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Constitution Day Special: 72वें संविधान दिवस पर जानिए आजाद हिंदुस्तान के पांच कानूनी प्रावधानों को, जिनके कारण आज भी सुलगती है सियासत

सार

Constitution Day 2021: भारतीय संविधान में कुछ प्रावधान ऐसे भी हैं, जिन्हें लेकर भारतीय राजनीति में अक्सर सियासी भूचाल आते रहते हैं। इनमें से कुछ अंग्रेजी शासनकाल के समय से ही लागू हैं और आजादी के बाद भी बदले नहीं। वहीं कुछ ऐसे हैं जिन्हें आजाद भारत की सरकारों ने अपने अनुसार बनाया है और सियासी समीकरणों के अनुसार संशोधित भी किया है।
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भारतीय संविधान और कानूनी प्रावधान - फोटो : social media
आजाद भारत को अपना संविधान अंगीकार किए 72 साल हो गए हैं। 26 नवंबर, 1949 को 16 अनुच्छेद लागू कर संविधान को आत्मसात कर लिया गया था। हालांकि, बाद में 26 जनवरी, 1950 के दिन भारतीय गणतंत्र के तौर पर संविधान के सभी प्रावधान पूरी तरह से लागू कर लिए गए थे। वर्तमान में भारतीय संविधान में 12 अनुसूचियां और 94 संशोधनों के बाद 448 अनुच्छेद शामिल हैं। 
इनके कारण भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान कहलाता है। देश का संविधान बनाने वाली समिति के अध्यक्ष रहे डॉ भीमराव आंबेडकर ने इसकी व्यावहारिकता और परिवर्तन की क्षमता को इसकी खासियतों में सबसे ऊपर बताया है। जो इसे युद्धकाल और शांतिकाल में भी प्रासंगिक और देश को लोकतांत्रिक रूप से एकजुट बनाए रखने में सक्षम है। 
हालांकि, भारतीय संविधान में कुछ प्रावधान ऐसे भी हैं, जिन्हें लेकर भारतीय राजनीति में अक्सर सियासी भूचाल आते रहते हैं। इनमें से कुछ अंग्रेजी शासनकाल के समय से ही लागू हैं और आजादी के बाद भी बदले नहीं। वहीं कुछ ऐसे हैं जिन्हें आजाद भारत की सरकारों ने अपने अनुसार बनाया है और सियासी समीकरणों के अनुसार संशोधित भी किया है। लेकिन आज हम इनमें से पांच ऐसे चर्चित कानूनी प्रावधानों के बारे में जिनसे भारत की सियासत आज भी सुलग जाती है। आइए जानते हैं इन कानूनों के बारे में - 
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राजद्रोह कानून - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
राजद्रोह कानून Sedition Act
भारत में 1860 में राजद्रोह कानून बनाया गया था। इसे 1870 के दशक में लागू किया गया। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान इस कानून का सत्ता के खिलाफ उठ रही क्रांतिकारियों की आवाज को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, जो आज भी बदस्तूर जारी है। अब भले ही इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इस्तेमाल करने की बात कही जाती है।
आईपीसी की धारा-124ए के अनुसार, कोई भी व्यक्ति सरकार के विरोध में लिखने, बोलने, तथ्यों को प्रचारित-प्रसारित करने, विरोधी सामग्री का समर्थन करने या फिर राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों और भारतीय संविधान का अपमान करने की कोशिश करता है तो उसे तीन साल की सजा अथवा आजीवन कारावास हो सकता है।
इस कानून के तहत पिछले पांच-छह सालों में दर्ज मामलों की संख्या में 28 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत में देश विरोधी गतिविधियां बढ़ गई हैं या फिर सरकार इतने गंभीर कानून का दुरुपयोग कर रही है, यह दोनों बातें लंबी बहस के विषय हैं। 
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जम्मू कश्मीर और अनुच्छेद 370 - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
अनुच्छेद-370 Article 370
जम्मू-कश्मीर और वहां के नागरिकों को विशेष दर्जा देने के लिए नवंबर 1952 में अनुच्छेद-370 और 35ए के प्रावधान लागू किए गए थे। इनके पीछे की वजह चाहे जो भी रही हो, मगर अक्सर सियासी कारणों से बीते 60 सालों में अक्सर चर्चा के केंद्र में रही है। 2019 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के एक अध्यादेश के जरिये अनुच्छेद-370 के अधिकांश प्रावधान खत्म कर दिए। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान भी अप्रासंगिक हो गया। वहां अब सुप्रीम कोर्ट के सभी फैसले और सभी भारतीय कानून समान रूप से लागू होने लगे हैं। बात चाहे वहां जमाीन खरीदने की हो या नौकरी करने की, सभी देशवासी अब ऐसा कर सकते हैं। अब सिर्फ अनुच्छेद-370 का खंड-1 एक ही लागू है।

