बाल कलाकार के रूप में की शुरुआत
अमजद खान को अभिनय की प्रतिभा परिवार से विरासत में मिली। अभिनेता अमजद खान का जन्म 12 नवंबर 1940 को मुंबई में अभिनेता जयंत खान के घर हुआ। अमजद खान ने महज 11 साल की उम्र में बतौर कलाकार अभिनय शुरू किया और फिल्म थी 'नाजनीन'। इसमें वे अपने पिता के साथ नजर आए। फिर 17 की उम्र में वे अपने पिता के साथ ही 'अब दिल्ली दूर नहीं' में दिखे। इसके बाद उन्होंने 'हिंदुस्तान की कसम' और 'माया' जैसी फिल्मों में काम किया।
'अभिशप्त चंबल' पढ़कर बने गब्बर सिंह
फिल्म 'हिंदुस्तान की कसम' (1973) के जरिए वे पहली बार बतौर एक प्रोफेशनल सिल्वर-स्क्रीन कलाकार के रूप में सामने आए। शोले (1975) में गब्बर सिंह की भूमिका निभाकर उन्होंने बॉलीवुड के इस स्टीरियोटाइप खलनायक को एक नए जॉनर के प्रतीक में बदल दिया। इस किरदार की तैयारी करते हुए अभिनेता ने खुद में बदलाव किया। 'शोले' के निर्देशक रमेश सिप्पी ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि अमजद खान ने चंबल के डकैतों पर लिखी किताब 'अभिशप्त चंबल' पढ़कर अपने इस किरदार के लिए तैयारी की थी।
कमाल के थिएटर आर्टिस्ट थे अमजद खान
अमजद खान 'एक्टर्स गिल्ड एसोसिएशन' के अध्यक्ष थे और वे फिल्म इंडस्ट्री के मामलों में बेहद दिलचस्पी रखते थे। कम लोग जानते हैं कि फिल्मों में आने से पहले अमजद खान एक थिएटर आर्टिस्ट थे। उन्हें अपने सबसे लोकप्रिय किरदार गब्बर की भूमिका का ऑफर भी इसी के चलते मिली। दरअसल, अमजद खान एक दिन स्टेज पर परफॉर्म कर रहे थे। रमेश सिप्पी अमजद खान का वह शो देखने पहुंचे हुए थे। वे उनके हाव-भाव देख इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने गब्बर के किरदार के लिए उन्हें ले लिया।
इन फिल्मों में किया काम
अमजद खान ने प्रकाश मेहरा की 'मुकद्दर का सिकंदर' (1978) में एक गैंगस्टर दिलावर की भूमिका निभाई। उन्हें कई अन्य फिल्मों में भी काम किया गया, जिनमें 'शतरंज के खिलाड़ी' (1977), 'हम किसी से कम नहीं' (1977), 'गंगा की सौगंध' (1978), 'देस परदेस' (1978), 'दादा' (1979), 'चंबल की कसम' (1980), 'नसीब' (1981), 'सत्ते पे सत्ता' (1982) और 'नास्तिक' (1983) शामिल हैं। 'याराना' (1981) और 'लावारिस' (1981) जैसी फिल्मों में उन्होंने कमाल के रोल किए। वहीं, 'कुर्बानी' (1980), 'लव स्टोरी' (1981) और 'चमेली की शादी' (1986) जैसी फिल्मों में हास्य भूमिकाएं भी निभाईं।
इस फिल्म में भी गब्बर सिंह बने अमजद खान
अजित देवानी द्वारा निर्देशित फिल्म 'रामगढ़ के शोले' (1991) में अमजद खान ने एक बार फिर गब्बर सिंह की भूमिका निभाई और यह फिल्म भी ब्लॉकबस्टर साबित हुई।
निर्देशन में भी आजमाया हाथ
थिएटर और फिल्मों में अभिनय के अलावा अमजद खान ने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। उन्होंने 'चोर पुलिस' (1983) से निर्देशक के रूप में डेब्यू किया। इसमें उन्होंने परवीन बॉबी, शत्रुघ्न सिन्हा, कादर खान और शक्ति कपूर के साथ अभिनय किया। उनके निर्देशन में बनी फिल्म 'अमीर आदमी गरीब आदमी' (1985) में रिलीज हुई और सफल रही।
