांताराम ने 'अमृत मंथन', 'अमर ज्योति' जैसी बेहतरीन बोलती फिल्में भी बनाईं। उनकी हर फिल्म का मुद्दा अलग ही रहता था। शांताराम ने 1937 में फिल्म 'दुनिया न माने' बनाई। यह फिल्म हिंदी के साथ मराठी भाषा में भी 'कुंकु' शीर्षक से बनी है। इस फिल्म के साथ शांताराम ने भारतीय समाज में महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर हिम्मत दिखाकर प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने बाल विवाह का भी अपनी फिल्म में चित्रण किया। यह फिल्म उन्होंने वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई। इस फिल्म को हर जगह दर्शकों और समीक्षकों दोनों से ही सराहना मिली।
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आदमी
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आदमी (1939)
शांताराम ने वर्ष 1939 में 'आदमी' नाम से एक ड्रामा फिल्म बनाई। मूल रूप से यह फिल्म मराठी में रही जिसका शीर्षक है 'माणूस'। यह फिल्म ए भास्करराव की लिखी कहानी 'द पुलिस कांस्टेबल' पर आधारित है। यह कहानी भी एक ईमानदार पुलिस वाले की है जो एक वेश्या से प्रेम करने लगता है। वह पुलिस वाला उस वैश्या को अपनाने के लिए तैयार है और वह उस वेश्या का काम भी छुड़वा देता है। प्रेम की वजह से वह पुलिस वाला भले ही उस वेश्या को अपना लेता है लेकिन समाज उसे कभी नहीं अपनाता। समाज की इस धारणा का ही शांताराम ने खूबसूरती से चित्रण किया है।
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डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी (1946)
शांताराम ने अपनी पहली फिल्म 'नेताजी पालकर' वर्ष 1927 में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी के बैनर तले बनाई जिसे मराठी की पहली बायोपिक माना जा सकता है। इसके बाद फिर उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर प्रभात फिल्म कंपनी शुरू की। इस प्रोडक्शन हाउस के अंतर्गत उन्होंने वर्ष 1929 से लेकर 1941 तक कई फिल्में बनाईं। फिर उन्होंने प्रभात फिल्म कंपनी को छोड़ दिया और अपनी एक अलग प्रोडक्शन कंपनी राजकमल कालामंदिर शुरू की। उनकी वर्ष 1946 में आई फिल्म 'डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी' इसी नई कंपनी के अंतर्गत बनी। शांताराम ने यह बायोपिक फिल्म हिंदी के अलावा अंग्रेजी भाषा में भी बनाई जिसका अंग्रेजी में शीर्षक 'द जर्नी ऑफ डॉक्टर कोटनीस' रखा। इस फिल्म में शांताराम ने मुख्य भूमिका भी निभाई। यह कहानी डॉक्टर कोटनीस की है जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लड़ रहे सिपाहियों की मदद के लिए चीन भेज जाता है। कहानी में कई उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन अंत में डॉक्टर कोटनीस की मिर्गी का दौरा पड़ने से मौत हो जाती है। फिल्म में शांताराम की हीरोइन उनकी पत्नी जयश्री रहीं।
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अमर भूपाली
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अमर भूपाली (1951)
वर्ष 1951 में आई 'अमर भूपाली' फिल्म का निर्देशन और निर्माण दोनों ही शांताराम ने किए हैं। यह भी एक बायोपिक जैसी ही है। मराठी भाषा की इस फिल्म कहानी एक साधारण गायों के चरवाहे की है जो बेहतरीन कविता भी करता है। कहानी 19वीं सदी की शुरुआत की है जब देश के पश्चिम में मराठा शासन था। वह चरवाहा अपनी कविताओं से लोगों के अंदर इतना जोश भर देता है कि वह साहस दिखाकर अंग्रेजी शासन से लोहा लेने के लिए तैयार रहते हैं। शांताराम ने जब इस फिल्म को कांन्स फिल्म फेस्टिवल में दिखाया यो इसे ग्रैंड प्राइज ऑफ द फेस्टिवल की श्रेणी में नामांकन मिला।
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सुबह का तारा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सुबह का तारा (1954)
शांताराम ने 1954 में एक सामाजिक रोमांटिक ड्रामा फिल्म 'सुबह का तारा' भी बनाई। इस फिल्म का निर्देशन और निर्माण दोनों शांताराम ने किए और इसे लिखने का काम किया शम्स लखनवी ने। फिल्म की कहानी एक जवान विधवा औरत पद्मिनी की है जो अपनी बीमार मां को पाल रही है। फिल्म में जवान विधवा औरत का किरदार शांताराम की पत्नी जयश्री ने निभाया है। एक जवान आदमी मोहन (प्रदीप कुमार) उस विधवा से प्रेम करने लगता है। हालांकि, वह उससे शादी नहीं कर पाता क्योंकि उसे एक विधवा से शादी करने की वजह से समाज का डर रहता है। इसी चक्कर में मोहन पागल हो जाता है। फिल्म में शांताराम ने भी एक शराबी का छोटा सा किरदार निभाया है। इस छोटे से किरदार को समीक्षकों और दर्शकों से बड़ी सराहना मिली।
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झनक झनक पायल बाजे
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झनक झनक पायल बाजे (1955)
