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बचपन में छिन गईं थीं आंखें, खेल के जुनून ने ओलंपिक तक पहुंचाया

Tue, 29 Nov 2016 12:02 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला,नई दिल्ली
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इच्छाशक्ति से बड़ी कोई ताकत नहीं होती। इस बात को साबित कर दिखाया है पैरालंपिक एथलीट अंकुर धामा ने। बचपन में ही अंकुर की आंखों की रोशनी चली गई थी। माता-पिता को जब ये मालूम पड़ा कि अब किसी सर्जरी से उनके बेटे का इलाज हो सकता तो उन्होंने उसका एडमिशन दिल्ली के लोदी रोड स्थित जेपीएम सीनियर सेकेंड्री स्कूल फॉर ब्लाइंड में करवा दिया।
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उसी समय से अंकुर को स्पोर्ट्स से लगाव हो गया और वे अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी खेलने लगे। तीस साल के इतिहास में पहली बार अंकुर 2016 के पैरालंपिक में भाग लेने वाले ब्लाइंड एथलीट बने। लेकिन 1500 मीटर की टी11 एथलेटिक्स स्पर्धा में दूसरे स्थान पर रहने के बावजूद वे फाइनल क्वालीफाई करने में नाकाम रहे।
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स्कूल में पहली बार उन्होंने इंटरनेशनल टूर्नामेंट में भाग लिया। 2009 में अंकुर ने वर्ल्ड यूथ ऐंड स्टूडेंट चैंपियनशिप में दो गोल्ड मेडल जीते थे।

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2014 में एशियन पैरागेम्स में उन्होंने एक सिल्वर और दो कास्य मेडल जीते। मार्च में दुबई के एशिया ओसेनिया चैंपियनशिप के पैरालंपिक के लिए क्वालीफाई किया।
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उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन सेंट स्टीफंस कॉलेज से पूरी की है। इस समय वह दिल्ली यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे हैं।
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