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एवरेेस्ट की चढ़ाई करने वालों को रास्ता दिखाती हैं 300 से ज्यादा लाशें

Thu, 12 Dec 2019 11:28 AM IST
Mohit Mudgal न्यूज डेस्क, अमर उजाला
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mount everest - फोटो : social media
एवरेेस्ट की चढ़ाई मेें पहली सफलता साल 1953 में एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने हासिल की। ऐसा नहीं है कि इसके लिए पहले प्रयास नहीं किए गए। साल 1921 में इसके लिए पहला असफल प्रयास किया गया था। एवरेस्ट पर चढ़ाई दुनिया के सबसे कठिन और संघर्षपूर्ण कामों में से एक है। एवरेस्ट पर चढ़ने के पहले प्रयास से लेकर अब तक 308 से ज्यादा पर्वतारोहियों की मौत हो चुकी है।
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Mount Everest - फोटो : अमर उजाला

किस देश के कितने पर्वतारोहियों की मौत

  • नेपालः 119
  • भारत-जापानः 19-19
  • यूकेः 17
  • यूएसएः 15
  • चीनः 12
  • दक्षिण कोरियाः 11
  • ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, पोलैंड, रूसः 7-7
  • कनाडा, फ्रांसः 6-6
  • चेकोस्लोवाकियाः 5
  • स्पेनः 4
  • बुल्गारिया, आयरलैंड, इटली, न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंडः 3-3
  • ऑस्ट्रिया, चेक गणराज्य, डेनमार्क, हंगरी, स्लोवेनिया, ताईवान, यूगोस्लावियाः 2-2
  • अन्यः 13
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Mount Everest - फोटो : अमर उजाला

एवरेस्ट पर मौत का सबसे बड़ा कारण एवलांच

  • 1970 में 6 मौतें।
  • 1974 में 6 मौतें।
  • 1996 में 12 मौतें।
  • 2014 में 16 मौतें।
  • 2015 में 22 मौतें।

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Mount Everest - फोटो : अमर उजाला

एवरेस्ट पर किस वजह से कितनी मौतें

  • एवलांच- 68
  • गिरने से- 67
  • एक्सपोजर- 27
  • एल्टीट्यूड सिकनेस- 21
  • दिल का दौरा- 11
  • थकान- 15
  • अन्य- 83
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Mount Everest - फोटो : अमर उजाला

एवरेस्ट के किस हिस्से में कितनी मौतें

  • चोटी के पास (8848 मीटर)
  • 50 प्रतिशत गिरने से
  • 10 प्रतिशत दिमाग के सूजने से
  • 40 प्रतिशत अज्ञात कारणों से
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साउथ कॉलम (7906 मीटर)

  • 55.6 प्रतिशत एक्सपोजर से
  • 11.1 प्रतिशत दिमाग के सूजने से
  • 11.1 प्रतिशत थकान और 22
  • 22.2 प्रतिशत गिरने से

अंतिम स्लाइड में जानें.. पर्वतारोहियों को कैसे रास्ता दिखाती हैं लाशें

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लोसे फेस (7400 मीटर)

  • 42.8 प्रतिशत एवलांच से
  • 14.3 प्रतिशत गिरने से
  • 14.3 प्रतिशत बर्फ गिरने से
  • 14.3 प्रतिशत नुकीले पत्थरों से
  • 14.3 प्रतिशत अज्ञात कारणों से 

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नॉर्थ कॉलम (7020 मीटर) :
  • 100% मौतें सिर्फ एवलांच से
बेस कैंप :
  • 30.7 प्रतिशत गिरने से
  • 15.4 प्रतिशत हार्ट अटैक से और बाकी अन्य कारणों से

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एवरेस्ट डेथ जोन में सालों से पड़े इस शव का नाम है ग्रीन बूट - फोटो : Social media
  • एवरेस्ट की ऊंचाई 8848 मीटर (29,029 फीट) है। 
  • एवरेस्ट चढ़ने के दौरान सबसे ज्यादा मौतें 8000 मीटर (26,000 फीट) और उसके ऊपर से शुरू होती हैं। इसे डेथ जोन कहा जाता है। 
  • एवरेस्ट पर जान गंवा देने वाले पर्वतारोहियों के शव को वापस लाना बेहद मुश्किल होता है और काफी ज्यादा खर्चीला भी। इसलिए उन्हें वहीं छोड़ दिया जाता है। 
  • पर्वतारोहियों के शव से ही एवरेस्ट पर चढ़ने के रास्ते का पता चलता है। ये शव एवरेस्ट पर फतह करने के लिए भविष्य में आने वाले पर्वतारोहियों के लिए मील के पत्थर का काम करते हैं। इन शवों को देखकर नए पर्वतारोहियों को सही रास्ते का पता चल पाता है।

क्यों नहीं सड़ते हैं ये शव?

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पर्वतारोही विपिन चौधरी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
  • एवरेस्ट पर करीब 98 सालों से ये लाशें पड़ी हैं। लेकिन ये सड़ती नहीं हैं।
  • इसका सबसे बड़ा कारण है यहां का तापमान। एवरेस्ट का न्यूनतम तापमान -16 डिग्री से लेकर - 40 डिग्री तक रहता है। 
  • इस तापमान में मरे हुए पर्वतारोहियों के शव खराब नहीं होते। वे सालों साल उसी अवस्था में रहते हैं।
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