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अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी तक, कैसे प्रधानमंत्री के चहेते बने जेटली? 13 बातें

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 24 Aug 2019 04:25 PM IST
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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
बीजेपी सत्ता में आने से पहले तक राज्यसभा में नेता विपक्ष की हैसियत से सधी दलीलों, पैने तर्कों और शानदार भाषणों से यूपीए सरकार को कई बार तार-तार कर चुके जेटली छात्र राजनीति के रास्ते केंद्र की राजनीति में आए। वे बीजेपी के ऐसे नेताओं में रहे, जिनके दोस्त पार्टी के भीतर भी थे, और बाहर भी। मीडिया के साथ अपने रिश्तों के कारण ही वे 1999 में भाजपा के प्रवक्ता बनें। ये तस्वीर 1999 की है।
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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
एक पंजाबी ब्रह्मण और वकील पिता की संतान जेटली उन नेताओं की श्रेणी में शामिल नहीं थे, जिन्हें राजनीति विरासत में मिली। उनके पिता महाराज किशन जेटली वकील थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए ये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से जुडे़ थे। 1974 में डीयू के छात्र संघ के अध्यक्ष बनें। डीयू की राजनीति के उस दौरे के कई नेता बाद में पूर्णतया राजनीति में आ गए या पत्रकार बनें। तस्वीर में दिख रही छात्र नेता पूर्णिमा सेठी बाद में दिल्ली की विधायक बन गई थीं।


 

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
जेटली का विवाह संगीता जेटली से हुआ। संगीता के पिता गिरधारी लाल डोगरा जम्मू-कश्मीर के राजनीति के दिग्गज नेताओं में थे। वे 80 के दशक में जम्मू-कश्मीर सरकार में वित्तमंत्री भी रहे। जेटली की पत्नी संगीता एक गृहणी हैं। हालांकि पिछले साल जेटली ने जब अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ा तो वे प्रचार में सक्रिय दिखीं।

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
श्रीराम कॉलेज से स्नातक और दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ करने के बाद जेटली ने सुप्रीम कोर्ट से वकालत शुरू की। उन्होंने एक पैर वकालत के खांचे में रखा और दूसरा राजनीति के, और दोनों को ही साधने में सफल रहे। आपातकाल के दिनों में वे जेल भी गए। भाजपा के पुराने अवतार जनसंघ के नेताओं से वहीं पर उनकी करीबी और बढ़ी। 1980 में भाजपा के गठन के बाद वे पार्टी की दिल्ली की इकाई के सचिव और भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष बनें।

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
1973 में केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ जयप्रकाश नारायण और राजनारायण द्वारा चलाए गए भ्रष्टाचार के आंदोलन में जेटली की अहम भूमिका रही। वे जयप्रकाश नारायण द्वारा नियुक्त नेशनल कमेटी फॉर स्टूडेंट एंड यूथ ऑर्गेनाइजेशन के संयोजक थे। वे जनसंघ की राजनीति से भी जुड़े रहे और नागरिक अधिकारों के लिए चलाए गए आंदोलनों में भी सक्रिय रहे। 

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
1977 से ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस की, देश के कई हाईकोर्ट में भी वो सक्रिय रहे। 1989 में वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व में बनीं संयुक्त मोर्चा सरकार ने उन्हें एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया। उस समय उनकी उम्र महज 37 साल थी। उन्होंने बोफोर्स मामले के कानूनी पहलुओं पर काफी काम किया था।

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
ये तस्वीर मार्केटिंग गुरु सुहैल सेठ के कैमरे से है। जेटली की शख्सियत की यही खूबी रही, उनके दोस्त कांग्रेस में थे, और दूसरी पार्टियों में भी। पत्रकारिता में भी जेटली के कई दोस्त थे। तस्वीर में जेटली के साथ शशि थरूर, करण थापर और तवलीन सिंह दिखाई दे रहे हैं।

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
जेटली के मुवक्किलों में कांग्रेस के माधव राव सिंधिया, जदयू के शरद यादव जैसे नेता भी शामिल रहे। वे कोको-कोला के खिलाफ पेप्सी की ओर से भी मुकदमा लड़ा थे। वकालत में उनके तजुर्बे की बानगी ये है कि इंडो-ब्रिटिश लीगल फोरम के समक्ष भारत में भ्रष्टाचार और अपराध पर भी व्याख्यान दिया था ।
 

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
2002 में उन्होंने पेप्सी की ओर से एक मुकदमे की पैरव्वी की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पेप्सी समेत 8 कंपनियों पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने पर जुर्माना लगा दिया था। जेटली उस समय राजग सरकार में कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री थे। 2004 में उन्होंने कोको-कोला के लिए भी मुकदमा लड़ा था। जून, 2009 से उन्होंने वकालत की प्रेक्टिस बंद कर दी थी।

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
मीडिया से अपने रिश्तों के चलते जेटली 1999 में भाजपा के प्रवक्ता बन गए थे। 1999 में राजग की सरकार बनने के बाद वे सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री बनाए गए थे। उसी सरकार में वे विनिवेश मामलों के मंत्री भी बनाए गए थे। 

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
जेटली जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी थे, उसी प्रकार पिछली राजग सरकार में वे अटल बिहारी वाजपेयी के भी करीबी रहे। वाजपेयी ने उन्हें एक ही साल में राज्य स्तर के कैबिनेट रैंक का मंत्री बना दिया था।

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
हालांकि केंद्र की राजनीति में मोदी के उभार से पहले तक खुद मोदी, जेटली और सुषमा स्वराज एक ही कद के नेता थे। मोदी 2002 में गुजरात की राजनीति में चले गए और बाद के सालों में साथ काम करने के बाद भी जेटली और सुषमा के बीच वाजपेयी और आडवाणी जैसे नेताओं का करीबी बनने की होड़ लगी रही।

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अरुण जेटली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
2002 के दंगों में जब भाजपा के भीतर एक हिस्से ने नरेंद्र मोदी के विरोध में आवाजें बुलंद की, तो जेटली उनके समर्थन में डंट कर खड़े रहे। 2012 में मोदी ने जब केंद्र की राजनीति में आने के लिए जोर लगाया, तब भी जेटली ने उनकी पुरजोर वकालत की। जेटली के उन्हीं अहसानों का नतीजा मोदी सरकार में उनकी हैसियत के तौर पर दिखता था। 
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