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ये है एक साधारण लड़की की कहानी, चुनौतियों को मात देकर बनीं फाइटर एयरक्राफ्ट की पायलट

Sat, 24 Feb 2018 04:38 PM IST
अवनि चतुर्वेदी
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Avani Chaturvedi
चौबीस वर्ष पहले मेरा जन्म मध्य प्रदेश के सतना जिले के कोठीकंचन गांव में हुआ था। लेकिन वर्तमान में मेरा परिवार पड़ोस के रीवा जिले में रह रहा है। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले से शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने राजस्थान के वनस्थली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस विषय में इंजीनियरिंग की। मेरे पिता मध्य प्रदेश सरकार के जल संसाधन विभाग में इंजीनियर और मां गृहिणी हैं। मेरे मामा प्रेम प्रकाश शर्मा सेना के रिटायर्ड कर्नल हैं और मेरा भाई निरभ सेना में कैप्टन है। सेना के लिए काम करने की प्रेरणा मुझे अपने भाई से ही मिली।
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- फोटो : PTI
स्कूल में हमेशा अव्वल आई
मेरा बचपन किसी सामान्य भारतीय लड़की के जीवन की तरह बहुत ही सहज तरीके से एक छोटे से कस्बाई परिवेश में बीता है। चाहे वह मेहंदी लगाना हो या फिर लड़कियों की दूसरी गतिविधियां, मैंने ऐसे कामों में हमेशा भाग लिया। लेकिन इसके साथ पढ़ाई के प्रति मैं हमेशा संजीदा रही। स्कूल में मैं हमेशा अव्वल आई। उच्च शिक्षा के लिए घर छोड़ने से पहले जब तक घर में रही, मेरे पिता मेरे सबसे अच्छे शिक्षक रहे। उन्होंने मुझे सोचने, खेलने-कूदने, करियर के चुनाव की पूरी आजादी दी। किसी भी काम को पूरी तन्मयता से करना हमेशा से मेरी पहचान रहा।
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मुश्किलों को आसान बनाया
एक से ज्यादा सैन्य परिजनों के चलते सेना की नौकरी के प्रति मेरा मोह स्वाभाविक था। यही वजह थी कि स्कूल स्तर से ही मैंने एनसीसी (राष्ट्रीय सेवा योजना) के कैंपों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और सेना में जाने को ही लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ती गई। वनस्थली में पढ़ते वक्त मैंने वायुसेना में जाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए। मैंने सारे प्रयास बहुत ईमानदारी और लगन से किए। नतीजा यह निकला कि मैंने वायुसेना की परीक्षा आसानी से पास कर ली।

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पायलट बनने को ही लक्ष्य बनाया
परीक्षा पास करने के बाद सबसे मुश्किल था- सैन्य प्रशिक्षण। हैदराबाद में एक वर्षीय कठिन प्रशिक्षण के बाद मैं जून, 2016 में लड़ाकू विमान की पायलट बन तो गई, लेकिन सुखोई और तेजस जैसे उन्नत विमान उड़ाने के लिए मुझे कई और चरणों में प्रशिक्षण लेना आवश्यक था। मैंने कर्नाटक में वह प्रशिक्षण पूरे किए। मुझे अपने काम पर पूरा भरोसा था, और इसी आत्मविश्वास के आधार पर प्रशिक्षण के दौरान मैंने ग्राउंड ड्यूटी के बजाय पायलट बनने की इच्छा व्यक्त की थी।
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कल्पना चावला से प्रभावित
स्कूल से लेकर अकेले लड़ाकू विमान उड़ाने वाली देश की पहली महिला पायलट बनने के अब तक के सफर में मैं जिस भी समूह का हिस्सा रही, उस समूह का नेतृत्व ही किया। मेरा भाई काफी अच्छी कविताएं लिखता है, उसी की देखादेखी मैंने भी कुछेक कविताएं लिखी हैं। साथ ही मुझे पेंटिंग और कई इनडोर खेलों का भी शौक है। यह सच है कि मैंने बचपन में पायलट बनने के बारे में नहीं सोचा था, लेकिन दस वर्ष की आयु में भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के बारे में सुनकर उनसे प्रभावित जरूर हुई थी।

-अवनि के पिता दिनांकर चतुर्वेदी से नूतन कुमार गुप्ता की बातचीत पर आधारित।
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