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हरियाणा के 8 खिलाड़ी, जिन्होंने CWG 2018 में देश को गोल्ड दिलाकर रचा इतिहास

Sun, 22 Apr 2018 04:06 PM IST
खुशबू गोयल/अमर उजाला, चंडीगढ़
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गोल्ड कॉस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स
जानिए, हरियाणा के उन होनहार खिलाड़ियों के बारे में जिन्होंने आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 21वें कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचे।
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पहलवान विनेश फोगाट
पहलवान विनेश फोगाट
पिता का मर्डर हुआ था, रियो ओलंपिक में ऐसी चोटी लगी कि बिस्तर पर रही, पर बहादुर बेटी का जज्बा कम नहीं हुआ और गोल्ड जीतकर इतिहास रचा। भिवानी के बलाली गांव निवासी महावीर फोगाट की भतीजी और गीता फोगाट की चचेरी बहन विनेश फोगाट ने 21वें कॉमनवेलथ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। विनेश ने 50 किलोग्राम की कैटेगरी में देश के लिए गोल्ड जीता। रियो ओलंपिक में चोट लगने के बाद विनेश फोगाट काफी समय पर बिस्तर पर रहीं, डॉक्टर ने खेल छोड़ने को कह दिया था, पर इस बहादुर बेटी ने हिम्मत नहीं छोड़ी और फिर से अखाड़े में उतरी। नतीजा आज सभी के सामने है, कॉमनलवेल्थ में विनेश ने कनाडा की जेसिका मैक्डोनाल्ड को 13-3 से मात देते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया।
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शूटर मनु भाकेर
शूटर मनु भाकेर
पिता ने नौकरी छोड़ दी, खुद की जान भी दांव पर लगी थी, पर हिम्मत नहीं छोड़ी और बन गई 'गोल्डन गर्ल'। हरियाणा के झज्जर की 16 साल की इंटरनेशनल शूटर मनु भाकर ने 21वें कॉमनवेल्थ गेम्स में देश को शूटिंग में गोल्ड मेडल दिलाया। इस उपलब्धि के साथ पिछले दो महीने में यह उनका सातवां गोल्ड मेडल है। मनु ने 240.9 अंक के साथ गोल्ड पर कब्जा जमाया। साथ ही कॉमनवेल्थ गेम्स में रिकॉर्ड भी बनाया। हरियाणा के झज्जर की मनु ने स्वर्ण पदक तक के अपने सफर में दो रिकॉर्ड ध्वस्त किए। पहली बार इन खेलों में भाग ले रही मनु ने महिलाओं की दस मीटर एयर पिस्टल में हमवतन और पूर्व नंबर एक निशानेबाज हीना को पछाड़कर इन खेलों का अपना पहला पीला तमगा जीतकर इन्हें यादगार बना दिया। इससे पहले मनु ने क्वालिफिकेशन में भी 386 का स्कोर कर रिकॉर्ड बनाया।