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यूएपीए कानून - फोटो : अमर उजाला
यूएपीए अधिनियम UAPA Act
देश में जब भी UAPA कानून के तहत गिरफ्तारी होती है, देशभर में एक नई बहस छिड़ जाती है। 2021 की शुरुआत में किसान आंदोलन के तहत 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा और सेलेब्रिटी ट्वीट टूलकिट सामने आने के बाद इस कानून के तहत कुछ गिरफ्तारियां की गई थीं। जिन्हें लेकर देश में जमकर सियासत हुई।
वैसे तो भारतीय संसद ने 1967 में गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (Unlawful Activities (Prevention) Act-UAPA) को बनाया था। इस कानून में 2004, 2008, 2012 और 2019 में संशोधन किए गए। लेकिन 2019 में कठोर प्रावधान जोड़े गए थे, जिसके बाद से ही यह कानून राजनीतिक विवादों के केंद्र में रहा है।
इसका कारण यह है कि सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को किसी व्यक्ति विशेष को आतंकी, संगठन और संस्था को आतंकवादी संगठन घोषित किया जा सकता है। विपक्षी दल और एक्टीविस्ट संशोधित प्रावधानों का विरोध करते रहे हैं। उन्हें डर है कि सरकार इस गैर जमानती कानून का इस्तेमाल असली आतंकियों के साथ-साथ सरकार की नीतियों के विरोधी लेखकों, वकीलों और सामाजिक - मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर भी कर सकती है।  
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सीएए और एनआरसी - फोटो : अमर उजाला
नागरिकता संशोधन कानून CAA
नागरिकता संशोधन कानून 2019 में बनाया गया था। हालांकि, देशभर में इसके खिलाफ अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों और विपक्षी दलों ने जमकर विरोध-प्रदर्शन किए थे। इस कानून में तीन पड़ोसी देशों बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से भारत आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। इन देशों में हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी और ईसाई धर्म के लोग अल्पसंख्यक हैं। इसलिए, भारत में पांच साल पूरा कर चुके ऐसे शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी। पहले नागरिकता पाने के लिए 11 साल की शर्त थी। 
हालांकि, विरोध कर रहे लोग कहते हैं कि यह कानून एक मजहब का विरोधी है। यह संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद-14 में सभी को समानता की गारंटी मिली हुई है। यह कानून अवैध प्रवासियों को मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में विभाजित करता है। इसे लेकर विरोध-प्रदर्शन भी काफी लंबा चला है। 
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आर्टिकल 371 - फोटो : self
अनुच्छेद-371 Article 371
भारतीय संविधान में अनुच्छेद-370 की तरह ही एक अनुच्छेद-371 भी है। यह अनुच्छेद भारत के पूर्वोत्तर और कुछ सीमांत राज्यों के लिए प्रदत्त विशेष प्रावधानों के संदर्भ में है। इस कानून के तहत वहां की जनजातियों, और स्थानीय संस्कृति को विशेष तौर पर संरक्षण दिया गया है। साथ ही यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को महाराष्ट्र में मराठवाड़ा और विदर्भ तथा शेष भाग, वहीं गुजरात के सौराष्ट्र, कच्छ और कुछ शेष हिस्से के लिए अलग विकास बोर्ड गठन करने का अधिकार भी देता है। अनुच्छेद-371 के ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, एच, जे और आई आदि भाग हैं। ये भाग अलग-अलग उत्तर पूर्वी राज्यों से संबंधित हैं। जैसे- अनुच्छेद-371ए नगालैंड, अनुच्छेद-371बी असम के लिए, अनुच्छेद-371सी मणिपुर में लागू है। जब कभी इन कानूनों में बदलाव का मुद्दा उठता है तो राज्य से लेकर केंद्र तक देश भर में सियासी तूफान उठने लगता है। 
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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 341 - फोटो : Amar Ujala Graphics
इन पर भी रहा टकराव, तीन कृषि कानून होंगे वापस
इनके अलावा Article 341/ अनुच्छेद 341 और Article 244/ अनुच्छेद 244 आदि पर भी बीते दो सालों में राज्यों और केंद्र सरकार में टकराव देखने को मिला है। वहीं, तीन कृषि सुधार कानूनों पर भी देश भी राजनीति में बीते ढ़ाई सालों से उफान आया हुआ है। किसानों के अनवरत प्रदर्शन के कारण केंद्र सरकार ने हाल ही में उन्हें आगामी संसद सत्र के दौरान वापस लेने का वादा किया है। 
 
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