शीर्षक के अनुसार यह कहानी दो नर्तकों की है। नीला एक मशहूर नर्तकी है जो मंगल की हवेली में एक बेहतरीन प्रस्तुति देती है। लेकिन, मंगल उस प्रतियोगिता में अपने बेटे गिरधर को भी उतार देता है। वह गिरधर से कहता है कि नीला को शास्त्रीय नृत्य का सही ढंग दिखाया जाए। नीला गिरधर के साथ नृत्य करती है और उससे प्रेम करने लगती है। हालांकि, मंगल नीला को चाहता था लेकिन नीला उसके बेटे से प्यार करने लगी। नीला और गिरधर सब कुछ भूल कर सिर्फ प्रेम पर ध्यान देते हैं। लेकिन, मंगल को चिंता हो जाती है कि इनकी वजह से कहीं शास्त्रीय नृत्य दिक्कत में न आए। यहीं से शुरू होता है क्रूरता का खेल। फिल्म में नर्तकी का किरदार शांताराम की तीसरी पत्नी संध्या ने निभाया है। इस फिल्म ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार और ऑल इंडिया सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट फॉर बेस्ट फीचर फिल्म जैसे पुरस्कार जीते। बॉक्स ऑफिस पर भी यह फिल्म सुपरहिट रही। शांताराम के निर्देशन में बनी यह फिल्म शुरुआत की चुनिंदा रंगीन फिल्मों में से एक है।
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दो आंखें बारह हाथ
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दो आंखें बारह हाथ (1957)
वर्ष 1957 में आई कालजयी फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' हर दृश्य के साथ दर्शकों को कुछ नैतिक शिक्षा देती है। यह बताती है कि कोई आदमी अगर किसी काम को करने की ठान लेता है तो वह कुछ भी कर सकता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो शांताराम के निर्देशन और निर्माण में बनी यह कॉमेडी ड्रामा फिल्म मानव की मानसिकता को प्रदर्शित करती है। कहानी एक जेल वार्डन की है जो खूंखार अपराधियों को पैरोल पर रिहा कर देता है। भले ही वह अपराधी थे लेकिन जब वह वार्डन उन्हें एक बंजर भूमि पर छोड़ देता है तो उन अपराधियों को मेहनत का मतलब समझ में आता है। वह उस बंजर जमीन को उपजाऊ बनाकर फसल पैदा कर देते हैं। इस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से भारी सराहना मिली। फिल्म को आठवें बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया जहां इसने सिल्वर बेयर जीता और गोल्डन ग्लोब में नामांकन भी हासिल किया। लता मंगेशकर ने वह प्रतिष्ठित गीत 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' इसी फिल्म में गाया है।
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नवरंग
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नवरंग (1959)
शांताराम के निर्देशन में बनी फिल्म 'नवरंग' एक म्यूजिकल ड्रामा फिल्म है। इसे शांताराम की पत्नी संध्या की तरफ से इस फिल्म में दी गई एक नृत्य प्रस्तुति के लिए याद किया जाता है। संध्या ने फिल्म में मुख्य भूमिका भी निभाई। फिल्म की कहानी एक कवि दिवाकर की है जो अपनी पत्नी जमुना से बहुत प्यार करता है। वह उसके प्यार में इतना अंधा हो जाता है कि उसके लिए वह अपने ख्यालों की एक अलग दुनिया बसा लेता है। और, उसमें अपनी पत्नी जमुना का नाम सोचता है मोहिनी। अपनी पत्नी के प्रति उसका यह मोह उसके घर के साथ उसके करियर को भी तबाह कर देता है। पार्श्व गायक महेंद्र कपूर ने इसी फिल्म के साथ अपने करियर की शुरुआत की।
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सेहरा
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सेहरा (1963)
शांताराम की फिल्मों में उनकी पत्नी संध्या ने खूब काम किया है। वर्ष 1963 में आई फिल्म 'सेहरा' में भी संध्या की मुख्य भूमिका में रहीं। यह फिल्म राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित है। फिल्म की कहानी दो समुदायों के बीच आपसी झगड़े की है। झगड़ा तो इन समुदायों में पहले से ही चल रहा था लेकिन यह और भी बड़ा तब हो जाता है जब इन दोनों समुदायों के बच्चे एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। इस फिल्म में एक छोटा सा किरदार मुमताज ने भी किया है। शांताराम की यह पहली फिल्म है जिसने दो श्रेणियों में फिल्मफेयर पुरस्कार जीते। फिल्म को बेहतरीन रंगीन सिनेमैटोग्राफी के लिए न्यूली इंस्टिट्यूटेड एजे पटेल अवार्ड भी मिला जहां पुरस्कार स्वरूप थे पांच हजार रुपये नगद।
पिंजरा (1972)
शांताराम की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में साल 1972 में 'पिंजरा' भी एक रही। मूल रूप से यह एक मराठी फिल्म है लेकिन उसी साल शांताराम ने इसे हिंदी भाषा में भी रिलीज किया। जाने-माने रंगमंच के कलाकार श्रीराम लागू ने इस फिल्म से ही फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की। इस फिल्म को भी अभिनेत्री संध्या की बेहतरीन नृत्य प्रस्तुति के लिए जाना जाता है। शांताराम की सबसे बेहतरीन फिल्मों में यह अंतिम है। फिल्म को समीक्षकों से तो अच्छी प्रतिक्रिया मिली ही, साथ ही दर्शकों से भी बहुत प्यार मिला। महाराष्ट्र के शहर पुणे में यह फिल्म लगातार 134 सप्ताह तक चलती रही। यह कहानी एक स्कूल के अध्यापक और एक तमाशा करने वाली की है। ये दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं लेकिन झूठ बोल बोल कर अपने रिश्ते को समाज से छुपाते रहते हैं। मराठी फिल्मों में रंगीन सिनेमा की शुरुआत इसी फिल्म से मानी जाती है। इस फिल्म को मराठी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानते हुए अगले साल राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।