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अनीश भानवाला
शूटर अनीश भनवाला
पिता ने उधार लिया, शहर तक छोड़ दिया और अब बेटे ने 15 साल की उम्र में सिर फक्र से ऊंचा कर दिया। 26 सितंबर 2002 को हरियाणा के सोनीपत जिले के कसांदी गांव के अनीश भानवाला ने 21वें कॉमनवेल्थ गेम्स में 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता। अनीश ने फाइनल में कुल 30 अंक हासिल करते हुए गोल्ड मेडल जीता। अनीश ने पहली बार गेम्स में हिस्सा लिया और सफलता हासिल की। वहीं, अनीश ने कॉमनवेल्थ गेम्स में पदार्पण करते ही दो नए रिकॉर्ड भी कायम कर दिए। एक, अनीश ने 2014 में ग्लाग्सो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में आस्ट्रेलिया के डेविड चापमान की ओर से बनाए रिकॉर्ड को तोड़ दिया। दूसरा, अनीश सबसे कम उम्र में गोल्ड मेडल जीतने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बन गए हैं। उन्होंने मनु भाकर का रिकॉर्ड तोड़ा। मनु ने इन्हीं गेम्स में 16 की उम्र में गोल्ड जीतने का कारनामा किया था।
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sushil kumar - फोटो : pti
पहलवान सुशील कुमार
दो ओलम्पिक मुकाबलों में व्यक्तिगत पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी सुशील कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 में भी झंडा गाड़ दिया है। 74 किलोग्राम फ्री स्टाइल रैसलिंग में सुशील ने बोथा जोहानेस को महज एक मिनट में ही धूल चटा दी। सुशील खेल के पहले सेकेंड से ही दक्षिण अफ्रीकी पहलवान पर हावी दिख रहे थे। उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में बोथा को जमीन पर ला दिया। इससे सुशील को चार प्वाइंट मिले। इसके बाद भी सुशील नहीं रुके और उन्होंने फिर दो और प्वाइंट बटोर लिए। इसके बाद बोथा के पास संभलने का मौका ही नहीं बचा। सुशील ने एक और दांव मारकर अपनी लीड 10-0 कर ली और गोल्ड मेडल जीत लिया। सुशील ने इसी के साथ कॉमनवेल्थ गेम्स में अपनी गोल्ड की हैट्रिक भी पूरी कर ली है। सुशील 2012 के लंदन ओलंपिक में रजत पदक, 2008 के बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीत चुके हैं।
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नीरज चोपड़ा
जेवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा
जेवलिन खरीदने को पैसे नहीं थे, कहीं से ट्रेनिंग भी नहीं ले सकता था। लेकिन बहादुर बेटे ने हिम्मत नहीं हारी और गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया। हरियाणा के पानीपत में पैदा हुए नीरज चोपड़ा ने ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 21वें राष्ट्रमंडल खेलों के 10वें दिन भारत की झोली में स्वर्ण पदक डाल दिया। नीरज ने भालाफेंक स्पर्धा के फाइनल में 86.47 मीटर की दूरी तय करते हुए सोने का तगमा हासिल किया। इसी के साथ वह राष्ट्रमंडल खेलों में भालाफेंक में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय बन गए हैं। नीरज की इस उपलब्धि पर पिता सतीश कुमार व मां सरोज देवी की आंखों से आंसू छलक आए। एक समय था जब नीरज के पास जेवलियन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, पर नीरज ने हौसला नहीं खोया। पिता सतीश कुमार ने चाचा भीम सिंह चोपड़ा से सात हजार रुपये लेकर सस्ता जेवलिन खरीदा और हर दिन आठ घंटे अभ्यास किया। इसी के बूते अंडर-16, 18 और 20 की मीट व नेशनल रिकॉर्ड बना डाला।
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bajrang punia
पहलवान बजरंग पूनिया
कॉमनवेल्थ गेम्स-2018 में देश को कुश्ती में गोल्ड मेडल जिताने वाले बहादुरगढ़ के लाल अर्जुन अवॉर्डी बजरंग पूनिया ने पढ़ाई से बचने के लिए कुश्ती की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती संघर्ष के बाद किसान का यह बेटा अब दुनिया में कुश्ती का सितारा बनकर चमक रहा है। गांव खुड्डन के किसान बलवान पूनिया के यहां 24 फरवरी 1994 में बजरंग का जन्म हुआ। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे बजरंग का पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता था। स्कूल से बचने के लिए अक्सर वह गांव के अखाड़े में पहुंच जाता। कुश्ती के प्रति उसकी रुचि देख पिता बलवान ने उसे अखाड़े में भेजना शुरू कर दिया। सात वर्ष की उम्र में बजरंग ने कुश्ती की एबीसीडी सीखनी शुरू की। इसके बाद करीब 10 वर्ष की आयु में परिजनों ने उसे छारा स्थित लाला दीवानचंद अखाड़े में छोड़ दिया। यहां गुरु आर्य वीरेंद्र के मार्गदर्शन में उसके खेल में निखार आया। महज 13 वर्ष की आयु में ही बजरंग ने सब जूनियर में ब्रांज और सिलवर मेडल जीते।

 

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संजीव राजपूत
शूटर संजीव राजपूत
मौजूदा वक्त में इंडियन नेवी में बतौर मास्टर चीफ पेटी ऑफिसर-2 और एक बेटी के पिता यमुनानगर निवासी संजीव राजपूत ने 50 मीटर राइफल में गोल्ड मेडल जीता है। यमुनानगर के जगाधरी से ताल्लुक रखने वाले संजीव के पिता कभी खाने का ठेला लगाते थे। नम आंखों से पिता कृष्ण कुमार कहते हैं कि उन्होंने अपने बेटे को बड़ी मुश्किलों में पाला था, लेकिन उन्हें पूरा भरोसा था कि बेटा कामयाब जरूर होगा। बता दें, संजीव राजपूत ने ग्लास्गो में 2014 कॉमनवेल्थ खेलों में सिल्वर मेडल जीता था। उन्होंने 2006 के मेलबर्न कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल पर निशाना साधा था।
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गोरव सोलंकी
बॉक्सर गौरव सोलंकी
हरियाणा के फरीदाबाद निवासी 21 वर्षीय बॉक्सर गौरव सोलंकी ने मेन्स 52 किलोग्राम की कैटेगरी की फाइनल में नॉर्थन आयरलैंड के ब्रैंडन इरवाईन को हराकर गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया। गौरव ने फाइनल बाउट में ब्रैंडन को 4-1 से मात दी। कॉमनवेल्थ गेम्स में गौरव का यह पहला पदक है। इस दौरान बेहद ही गौरवपूर्ण क्षण उस समय आया जब उन्होंने मेडल जीतने के बाद विरोधी खिलाड़ी के कोच के पैर छुए। मां मीना देवी ने अखंड ज्योत जलाकर गौरव के मेडल जीतने की दुआएं मांगी थीं। पिता विजयपाल सिंह घर में ही इलेक्ट्रिशियन का काम करते हैं।
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