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आठ साल पहले नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी को इस काम से मिली थी प्रसिद्धि

Tue, 15 Oct 2019 03:29 PM IST
Garima Garg एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
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अभिजीत बनर्जी - फोटो : ट्विटर
नोबेल फाउंडेशन द्वारा साल 2019 के लिए कुल 15 लोगों को अलग-अलग क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कार दिया गया है। बता दें कि इन सभी शख्सियतों को 10 दिसंबर को होने वाले समारोह में मेडल व पुरस्कार राशि से नवाजा जाएगा। यहां हम बात कर रहे हैं अभिजीत बनर्जी की, जिन्हें अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। 

भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी के साथ उनकी पत्नी एस्थर डफ्लो और माइकल क्रेमर को भी उस पुरुस्कार से नवाजा जाएगा। बता दें कि ये पुरुस्कार उनके द्वारा किए गए शोध 'वैश्विक गरीबी खत्म करने के प्रयोग'  के लिए दिया जाएगा। आखिर किस कारण हुए वे प्रसिद्ध पढ़ते हैं आगे... 
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Abhijit Banerjee - फोटो : Wikipedia
कोलकाता में 21 फरवरी 1961 को अभिजीत का जन्म हुआ था। अभिजीत विनायक बनर्जी को बचपन से ही गरीबी परेशान करती थी। वे अपने अर्थशास्त्री पिता डा. दीपक बनर्जी और अर्थशास्त्री डा. निर्मला से इस बार में सवाल पूछते रहते थे।
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अभिजीत बनर्जी - फोटो : PTI
बता दें, वर्तमान में अभिजीत बनर्जी मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में प्रोफेसर हैं। वहां वे स्टूडेंट्स को में अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं। अगर उनकी शिक्षा की बात करें तो 1981 में बीएससी की डिग्री कोलकाता यूनिवर्सिटी से लेने के बाद उन्होंने 1983 में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) से एमए की पढाई संपन्न की। उसके बाद अभिजीत बनर्जी ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी भी की। वह और उनकी पत्नी डफ्लो अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी ऐक्शन लैब के सह-संस्थापक भी हैं।

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abhijit banerjee and esther duflo - फोटो : Twitter
अभिजीत को किताबें पढ़ने व लिखने का बेहद शौक है। उन्होंने अर्थशास्त्र पर कई किताबें लिखी हैं। अभिजीत ने पूअर इकोनॉमिक्सः ए रेडिकल रीथीकिंग ऑफ द वे टू फाइट ग्लोबल पॉवर्टी नामक पुस्तक 2011 में लिखी थी, जसके कारण वे चर्चा में आए और उन्हें प्रसिद्धी हासिल हुई। बता दें कि वोलाटिलिटी एंड ग्रोथ के नाम से सन् 2005 में इनकी पहली किताब मार्केट में आई। उसके बाद उन्होंने कुल सात किताबें और लिखी हैं।
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Abhijit Banerjee - फोटो : पीटीआई
अभिजीत ने फरवरी 2016 में लिखे एक लेख में बताया था कि उन्हें तिहाड़ जेल में रहना पड़ा था। उन्होंने कहा, 1983 की गर्मियों में हम जेएनयू के छात्रों ने वाइस चांसलर का घेराव किया था। वह हमारे छात्रसंघ अध्यक्ष को कैंपस से निष्कासित करना चाहते थे। घेराव-प्रदर्शन के दौरान देश में कांग्रेस सरकार थी। पुलिस सैकड़ों छात्रों को उठाकर ले गई। हमें दस दिन तिहाड़ में रहना पड़ा, पिटाई भी हुई, लेकिन तब राजद्रोह जैसा मुकदमा नहीं होता था। हत्या की कोशिश के आरोप में दस दिन जेल में रहना पड़ा।

ये भी पढ़े- इस साल किस क्षेत्र में किसे मिला नोबेल पुरस्कार, एक जगह देखें पूरी सूची
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