मिले यह अवॉर्ड और सम्मान
उन्होंने 1976 में बीएफजेए (BFJA) अवार्ड्स में फिल्म 'शोले' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार जीता। इसके अलावा उन्होंने दादा (1980) और याराना (1982) के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार जीता। अमजद खान ने फिल्म 'मां कसम' (1986) के लिए फिल्मफेयर अवार्ड्स में बेस्ट परफॉर्मेंस इन कॉमिक रोल का पुरस्कार भी जीता।
साहित्य प्रेमी थे अमजद खान
अमजद खान सिनेमा के अलावा साहित्य प्रेमी भी थे। वे पढ़ाई-लिखाई में भी अव्वल रहे। उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी में मास्टर डिग्री हासिल की। वे कई भाषाओं के जानकार थे। अंग्रेजी और उर्दू के अलावा अमजद खान फारसी में भी पारंगत थे। उन्होंने फारसी साहित्य में मास्टर भी किया था।
फिल्मी है अमजद खान की लव स्टोरी
अमजद खान की लव स्टोरी काफी दिलचस्प है। उन्होंने 1972 में शेहला खान से शादी रचाई। शेहला की उम्र जब महज 14 साल थी, तभी अमजद खान का दिल उन पर आ गया। अपनी और अमजद की लव स्टोरी के बारे में खुद शेहरा ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था। शेहला के मुताबिक, वे और अमजद खान मुंबई के बांद्रा में एक-दूसरे के पड़ोसी थे। शेहला अमजद खान को जयंत अंकल के बेटे के तौर पर जानती थीं। वे तब स्कूल में पढ़ा करती थीं और अमजद कॉलेज में थे। दोनों एक-दूसरे के साथ बैडमिंटन खेलते थे। उस वक्त प्यार-मोहब्बत जैसा कुछ नहीं था और शेहला अभिनेता को भैया कहा करतीं। धीरे-धीरे अमजद खान का दिल शेहला के लिए धड़कने लगा था और उन्होंने शेहला से कहा, 'मुझे भैया मत कहा करो'। एक रोज शेहला स्कूल से लौट रही थीं तो अमजद खान ने उन्हें रास्ते में रोक लिया और कहा, 'जल्दी से बड़ी हो जाओ। मैं तुमसे शादी करूंगा'। फिर, शेहला के घरवालों से उनका हाथ मांग लिया। तब शेहला की उम्र कम होने के चलते उनके पिता ने इनकार कर दिया। धीरे-धीरे दोनों की प्रेम कहानी और आगे बढ़ी। साल 1972 में इनकी शादी हो गई। अमजद और शेहला के तीन बच्चे हुए।
'शोले' हिट होने पर एक्टिंग छोड़ने की कही थी बात
बता दें कि अमजद खान अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में मोटापे का शिकार हो गए थे, जिसके कारण उनके लिए चलना-फिरना भी दूभर हो गया था। इसकी वजह वह खुद को ही मानते थे। बता दें कि अमजद खान एक कार दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गए थे। उपचार के तौर पर डॉक्टरों ने उन्हें जो दवाएं दीं, उनसे अमजद खान का बहुत वजन बढ़ गया। यहां तक कि चलना-फिरना भी मुश्किल हो चला। एक बातचीत के दौरान उन्होंने खुलासा किया था कि अगर फिल्म 'शोले' सुपरहिट होती है तो वह फिल्मों में काम करना छोड़ देंगे। फिल्म सुपरहिट हुई। मगर, अमजद खान ने यह वाादा नहीं निभाया और फिल्मों में काम जारी रखा। अभिनेता ने बातचीत के दौरान कहा था कि ऊपर वाले ने मोटापे के रूप में उन्हें यह सजा दी है। 27 जुलाई 1992 को दिल का दौरा पड़ने से अमजद खान का निधन हो गया। मगर, उनका सिनेमा, उनके डायलॉग और अभिनय आज भी दर्शकों के बीच जिंदा हैं।